Wednesday, February 1, 2017

मन बसंत


पीले-पीले फूल खिले,सरसों से भरे हैं खेत झुके,
प्रकृति की ये छटा देख,कदम भी हैं रुके-रुके,
गेंदा हज़ारा की खिली,पंखुड़ियों की पीत छटा,
पीले से सभी फूल झांकें,हरे पत्तों की ओट हटा,
आसमान के योग से ये,खुल रहे हैं राज अनंत,
मदमाती,इठलाती सी,धरती हुई है आज बसंत।

माँ सरस्वती का वन्दन,बसंत का अभिनन्दन,
गीतों की फुहार से है,मन-मन,आनंद-आनंद,
होलिका का आह्वान,ख़ुशी,उत्साह संग-संग,
किसानों के सुर गूंजे,गुजरियों की चाल उमंग,
अठखेलियाँ,ठिठोली,ख़ुशी का नहीं कोई अंत,
हर ख़ुशी में बसंत और हर हास छलके बसंत।

तन,सांस महक रही,दिल की धड़कन है तेज़,
चूनर मोरी रंग दे बसंती,ओ रे सयाने रंगरेज,
सात सुर गूंजें नस-नस,प्रीत रच गीत संगीत,
मन विचार हैं बहके,कैसी ये प्रीत अगन रीत,
इस मीठी सिहरन का,नओरछोर,न कोईअंत,
ओ सुन पिया सँवारे!आज मेरा है मन बसंत।

                                       ( जयश्री वर्मा )

Friday, January 27, 2017

खेल राजनीति का खेलें

आओ हम मिलकरके खेल,राजनीति-राजनीति का खेलें,
देश को रखें एक तरफ और फिर सम्पूर्ण स्वार्थ में जी लें।

भिन्न-भिन्न पार्टियाँ बनाकर,चिन्ह अपनी पसंद का लगाएं ,
कमल,साइकिल,हाथी,पंजे या अन्य से,आओ इसे सजाएं।

करें घोटाले,घपले,हवाले,सबको खुली छूट है इस खेल में,
पैसे की महिमा के बल पर,कोई भी नहीं जाओगे जेल में।

देश डूबे या दुश्मन के हमले हों,कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ,
बस इक दूजे पे आक्षेप लगाएं,यह खेल है अलग सा निराला।

किसी को विदेशी,किसी को कट्टर कह जनता को भड़काएं,
सत्र कितना भी जरूरी हो पर,हर काम में ही रोड़ा अटकाएं।

बस अपने घर को धन से भर लें,चाहे ये जनता जाए भाड़ में ,
हर तरह का कर्म कर डालें,मुस्कुराते मुखौटे की आड़ में।

रमजान में रोज़ा इफ्तारी और मकर संक्रांति में हो खिचड़ी ,
हिन्दू,मुस्लिम वोट बैंक छलावे में,ये जनता भोली है जकड़ी ।

भाषण व उदघाटन उद्घोष कर,इस पब्लिक को बरगलाएं ,
और हर मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारा जा,ईशवर को भी फुसलाये।

पोशाक रहेगी सफ़ेद टोपी संग,पर कोई दाग न लगने पाए ,
सफ़ेद लिबास की आड़ में क्या करते हैं,कोई ये जान न पाए।

नए वादों के घोषणा पत्र बनाकर,मीडिया से प्रचार करवाएं ,
वादा खिलाफ़ी कर सकते हैं,पर पहले सत्ता अपनी हथियाएँ। 

स्कूल,अस्पताल,सड़क के नाम पर,धन में गोते खूब लगाएं ,
काम धकाधक होना जरूरी,चाहे सब फाइलों पे ही निपटाएं।

नियम क़ानून ताक पर रखकर,बस नोट की खेती उगाएं,
भूख,बाढ़ से कोई मरे तो,परिवार को,दो-दो लाख पकड़ाएं।

तुम सत्ता में रहो तो हमें सम्हालो,हम सत्ता में तुम्हें सम्हालें ,
कोर्ट,सीबीआई सब ही सध जाएगी,बेखौफ़ कुर्सी अपनालें ।

बड़ा आनंद आएगा चलो मिल,इस सत्ता का स्वाद भी ले लें ,
तो आओ हम मिल करके,खेल राजनीति-राजनीति का खेलें ।

                                                                         ( जयश्री वर्मा )





Wednesday, January 18, 2017

हमारे बाँकुरे जवान

जिनसे अपनी है सुबह शाम,वो हैं सीमाओं पर खड़े हुए,
वो प्रहरी वो सीमा रक्षक,वो जवान सीमाओं पर डटे हुए।



