Wednesday, April 15, 2020

आना-जाना लगा रहेगा

सुख-दुःख हैं जीवन के साथी,ये आना-जाना लगा रहेगा।

खुशी आए,जी भरके जी लो,
हँस लो,खेलो,उमंगें भर लो,
दीप जलाओ,पुष्प बिछाओ,
मिल जुल,एक दूजे के साथ,
बाँटो खुशियाँ,मौज उड़ाओ,
हरियाला सावन,पतझड़ सूना,ये आना-जाना लगा रहेगा।

दुःख आए तो,मत घबराना,
कुछ पल ही,ठहरेगा ये भी,
धैर्य धरना,मन हार न जाना,
दिल में,न पीर बसाना तुम,
आंसू आएँ,तो बह जाने दो,
रात अँधेरी फिर सुबह सुनहरी,ये आना-जाना लगा रहेगा।

जीवन सुख,दुःख का है झूला,
दुःख इसपार,तो सुख उसपार
संतुलन साधो,सब सध जाएगा,
और सुख घूम,इस पार आएगा ,
समय बदलेगा,लगेगी देर नहीं,
पूस की ठिठुरन,जेठ की गर्मी,ये आना-जाना लगा रहेगा।

जन्म-मृत्यु,तो है निश्चित सबकी,
इस बीच की कहानी,लिखनी है,
मन माफिक,जो गढ़ ली जैसी,
वो गाथा,बस वैसी ही बननी है,
ईश्वर से,कैसा शिकवा करना ?
जन्म के सोहर,मृत्यु से बिछड़न,ये आना-जाना लगा रहेगा।

अपनाना,ठुकराना,रिश्ते बुनना,
हठ,स्नेह,दगा,दोस्ती,राहें चुनना,
प्यार,त्याग,मिलना,खोना,पाना,
कहना,सुनना,रूठना,समझाना,
जीवन है अनुभव,ये बातें गुनना,
साँसों का चलना,साँसों का थमना,ये आना-जाना लगा रहेगा।

सुख-दुःख हैं जीवन के साथी,ये आना-जाना तो लगा रहेगा।

                                                             - जयश्री वर्मा 

Wednesday, March 25, 2020

मैं तुमसे मिली थी


मैं तुमसे मिली थी-
सूरज की लाली की गर्माहट में,
पुष्प-पंखुड़ी की मुस्कराहट में,
कैनवास के रंगों की लकीरों में,
शरारत से भरे नयनों के तीरों में,
झरने से उड़ती हुई शीतलता में,
मन की कमजोर सी अधीरता में,
गीतों की सुरीली सी सुरलहरी में,
दहकते गुलमोहर की दोपहरी में,
कल्पना की आसमानी उड़ान में
संध्याकाल धुंधले से आसमान में,
यादों की सड़क के हर मोड़ में,
क्षितिज के मिले-अनमिले छोर में,
मैं तुमसे मिली थी-
रात इठलाते चाँद की चमक में,
नदिया की लहरों की दमक में,
तितली के तिलस्मयी से पंखों में,
इंद्रधनुष के जादुई सप्त-रंगों में,
नवयौवना की खिलखिलाहट में,
कहानी की अंतरंग लिखावट में,
फूलों से महकती हुई अंजुरी में,
पेड़ से मदहोश लिपटी मंजरी में,
तालाब में तैरती हुई कुमुदनी में,
पंछी कतार छवि मनमोहिनी में,
हरसिंगार के दोरंगे से फूलों में,
और यौवन की मीठी सी भूलों में,
जब भी खूबसूरती की बात हुई-
मैं सच कहती हूँ-
मैं तुमसे मिली थी-
क्या तुमने अब भी नहीं पहचाना,
अरे मैं! हृदय की कोमल भावना।

                                        - जयश्री वर्मा






  

Wednesday, March 11, 2020

फर्क कहाँ है ?

गुलाब लगा हो मंदिर,मस्जिद में या के गिरजाघर में,
जब उसका नाम गुलाब ही रहेगा तो फिर फर्क कहाँ है ?

जो जन्मा है वो जाएगा भी इस जग से कभी न कभी,
जब तब्दील मिट्टी में ही होना है तो फिर फर्क कहाँ है ?

दीप मंदिर,मस्जिद को करे रौशन या गिरजाघर को,
जब उसे उजियारा ही फैलाना है तो फिर फर्क कहाँ है ?

पूजा में हाथ जोड़ें,हाँथ बांधें,या दुआ में ऊपर उठाएं,
जब मांगते सभी सलामती ही हैं तो फिर फर्क कहाँ है ?

