Saturday, May 20, 2017

सुखद एहसास

शब्दों का रह रह कर के,यूँ बातों में ढलना,
यहाँ-वहाँ,जहाँ-तहाँ की,उन बातों का कहना,
यूूँ शब्द-शब्द गुनना,और बात-बात जीना,
तुम संग यूँ सुनना,इक सुखद एहसास है।

मंजिलों की राहें हैं,बड़ी ही उलझी-उलझी सी,
कभी लगें बोझिल ये,कभी लगें सुलझी सी,
कदम-कदम साथ हो,और हाथों में हाथ हो,
तुम संग यूँ चलना,इक सुखद एहसास है।

वर्षा की रिमझिम,और कली-कली जगना,
फूल-फूल खिलना,और भंवरों संग डोलना,
गुज़ारना मौसमों का,क्षितिज का ये मिलना,
तुम संग सब जीना,इक सुखद एहसास है।

तुम्हारी बातों की,उलझी-सुलझी सी तारुनाई,
अनजानी सी राहों की,अनजानी सी सच्चाई,
आसमान के अनंत संग,ये धरती कि गहराई,
तुम संग यूँ समझना,इक सुखद एहसास है।

जीवन के उतार-चढ़ाव,ये जीवन की सार्थकता,
जीवन के येे गीत-राग,और जीवन की मधुरता,
शब्दों की मिठास से भरा,छलकता सा प्याला,
तुम संग घूँट-घूँट पीना,इक सुखद अहसास है।

                                                                             
                                                                                         ( जयश्री वर्मा )

Monday, May 1, 2017

अनजानी,अनदेखी कल्पना

स्वर्ग की कामना समाई है,हर किसी के मन में,
और दुखों से पार,पाना चाहते हैं,अपने जीवन के,
धाम दर्शन करके प्रभु के,द्वार जाने की चाह है,
सभी पूजास्थल,ऊपरवाले को मनाने की राह है,
हर कोई स्वर्ग का दिल से तलबगार है,
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

जीवन की तकलीफों को जो असामान्य मान बैठे हैं,
मानो सुबह शाम,रात दिन के बदलावों से ही रूठे हैं,
यही जन्म तो है सत्य,और सत्य इसकी ये कहानी,
परलोक तो है अनदेखा,इसकी कथा भी है अनजानी,
कर्मलोक को भूल तर्पण को क्यों हैं बेकल?
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

कोई नहीं है शख्श,धरा पे,जो कि मृत्यु को पाना चाहे,
अपना घरद्वार भूले,और भूलना चाहे,अपनी ये राहें,
तो फिर जो मिला है उसको,क्यूँ न जी भर कर जियें,
तो क्यूँ न इस जीवन का,हर स्वाद घूँट-घूँट कर पियें,
दुखों से भाग क्यों देव द्वार की है चाहत।
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

ये सुन्दर रंग समेटे प्रकृति,ये झरने और ये नदियां,
प्रेम में रचे बसे रिश्तों से परिपूर्ण जीवंत ये दुनिया,
सहेजे हुए सुख-दुःख से भरी परिवार की ये बगिया,
ये रिश्ते-नाते,संगी-साथी,ये सुबह-शाम,ये गलियां,
फिर देव लोक को,दिखते क्यों हैं विह्वल?
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

मृत्यु से लौट किसने,किसे स्वर्ग का राज़ बताया?
इह लोक त्यागने का,किसके मन ख़याल आया?
ये पतलून की क्रीज़,मैचिंग कपड़े और ये साड़ी,
ये घर-द्वार,ये हाट,ये पड़ोस-पड़ोसी ये पनवाड़ी,
ये क्रीम,लिपस्टिक,झगड़ा,रूठना,मान मनुहारी,
सावन का झूला,गीत और बच्चों की किलकारी,
इस धरती के रंग हज़ार,और खूबसूरत नर-नारी,
ये शोहरत,सलाम,ये कुर्सी की हनक की चिंगारी,
कोई भी मोह इसका,न छोड़ सका,न छोड़ सकेगा,
इस सच्चाई को त्याग,भला अनदेखी से जुड़ेगा?
स्वर्ग-नर्क तो यहीं है,जीवन जीना इक कायदा है,
यूँ अन्धकार में,भटकने का,कोई नहीं फायदा है,
ये रिश्ते नाते,ये उनका रूठना मनाना ही सच्चे हैं,
मित्रों-ये जीवन के सुख-दुःख के खेल ही अच्छे हैं,
ये जीवन है अनमोल,यूँ अन्धविश्वाश में न अटकें,
और अनजानी,अनदेखी कल्पनाओं में न भटकें।
क्यों कि-
स्वर्ग के लिये तो मित्र मारना पड़ता है।
                                           