उनके होने से हम बेफिक्र,उनसे सुरक्षित अपना सम्मान,
उनके लिए तो बस सर्वोपरि,देश की-आन,बान और शान।

उनका भी तो है घर-द्वार,और उनका भी है अपना परिवार,
पर देश है उनकी प्राथमिकता,देश ही उनका सच्चा प्यार।

उनके लिए दिन-रात एक हैं,हरदम,हरपल सचेत वो रहते,
भारत माँ की रक्षा करने को,हंस-हंस कर सब कुछ सहते।

चाहे आंधी हो,या तूफान चले,चाहे बरसें तीखे बर्फ के गोले ,
हो कैसा भी संकट,रुकावट,वो साहस संग सबकुछ सहलें।

दुश्मन कितनी कोशिश कर ले,पर इरादों को न डिगा सके,
हिम्मत उनकी है फौलादी,उन्हें कोई भी चुनौती न डरा सके,



प्राणों की बाजी लगा,शत्रुओं को हराएं ऐसे हैं बाँकुरे जवान,
तब स्वतंत्र हवा में सांस हम लेते,हमारे सपने चढ़ते परवान।

उनकी उम्मीद,तसल्ली उनके परिवार की चिट्ठी से जुड़ी है,
और घर जाने की छुट्टी स्नेह और उम्मीद से जुड़ी-कड़ी है।

रहे ये अमर जवान ज्योति सदा,हो सुरक्षित देश की आवाम,
हे वीरों ! शत-शत नमन तुम्हें,है मेरा शत-शत तुम्हें सलाम।

                                                                                       ( जयश्री वर्मा )









Friday, December 9, 2016

ओ सृष्टि जननी

ओ पावन जीव जननी जलधार,महिमा तेरी अपरम्पार,
तेरे कारण ही,इस धरती पे फैला,इस सृष्टि का संचार,
तेरे वज़ूद के कारण ही,यह पृथ्वी,है नीला ग्रह कहलाई,
नदी किनारे बसीं सभ्यताएं,और विराटता इसने पाई।

तूने जलचर,थलचर,नभचर,सबकी ही प्यास बुझाई है,
तू जहाँ-कहीं से गुज़री जग में,वहीं पे हरियाली छाई है,
अपनी धुन में चंचल लहरों से,मधुर संगीत सुनाती तू,
हर बाधा को पार कर हमें,है जीवन का मर्म बताती तू।

है चहुँ और स्पंदन नदियों से,और नदियों से ही संसार,
युगों-युगों के इस बंधन संग,न हो उपेक्षा का व्यवहार,
नदियों से जीवन का रिश्ता,हमें हरहाल समझना होगा,
और जल संचयन का पाठ,हम सबको ही पढ़ना होगा।

वर्ना धरती पर बिखरी ये,मनभावन,हरियाली न होगी,
पशु,पक्षी,कीट और शिशुओं की किलकारी भी न होगी,
गर जल न रहा,वृक्ष न होंगे,तो आक्सीजन भी न बनेगी,
बिना प्राणवायु,इस जीवन की,फिर कहानी कैसे रहेगी।

जल का  महत्व जानके हम,इसकी उपलब्धता की सोचें,
जल संचय के उपाय निकालें,और जल संरक्षण की सोचें,
सदानीरा नदियाँ ये रहें और उनकी अमरता की भी सोचें ,
सोचें कि कैसे ये प्रकृति बचे,और भूजल बढ़ाने की सोचें।

जल संरक्षण हेतु इस जल को,व्यर्थ में न बहने दें हम,
वर्षा से प्राप्त जल,संचित कर,बेकार में न जाने दे हम,
नदियों अपनी स्वच्छ रखें,उन्हें प्रदूषित न होने दें हम,
गन्दगी,कूड़ा,पूजन-सामग्री फेंक बीमार न होने दे हम।

मृत पशु,मृत शरीर कदापि न,इन नदियों में बहाए जाएं,
अंतिम संस्कार को,इलेक्ट्रिक शव दाह गृह ही अपनाएं,
न डालें कारखानों का दूषित जल,इन पावन नदियों में,
वर्ना जीवन मुश्किल होगा,आगे आने वाली सदियों में। 

जल राशि का मूल्य जानें,ताकि भविष्य भयावह न रहे,
वृक्षों की तादाद बढ़ाएं,ताकि जल धरती में ही रुका रहे,
कुँए,पोखर व तालाब बनाएं,ताकि जल संचित होता रहे,
हर व्यक्ति जागरूक हो,ताकि जीवन धरती पे बचा रहे।

जल जीवन है,जल स्पंदन है,जल से है यह धरती जवान,
नदी बचाएं,नदी सहेजें,यही जल,जंगल,जमीन की जान,
इस आकाशगंगा में है केवल,पृथ्वी ही,जीवन की पहचान,
जल से ही जीवन संभव है,सबमें बांटना होगा यह ज्ञान।

                                                              ( जयश्री वर्मा )

Tuesday, November 15, 2016

प्रिय तुमको क्या कहूँ ?