अम्मी कहें,मॉम या के माँ पुकारें अपनी जननी को,
जब माँ की ममता सामान ही है तो फिर फर्क कहाँ है ?

मनाई जाए ईद,क्रिसमस या त्यौहार हो दिवाली का,
जब उल्लास-उमंग एक सा ही है तो फिर फर्क कहाँ है ?

कुरान की आयत,कैरोल या के गाएं रामायण चौपाई,
जब कहलाती वो सब प्रार्थना ही है तो फिर फर्क कहाँ है ?

इन पूजास्थलों के झगड़ों में लोग आए और चले भी गए,
जब कोई कभी न लौटा,न ही लौटेगा तो फिर फर्क कहाँ है ?

ये धर्म-जाति की अनर्गल बातें,बीमार सोच से जन्मी हैं ,
जब सुख-दुःख सबके सामान ही हैं तो फिर फर्क कहाँ है ?

हिन्दू,मुस्लिम,ईसाई,बहाई या के हो पारसी समुदाय ,
जब कहलाते सब हिन्दुस्तानी ही हैं तो फिर फर्क कहाँ है ?

सूरज की तपन और चाँद की शीतलता में भेद नहीं है,
जब ये हम सबके लिए सामान ही हैं तो फिर फर्क कहाँ है ?

हम इंसान हैं और इंसानियत ही बने पहचान हमारी,
जब हम ये आत्मसात कर सकते हैं तो फिर फर्क कहाँ है ?


                                                                 - जयश्री वर्मा

Wednesday, February 26, 2020

मैं स्पंदन हूँ

मैं सृष्टि का जना आधा हिस्सा हूँ,
इस पूर्ण सत्य का पूर्ण किस्सा हूँ,
मैं हर स्त्रीलिंग की पहचान में हूँ,
मैं भूत से भविष्य की जान में हूँ ,
मैं मरियम,आयशा और सीता हूँ,
मैं ही रामायण,कृष्ण की गीता हूँ,
मैं सभी धर्म ग्रन्थ का केंद्र भी हूँ ,
मैं काल का लिखा सत्येंद्र भी  हूँ,  
मैं तुममें,तुममें और तुममें भी हूँ ,
मैं खुदके भी जीवन स्पंदन में हूँ,
मैं इक ममत्व,त्यागपूर्ण जननी हूँ, 
मैं माँ,बेटी,बहन और सहचरी हूँ,
मैं स्त्रीलिंग हूँ,सृष्टि को सहेजे हुए,
मैं कई सभ्यताओं को समेटे हुए,  
मैं तो हूँ जीवन का उन्मुक्त हास,
मैं हूँ अनंत प्रेम की अतृप्त प्यास,
मैं नारी हूँ मैं रिश्तों का बंधन हूँ,
मैं विनाश का इक क्रंदन भी हूँ ,
मैं मंदिर की नौ रुपी देवी भी हूँ,
मैं प्रतिज्ञा की सुलगती वेदी भी हूँ,
मैं अहँकारी के मान का भंजन हूँ,
मैं हर जीवित-जीव का स्पंदन हूँ,     
मैं प्रेमी हृदय की कोमल नायिका,
मैं टूटे मन की हूँ इक सहायिका,   
मैं घर की चौखट का इंतज़ार हूँ ,
मैं समस्त परिवार का प्यार भी हूँ,
मैं श्रेष्ठ श्रृंगार बिछिया-सिन्दूर हूँ,
मैं जितनी पास हूँ उतनी दूर भी हूँ,   
मैं रसोई की स्वादमय खुशबू हूँ,
मैं शिशु की दुनिया की जुस्तजू हूँ,
मैं केंद्र हूँ कवि की कल्पनाओं का, 
मैं रंग कैनवास की अल्पनाओं का ,   
मैं इस सोलर सिस्टम की धड़कन हूँ , 
मैं इकमात्र स्त्रीलिंग ग्रह धरती भी हूँ।

                                         - जयश्री वर्मा



Tuesday, February 18, 2020

आओगे के न आओगो

ये मौसमों का आवाज़ देना,जगाना,बुलाना,हर पल ,
और पलकों संग ख़्वाबों की,लुका-छिपी की हलचल ,
के इन हवाओं का बहना,बिना बंधन हो के बेपरवाह ,
इंतज़ार है तुम्हारा,तुम आओगे या के न आ पाओगे।

मेरे पहलू में बैठो तो ज़रा,बातें कहो-सुनो तो ज़रा ,
मेरे और अपने दिल के,जज़्बातों को,गुनो तो ज़रा ,
कुछ पल अपने ये,मेरे नाम लिख कर के तो देखो ,
फिर नहीं पुकारूंगा,रुकोगे या के न रुक पाओगे।

