काश! तुम समझते,इस दिल की ये लगन मेरी ,
रह-रह तुम पे रीझना,और ये मन की अगन मेरी,
जब याद में सुलगना ही,सार्थक सा लगने लगे ,
हर पल कोई इच्छा जगे,बुझे और फिर से जगे।
कुछ यूँ हुआ है कि,मन जैसे हुआ है सूरजमुखी ,
तुम सूरज सरीखे,जिसे निहार होती हूँ मैं सुखी ,
इक अजीब से,अव्यक्त अहसास संग जीती हूँ ,
तुम्हें देखके तुम्हारी छवि को,मैं बूँद-बूँद पीती हूँ।
ऐसा लगने लगा है,मैं हूँ इक नदिया विकल सी ,
तुम सागर सरीखे,मैं तुमसे मिलने को अधीर सी,
अतृप सी दौड़ती,मचलती,छलकती हुई आती हूँ ,
तुम्हारे एहसास संग अपना सार सम्पूर्ण पाती हूँ।
तुम जैसे बन गए हो चाँद,मेरे इस मन आसमां के ,
तुम्हें चकोर बन निहारना,जैसे सुख सारे जहां के ,
हर रोज़ के इंतज़ार में मैं,पल-छिन यूँ बिताती हूँ ,
के तुम्हारी आने की राह पर,मैं पलकें बिछाती हूँ।
क्या समझा है कोई,इस प्रेम का मतलब क्या है ?
जीवों में जान,फूलों में खुश्बू,और ये चाहत क्या है ?
दैहिक न समझो इसे,ये आत्माओं का ही गंतव्य है,
ये ही तो यथार्थ है,ये ही जीवन जीने का मंतव्य है।
- जयश्री वर्मा
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 7.7.22 को चर्चा मंच पर चर्चा - 4483 में दिया जाएगा | चर्चा मंच पर आपकी उपस्थिति चर्चाकारों का हौसला बढ़ाएगी
ReplyDeleteधन्यवाद
दिलबाग
बहुत-बहुत धन्यवाद आपका !🙏 😊
Deleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 07 जुलाई 2022 को लिंक की जाएगी ....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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सादर धन्यवाद आपका !🙏 😊
Deleteवाह!बहुत सुंदर हृदयस्पर्शी सृजन।
ReplyDeleteसादर
हार्दिकअभिवादन आपका !🙏😊
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