Sunday, February 20, 2022

लड़की हो तुम


ज़माना सही नहीं है,ज़रा सम्हल के रहो, 
पर्दा करो,धीरे बोलो,यूँ न मचल के कहो, 
अपनी नज़रों को,जमीन से लपेट के चलो,
बेहतर है,निज परछाइयों को समेट चलो,  
कुछ लोग हैं जो के,नज़रों से बींध देते है।  

के आवाज ऊँची है,ज़रा अदब से बोलो, 
यूँ खिलखिला के नहीं,मुँह दबा के हंसो, 
हर किसी से ऐसे,दोस्ताना क्यों रखना है?
तुम्हें मुकर्रर हदों को,पार क्यों करना है? 
कुछ लोग हैं जो के,लफ़्ज़ों से चीर देते हैं।  

लड़की हो तुम,तो प्यार की चाहत क्यों है? 
के ऐसे बातों को,काटने की आदत क्यों है? 
और तुम्हें क्यों उड़ान भरनी है,आसमान में? 
आख़िर लड़कों की बराबरी,क्यों है ध्यान में? 
कुछ लोग हैं,जोके ज़िंदगी ख़ाक बना देते हैं। 

निज ख्वाहिशों के पंछी,पिंजड़े में क़ैद रखो,
कपड़ों की तहें ओढ़ो,थोड़ा सा सभ्य दिखो,
पढ़ो-लिखो,समाजिकता से,अदावत क्यों है?
यूँ हक़ों की बात करने की,हिमाकत क्यों है?
कुछ लोग हैं,जोके इंसान हैं हम,नकार देते हैं।

बाप,पति,बेटे की निग़हबानी का क्यों है गम,
यूँ ऊँचे-ऊँचे ख़्वाबों की हकदार नहीं हो तुम,  
किसी न किसी की निगरानी में तो रहना होगा, 
शरीर से कमजोर हो तो तुम्हें सहना भी होगा, 
कुछ लोग हैं,जोके ज़िन्दगी गुनाह कर देते हैं। 
 
                                                   - जयश्री वर्मा 

6 comments:

  1. बिल्कुल सही कहा आपने!
    लड़कियों को पता नहीं कितनी बार लड़की होने की नसीहत देकर उनके सपने को सपना ही रहने दिया जाता है और उन्हें घर में कैद कर दिया जाता है! ऐसे मत बोलो तुम लड़की हो,कभी तुम लड़की हो धीमें चलो,लड़की हो ऐसे बैठो,पता नहीं कितनी हिदायतें दी जाती है लड़की के नाम पर! कहते हैं लड़की के रूप में तुम्हारा जन्म हुआ है इसलिए दब कर रहना पड़ेगा
    कभी-कभी लगता है कि लड़की होना कोई गुनाह है!

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    1. लड़की होना कोई गुनाह नहीं मनीषा गोस्वामी जी !बस कुछ संकुचित मानसिकता के लोग अपनी गलत धारणा के चलते लड़कियों को कमतर समझते हैं और इसी सोच के तहत वे लड़कियों के जीवन को अपने हिसाब से चला कर दूभर कर देते हैं और यह एक कटु यथार्थ है।इसी धारणा को गलत साबित करने के लिए हमें संघर्ष करते रहना है ताकि आने वाली लड़कियों के लिए जीवन सरल और बेहतर हो सके। 🙏 😊

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  2. ज़माना सही नहीं है ज़रा सम्हल के रहो, ... बहुत सही लिखा औरत के लिए कभी जमाना सही था भी नहीं और नहीं होगा। हम कितना संभल कर चलते है मायने रखता है। अभी हाल ही में चार फ़रवरी नागौर की घटना है। सादी सुदा औरत के साथ घटी घटना शब्द नहीं कैसे लिखूँ। यही कहूंगी माता पिता का कहना और विवेक से चलो।
    सराहनीय सृजन।
    सादर

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    1. हर काल-परिस्थिति में ज़माने में लड़कियों को ही गलत ठहरा कर जीवन जीने के सलीके सिखाए गए हैं। कुछ घटनाएँ अप्रिय भी घटती हैं पर उसके कारण जीवन को बाँधा नहीं जा सकता। ये घटनाऍं मानसिक निर्बलता और उद्विग्नता का द्योतक है और कुछ नहीं। 🙏 😊

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  3. सादर धन्यवाद आपका रविंद्र सिंह यादव जी !🙏 😊

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