कुछ अपनी,मौसमों,और इन पंछियों की बात करो ,
के मेरे जज़्बात संग,अपने विश्वास की हामी तो भरो ,
कुछ कदम तो साथ चलो,फिर रहा फैसला तुम्हारा ,
मेरी धड़कनों को सुन पाओगे या के न सुन पाओगे।

ऐसा नहीं है कि,हर कोई ही,गुनहगार हो दुनिया में ,
ये वादा रहा,खुशियाँ ही उगाऊंगा,जीवन बगिया में ,
खरा ही उतरूंगा,हर कदम,अब मर्ज़ी तुम्हारी आगे ,
चाहा तुमने भी है,कह पाओगे या के न कह पाओगे।

यूँ तो तुम्हारे ठिठके कदम भी,अब आगे बढ़ते नहीं हैं,
तुम्हारे ख्वाब भी जो थे तुम्हारे,अब वो तुम्हारे नहीं हैं,
तुम्हारी मन वीणा का,हर तार ही पुकार रहा है मुझे, 
अब है फैसला तुम्हारा,लौटोगे या के न लौट पाओगे।

के आ भी जाओ इस दुनिया की राहें बड़ी बेरहम हैं ,
जहाँ बिछड़े,उसी मोड़ पे,इंतज़ार में अबतक हम हैं ,
इतनी भी कमजोर नहीं है मेरी मुहब्बत की ये ज़मीन,
खाली न जाएगी दिल की पुकार,तुम आ ही जाओगे।                        
                                                                                             -  जयश्री वर्मा

Thursday, February 6, 2020

ऐसा कुछ भी नहीं

क्यों नहीं कह देते जो कोई,मन में आरज़ू है तुम्हारे,
शायद ख़यालात एक जैसे,मिलते हों तुम्हारे-हमारे,
के जो कोई पल बेचैन कर गया हो,तुम्हारे दिल को,
शायद वैसा लम्हा मैने भी अपने ज़ेहन में जिया हो।

कि कहीं तुमने भी तो किसी की,रुसवाई नहीं सही?
और तुम्हारी टूटन की आवाज़,जो है अंदर दबी हुई ,
हमदर्द कोई न मिला तभी,कसक किसी से न कही,
मेरी भी तो अपनी दास्तान,कुछ-कुछ ऐसी ही रही। 

कह डालो आज कि हम दोनों,एक ही जैसे मिले हैं,
लगता है हमारे तुम्हारे,एक से शिक़वे और गिले हैं,
रिश्ते सबके ही स्नेह भरे,अपनत्व पूर्ण तो नहीं होते,
वर्ना भला क्यों अरमान,दिल के दिल में ही सुलगते।

सुख का ही नहीं दुःख का भी,अटूट रिश्ता होता है,
वर्ना क्या ऐसे,एकांत का हाथ थामे,कोई दिखता है?
वीराने में जैसे इक उम्मीद का,फूल खिल आया  है,
शायद वक्त ने हताशा से,बचाने को,हमें मिलाया है। 

न रोको आंसू ये सुलगते हुए,ख्यालातों को बुझाएँगे,
सोच की धुंध को धुल के,नई जीने की राह दिखाएंगे,
कि ऐसा कुछ भी नहीं,जिसे वापस न लाया जा सके,
उदास चेहरे पे मुस्कान को,पुनः खिलाया न जा सके।

फूल आज भी तो खिले हैं,सवेरा आज भी तो उगा है,
के रात बेरहम गुज़री है अभी,चाँद पुराना हो चला है,
क्या अँधेरा कभी रोक सका है,सुबह की लालिमा को?
यूँ ही वक्त भी मिटा देगा,इन लम्हों की कालिमा को।

क्यूँ नहीं भुला सकते,जो भविष्य हमने ही लिखा था ?
क्यूँ न गुज़री बात मान लें,जो रिश्ता अटूट दिखा था ?
हारते नहीं हैं यूँ,कि हर शय से,जूझना आना चाहिए,
ऐसा भी नहीं कि गम को,भुलाने को ज़माना चाहिए।

                                                       -  जयश्री वर्मा 

Friday, November 29, 2019

चाहत हो जाती हूँ


सप्तरंगी इंद्रधनुष,
खुश्बुएं हजार किस्म,
भिन्न रूप-आकार लिए,
खिलती हूँ,खिलखिलाती हूँ,
प्रकृति के फूलों की महक सी,
मनमोहक बनके दिलों में समाती हूँ,
जन्म से अंत तक बस रौनकें जगाती हूँ,
जब कभी मैं पुष्प सी मनोकामना हो जाती हूँ।