                                                      ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, April 19, 2017

आज तो प्रिय मेरा रूठने का मन है

आज सुनो!प्रिय तुमसे,मेरा रूठने का मन है,
बस अपना वज़ूद ढूंढना है,नहीं कोई गम है,
तुम्हारा प्यार यूँही,नापने का मन हो चला है,
तुम भूले ध्यान रखना,क्या बुरा,क्या भला है।

आज तो सर में दर्द बड़ा,यही बनाना बहाना है,
असल में तो आज यूँ ही,तुमको आजमाना है,
तौलना है कि,तुम्हें मुझसे,कितना लगाव है,
लव यू कहने में,कितना सच कितना बनाव है।

क्या अब भी तुम मुझे,देख सब भूल बैठोगे ?
क्या सारे दिन आज,संग में मेरे ही ठहरोगे ?
क्या चाय संग फटाफट,ब्रेड बटर बनाओगे ?
क्या पानी संग दौड़के,सेरिडॉन ले आओगे ?

क्या बाम मेरे माथे पे,अपने हाथों से मलोगे ?
मुझे सुकून पाता देख,मन ही मन खिलोगे ?
मेरा मन बदलने को,फिल्म कोई दिखाओगे ?
या पंचवटी की,चटपटी चाट तुम खिलाओगे ?

या कहोगे चलो तुम्हें,पार्क हवा खिला लाऊं ?
या अमूल की पसंदीदा,बटरस्कॉच दिलवाऊं ?
या फोन मिला के,मेरी माँ से बात कराओगे ?
या खुदही यहां-वहां की,सुना मन बहलाओगे ?

तुम्हारी उदासीनता से,मेरा मन बौखलाया है ,
अपना महत्व जानने का,कीड़ा कुलबुलाया है,
क्या अब तुम्हें मुझसे,मुहब्बत ही नहीं रही ?
या मैं अब पुरानी हो चली हूँ,ये बात है सही ?

ये भी कोई जीवन है,न रूठना और न मनाना ,
तुम्हारा रोज ऑफिस और मेरा टिफिन बनाना ,
या बहुत साल संग रहते,सब आदत हो गई है ,
जो थी प्यार की खुमारी,कहीं जा के सो गई है।

तुम कामकाज पे जाते हो,मैं घर सम्हालती हूँ ,
न तो तुम कुछ कहते हो,और न मैं बोलती हूँ ,
मुझे तो ये पल-छिन,बिलकुल भी नहीं हैं भाते ,
हम मशीन की तरह,रोज के ये दिन हैं बिताते।

तुम चाँद तारों की अब कोई,बात नहीं हो करते ,
ये दिन बोरियत भरे अब तो,मुझसे नहीं हैं कटते ,
सो ! आज तो प्रिय मेरा तुमसे,रूठने का मन है ,
बस अपना वजूद ढूंढना है,और नहीं कोई गम है।

                                                               (  जयश्री वर्मा  )

Monday, April 3, 2017

मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी

मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी,तुम्हें झुकना होगा,
तुम सिर्फ मेरे हो,ये वादा तुम्हें करना होगा,
धोखा नहीं चलेगा,प्यार के इस व्यापार में,
खुल के दुनिया के सामने,दम भरना होगा।

सूरज की लाली संग,आशाएं जगानी होंगी,
दिन भर मेरी गृहस्थी की,नाव चलानी होगी,
शाम ढले मेरी चाहतों के,संग ढलना होगा,
मैं हूँ शमा निःशब्द,मुझ संग जलना होगा।

सावन के सभी गीत,मेरे सुरों संग गाने होंगे,
मेरे जज़्बात पतझड़ में भी,गुनगुनाने होंगे,
घर की किलकारियाँ,गले से लगानी होंगी,
ऊँगली थाम के उन्हें,हर राह दिखानी होगी।