भृकुटी तनी धनुष सी,चितवन यों जस तीर की धार,
हार न मानें,घायल करें तंज़ करते से ये शब्द प्रहार,
हृदय में खंजर सी उतरे,ये तीखी सी मादक मुसकान,
तलवार सा घायल करें,डिगा दे ये हौसलों की मचान,
जिसपर बरस पड़ें ले ये सब,समझो उसका बंटाधार,
प्रिय सच कहूं तुम तो हो,पूरा का पूरा ही शस्त्रागार!

चन्द्रमा सा मुखमंडल कहूँ,या सूरज लाली से कपोल,
तारों सी चमचम चमकती तुम्हारी चुनरी ये अनमोल,
मेरे मंगल,राहु-केतु,शनि सब तुम ही तो प्रिय साधो,
तुम मेरी देवी हो,भले ही पुकारो,मुझे मिटटी का माधो,
मेरे सुबह-साँझ की झाड़-फूंक का,तुम ही कर्मकांड हो,
मेरे घर के गृह-नक्षत्र का,प्रिय तुम पूरा ब्रह्माण्ड हो!

कमल सरीखे नयन,गुलाब पंखुड़ी से,ये नाज़ुक होंठ,
घुँघराली केश वल्लरी,मोगरा सजा,कुशलता से गोंठ,
हठपूर्वक मंगाया जो मुझसे,वो नवलखा गले में साजे,
मेरे अँगना में तुम्हारी पायल,रुन-झुन,रुन-झुन बाजे,
पावों की लाली ऐसी,ज्यों फूलों की सुर्खी ही रचा डाली,
तुम्हें क्या कहूँ प्रिय तुम तो हो,पूरी ही बगिया निराली!

धन्य हुआ हूँ पाकर तुमको,ये अहसास कराया मुझको,
तुम्हारा हुक्म पत्थर की लकीर,पूरा करना हम सबको,
तुमने तो इशारों पे उंगली के,है मुझे सारी उम्र नचाया,
फिर भी समाज में तुम संग रहके,सभ्य मैं हूँ कहलाया,
तारीफ़ सुन अपनी न थको तुम,ये है लीला अपरम्पार,
फिर भी प्रिये अति प्रिय हो मुझे,तुमसे मेरा घर-संसार!

                                                                                                ( जयश्री वर्मा )


Monday, October 24, 2016

"शुभ दीपावली"मनाएं

चलो दीप पर्व को,इस वर्ष,कुछ अलबेला सा मनाएं,
बुराइयों को बुहार के,आँगन में,खुशियों को ले आएं,
नवल वसन हों,भाव शुभता संग,आपसी प्रेम जगाए,
इस दीपावली को,मिल सब "शुभ दीपावली"बनाएं।

बढ़ाऊं दीपक,मैं हांथों से,और बाती को आप जगाएं,
विपरीत पवन,अगर तेज बहे तो,हथेली ओट बचाएं,
ले चलें उस,अँधेरी चौखट पे,जहां कहीं लगे वीराना,
हाथ बढ़ा के,नेह का सब मिल,जगमग दीप जलाएं।

शब्द सुनहरे आप चुनें,और संग में,सुरलहरी मेरी हो,
राग एक हो,तान एक हो,सबमें स्नेह लहर गहरी हो, 
गीत सरल हो,पकड़ गहन हो,जीवन संगीत सजाएं,
मधुरता से,गूँथ के हृदयों को,अपनत्व धुन बिखराएं।

रंग इन्द्रधनुष के,मैं समेट लूँ,कल्पनाएं आप सजाएं,
अल्पना के बेलबूटों में,सारे रंग,एकता के भर जाएं,
नारंगी,सफ़ेद,हरा रंग सुन्दर,सबसे ही प्रखर लगाएं,
इस दीपावली पर हिलमिल के,शुभता प्रतीक रचाएं।

मैं खुशियाँ,चुनकर ले लाऊँ,मुस्कुराहट आप फैलाएं,
मीठी बातों के संग हम,इक दूजे के,हृदयों बस जाएं,
धोखा,झूठ,मनमुटाव छोड़,मानवता को गले लगाएं,
इस त्यौहार,गले मिल आपस में,भाईचारा अपनाएं।