मायूसियों में,अपना कन्धा भी बढ़ाना होगा,
बाँहों के दायरे में बाँध कर,सहलाना होगा,
आंसुओं को मेरी पलकों में,नहीं आने दोगे,
खुशियों को कभी मुझसे,दूर न जाने दोगे।

जब मेरा ये वज़ूद,तुम्हारी पहचान बन जाए,
मेरा नाम भी जब,तुम्हारा नाम ही कहलाए,
मेरी हिफाज़त,तुम्हारे अरमान में ढल जाए,
तुम्हारे ख़्वाबों में जब,मेरा तसव्वुर घुल जाएं।

विवाह की सारी कसमों को,निभाना ही होगा,
हर सुख-दुःख में रहोगे साथ,ये जताना होगा,
कितनी भी विपत्ति हो,मुख नहीं फेरोगे कभी,
मेरे हो,मेरे रहोगे सदा,कहो यहीं और अभी।  

मौसमों के साथ,मुझे महफूज़ रखना होगा,
अपनी जान से भी ज्यादा,प्यार करना होगा,
मैं कितनी भी ढल जाऊं,संग मेरे रहोगे सदा,
सच्चा साथी होने का फ़र्ज़,पूरा करोगे अदा।

सच कहो कभी भी,भरोसा मेरा नहीं तोड़ोगे,
जीवन के झंझावातों में,अकेला नहीं छोड़ोगे ,
तब मैं तुम्हारी संगिनी,हमसाया बन जाऊँगी,
तुम्हारी हर परिस्थिति के साथ ढल जाऊँगी।
पर ----
मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी,तुम्हें झुकना होगा,
तुम सिर्फ मेरे हो,ये वादा तुम्हें करना होगा।

                                              ( जयश्री वर्मा )







Saturday, March 18, 2017

तुम ही बताओ
















ये निगाहें इक अजीब सा ही गुनाह किये जाती हैं,
इधर-उधर भटकती सी तुम पे ही ठहर जाती हैं।
ये ज़ुबाँ है कि लफ़्ज़ों संग खेलना शौक है इसका,
पर क्यों ये तुम्हारे सामने बेज़ुबान सी बन जाती है।

ख़्वाब हैं कि ये तो,तुम्हारा तस्सवुर सजाए रहते हैं,
पलकें हैं कि ये तो रात भर,रतजगा किये जाती हैं।
ये हाथ मेरे,हाल-ए-दिल लिख के,तुम्हें बताना चाहें,
पर ये कलम है कि,ज़माने के खौफ से घबराती हैं।

ये कदम हैं जोकि गुज़रे हैं,कई मोड़,कई राहों से,
आता है जब दर तेरा,बिन रोके ही ठिठक जाते हैं।
दिल ने तो चाहा है तुम्हें,खुद से भी ज़्यादा टूट कर,
इज़हार करना चाहे पर,अलफ़ाज़ ही खो जाते हैं।

ख़ैरख्वाहों ने कहा,ये जुनून है,राह है भरी काँटों से ,
शूल के डरसे क्या,मुहब्बत छोड़ी,किसी ने फूल से?
खुदा के बनाए इन,पाक-प्यार के एहसासों के संग,
जीवन की इस खूबसूरती को,हम कैसे नकार जाएं?

तुम ही बताओ कि कैसे हम,तुम्हें एहसास दिला पाएं,
इस दिल के इन जज़्बातों को,तुम तक कैसे पहुंचाएं?
तुम्हारे लिए कितना आसान है,यूँ बेख्याल बन जाना,
पर हम सरीखे,शमा पे मिटने वाले,परवाने कहाँ जाएं ?

                                                                 जयश्री वर्मा

Friday, March 3, 2017

होली के मतवाले रंग


इस प्रकृति के सात रंग से जन्मे कई हज़ार हैं रंग,
ख़ुशी जताते चटकीले रंग,फीके हैं दुखियारे रंग,
इस जीवन की उठापटक के टेंशन वाले न्यारे रंग,
गर जीते तो सर्वेसर्वा वर्ना हैं आरोपों के सारे रंग,
तू-तू,मैं-मैं,ऐसा-वैसा और चुभते से झगड़ालू रंग,
बैर पुराना भूल उठाओ,ये होली के मतवाले रंग। 

गीत संगीत भाव फागुनी है,अल्हड़ हुआ ये मन,
भंग मलंग करे है दिल को,फुर्तीला हुआ है तन, 
चूनर ये रंग बिरंगी मत करना,ओ रंगरेज सजन,
धमकी आज नहीं चलेगी,चाहे कितने करो जतन,
हंसी ठिठोली,नयन चतुर और चुगली करें कंगन,
रंग बरसे,तन-मन भीगे,ये होली के मतवाले रंग। 

चाचा-चाची,मुन्ना-मुन्नी,कोई बचके जाने न पाए,
रोक-टोक अब नहीं चलेगी,कुछ मनमानी हो जाए,
ऐसे कैसे जाने दूँ भौजी,मौका फिर-फिर न आए,
चिप्स,पकौड़े,कचरी ले आओ,घर में जो हैं बनाए,
पापड़,दहीबड़ा,गुझिया संग,भंग का साथ सुहाए,
चलो उड़ाएं गुलाल लाल,ये होली के मतवाले रंग। 

धरती ने भी ली अंगड़ाई,रंग रंगीली बन कर छाई,
कोयल प्रेम गीत है गाती,अमियों ने है डाल झुकाई,
भँवरों के हैं गीत रसीले,बगिया है पुष्पों की सौगात,
लाल पलाश,बुरुंश दहके हैं,फागुन की नई है बात,
शर्म हया के दौर चल रहे,मन चंचल है भाव उदात्त,
कही,अनकही सब जानें,ये होली के मतवाले रंग।

रंग बिखेर जादू सा करती,प्रकृति हुई मतवाली,
डहेलिया,पिटूनिया,पैन्ज़ी,सुर्ख गुलाबों की लाली,
तिलस्मयी रंग बिखेर ये,जहां तिलस्मयी बनाए,
सब जीवों के मन भावों में देखो,प्रेम राग जगाए,
वशीभूत हुए हैं सभी,प्रकृति के देख निराले रंग,
बुलाएं सराबोर होने को,ये होली के मतवाले रंग।
 
कैसा ये खुमार छाया और,कैसा बिखरा हुआ है नूर,
मादकता है हवाओं में फैली,तन पे है चढ़ा  सुरूर,
रंगों की होड़ चली और सबको खुद पर है गुरूर,
इन साकार हुए ख़्वाबों को,पलकों में ही रहने दो,
शब्दों को मौन करो और अँखियों से ही कहने दो,
सभी भाव बयान कर देंगे,ये होली के मतवाले रंग।

                                                                                 ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, February 1, 2017

मन बसंत


पीले-पीले फूल खिले,सरसों से भरे हैं खेत झुके,
प्रकृति की ये छटा देख,कदम भी हैं रुके-रुके,
गेंदा हज़ारा की खिली,पंखुड़ियों की पीत छटा,
पीले से सभी फूल झांकें,हरे पत्तों की ओट हटा,
आसमान के योग से ये,खुल रहे हैं राज अनंत,
मदमाती,इठलाती सी,धरती हुई है आज बसंत।

माँ सरस्वती का वन्दन,बसंत का अभिनन्दन,
गीतों की फुहार से है,मन-मन,आनंद-आनंद,
होलिका का आह्वान,ख़ुशी,उत्साह संग-संग,
किसानों के सुर गूंजे,गुजरियों की चाल उमंग,
अठखेलियाँ,ठिठोली,ख़ुशी का नहीं कोई अंत,
हर ख़ुशी में बसंत और हर हास छलके बसंत।

तन,सांस महक रही,दिल की धड़कन है तेज़,
चूनर मोरी रंग दे बसंती,ओ रे सयाने रंगरेज,
सात सुर गूंजें नस-नस,प्रीत रच गीत संगीत,
मन विचार हैं बहके,कैसी ये प्रीत अगन रीत,
इस मीठी सिहरन का,नओरछोर,न कोईअंत,
ओ सुन पिया सँवारे!आज मेरा है मन बसंत।

                                       ( जयश्री वर्मा )