बिजली के बल्ब न हों,दीपों की झिलमिल लड़ी हो,
चेहरे पे मुस्कराहट सबके,खुशियों की फुलझड़ी हो,
भूखे पेट न सोए कोई भी,हर शख्स तृप्ति रस पाए,
स्वागत,सौहार्द से,मिलजुल सब मिलबांट के खाएं।

न हो उदासी,किसी ओर,खुशियों का अम्बार लगे,
न हो अंधियारा,कहीं पर,दीपक सारे जगमग जगें,
हिलमिल खुशियाँ,उमंग हृदय,अमावस को हराएं,
चलो हम सब मिल संग में"शुभ दीपावली"मनाएं।

                                                        ( जयश्री वर्मा )


Friday, October 7, 2016

कांटे की व्यथा

इक रोज़ पार्क में,बैठा था मैं,इक क्यारी के पास,
तभी आवाज़ आई,कुछ अपरिचित सी,कुछ ख़ास,
फिर चहुँ ओर मैंने,नज़र दौड़ाई,पर दिखा न कोई,
सोचा कि शायद,मेरे अंतर्मन का ही,भ्रम है कोई। 

फिर देखा,इक पौधे का काँटा,मुझको देख रहा था,
कुछ सवालिया सी दृष्टि,मुझ पर ही वो फेंक रहा था,
मैंने पूछा,क्या तुम्हें ही मुझसे,कुछ पूछना ख़ास है?
याकि मुझे यूँ ही,हो चला किसी भ्रम का,आभास है। 

वह बोला,ये सच है मैं तुमसे ही,मुखातिब हो रहा हूँ,
तुम भ्रम न समझो,मैं तुमसे सच में ही,बोल रहा हूँ,
कुछ सवाल हैं मेरे,मुझे तो तुम बस,उत्तर बतला दो,
मेरे मन की,यह उलझन,बस तुम जरा सुलझा दो।

मैं बोला,कि चलो कहो,क्या तुम्हारी प्रश्न-कथा है?
कह डालो,मुझसे आज,जो अंतरमन की व्यथा है,
वह बोला,क्यों भेद बड़ा है,मेरे और पुष्प के बीच?
जबकि एक डाल,रस,एक ही जल से गए हैं सींच।

तुम कवि हो कहो,तुम्हारा विषय,मैं क्यों न बना?
मुझपे,तुम्हारी लेखनी ने,भाव सुंदर क्यों न चुना?
फूल की ही,प्रशंसा पे तुमने,पोथियाँ हैं भर डालीं,
सारी ही सुन्दर उपमाएं,उसके नाम ही कर डालीं।

मैं कितना हूँ बलशाली,ज़रा मुझपे,नज़र तो डालो,
और कुछ,बेहतरीन नज़्में,मुझपे भी तो गढ़ डालो,
मेरी ताकत के आगे,देखो हर कोई,कमजोर पड़े,
मुझे छूने से मानव,तितली,भँवरे और पशु भी डरें। 

ताकत के कारण,उसके सर,दम्भ चढ़ा परवान था,
मैं उसकी घमंड भरी,मुस्कान पे,बहुत ही हैरान था,
मैं बोला कि,बुरा न मानो,तो मैं एक बात कहूँ भाई,
जिसको तुम,गुण समझ रहे,वही तो हैअसली बुराई।

शूल हो तुम,काम तुम्हारा,सिर्फ दुःख और दर्द देना,
सुख न देना कोई,बस,यूँ ही ताकत में,अकड़े रहना,
शूल से ही तो,सूली बनी,जिसका जान लेना काम है,
पुष्प भले ही,नाज़ुक सही,पर दिल मिलाना काम है। 

पुष्प तो,रंग दे जहान को,और खुशबूओं को नाम दे,
जन्म,मृत्यु,विवाह या मंदिर हो,हर जगह ही काम दे,
है पुष्प लचीला,हलकी हवा के,झोंकों में ही झूम ले,
जो भी उसे,प्यार से ले उठा,उसके हांथों को चूम ले।

दिलदार इतना कि,ओस की बूँदें भी,उस पर ठहर सकें,
रंग सुन्दर देख के,पंछी और तितलियाँ,आकर के रुकें,
इस प्यार और त्याग की तो,दुनिया ही पूरी दीवानी है,
गर कवि न मुग्ध हो,तो ये उसकी कलम की,नादानी है।

सारे जहां में रंग बिखेरे,ऐसा तिलस्मयी है उसका प्यार,
चरणों से शीश तक राज करे,ऐसे हैं उसके गुण हजार,
दुनिया भर में,प्रेम दिवस पे,जवां दिलों की वो आस है,
क्या अब तुम्हें अवगत हुआ,क्यों पुष्प दिल के पास है ?  

                                                                  ( जयश्री वर्मा)