अपने मन-पंखों में,
कई रंग-आकार लिये,
यहाँ-वहाँ पवन सुगंध-संग,
घूम-घूम,दूर पुष्पों में रम जाना,
इतराना,खुद में ही खोए हुए इठलाना,
नयनों की इक कोमल कामना हो जाती हूँ,
के नेत्रों के रास्ते उतर,सभी दिलों में समाती हूँ,
जब कभी भी मैं तितली सी शोख़ चंचल हो जाती हूँ।

मधुर से गीत-सुर,
जादुई शब्द-जाल बुन,
लहरियों के उतार-चढ़ाव,
ऊँचे से ऊँचे और नीचे से नीचे,
रागों के आरोह से अवरोह तलक,
निम्न सुर से सप्तक की हर उठान तक,
हर जन मानस की मन-तन्द्रा पे छा जाती हूँ,
जब मैं मधुर संगीत की इक सुरलहरी हो जाती हूँ।

ऊँचे पर्वतों के हौसले,
गहरी सी सागर कि साँसें,
धैर्य के लहलहाते हरेभरे खेत,
रेगिस्तान की जलती जीवित रेत,
वृक्ष,पुष्प,झरने,बादलों का बहकना,
डूबते सूरज के रंग संग,पवन का महकना,
जीवनपूर्ण रिमझिम के संग खुशियां बढ़ाती हूँ,
जब मैं प्रेम और त्यागमयी धरती सी बन जाती हूँ।

                                                     - जयश्री वर्मा

Friday, November 8, 2019

बहुत कुछ अनकही

मित्रों !मेरी इस कविता कि कुछ पंक्तियाँ समाचार पत्र " दैनिक जागरण " में छप चुकी हैं , आप लोग भी इसे पढ़ें।


रात बड़ी खामोश थी पर,बहुत कुछ अनकही कह गयी,
उफ़ भी न बोली और , बहुत कुछ असहनीय सह गयी ।

 माँ की आधी लोरी के बीच,सोया हुआ नन्हा सा बच्चा,
प्रिय का किया वादा,थोड़ा सा झूठा और थोड़ा सच्चा।

मंत्रियों की राजनीतिक बातें,और बातों की गहरी घात,
दिन भर की झिकझिक,रात शराब संग हुई बरदाश्त।

बेला की मादक खुशबू,घुंघरूओं की छलिया छन-छन,
हर वर्ग के आदत से लाचार,पहुँच जाते हैं वहां बन-ठन।

मन की गन्दगी के वशीभूत,तन की गन्दगी में लोटते हैं,
घर पर राह तकती पत्नी के,मन में डर के घाव फूटते हैं।

रौशनियों में डूबी,खिलखिलाहटों की दर्द भरी रवानी है,
पलभर खुशी की तलाश की,लुटने-लुटाने की कहानी है।

किसी के हाथ मेहँदी सजी,कोई विवाह के नाम जल गयी,
जीवन संगिनी थी,तो फिर क्यों,दहेज की बलि चढ़ गयी ।

बड़े-बड़े खिलाड़ियों के खेलों की,होती करोड़ों की सेटिंग,
कौन कितना खेलेगा उसके ही,हिसाब से है उसकी रेटिंग।

कभी राज़ को राज़ रखने के बदले,कोई जान ली जाती है,
फिर अगले दिन उजाले में,झूठी तहकीकात की जाती है।

दशहरा,दुर्गापूजा,रमजान,क्रिसमस के,जश्न भी तो होते हैं,
कहीं बहुतों को समेटे गोद में,सुलगते शमशान भी रोते हैं।

कहीं घरों में चुपचाप खौफ़नाक,इरादों संग लुटेरे घुसते हैं,
निरीह,एकाकी बुज़ुर्ग,लाचार उनकी,दरिंदगी में पिसते हैं।

कहीं पे झाड़-फूंक,गंडे-ताबीजों की,तांत्रिक लीलाएं होती हैं,
कहीं धूनी रमाते बाबाओं की,खौफ़नाक रासलीलाएँ होती हैं।

सड़कों पर रातों में दौड़ती,100 नंबर पुलिस गश्त करती है,
मगर वो वारदातियों को कभी भी,रंगे हाथों नहीं पकड़ती है।

रात बड़ी खामोश थी पर,बहुत कुछ कहा,अनकहा कह गयी,
उफ़ भी न बोली ये,और बहुत कुछ,असहनीय सा सह गयी ।

                                                                ( जयश्री वर्मा )



Tuesday, September 17, 2019

कुछ-कुछ जाना है

कलियाँ कब,क्यों चुपके से,फूल बनके महकें ?
ये भँवरे गुन-गुन सुन ज़रा,क्या कुछ हैं कहते ?
तितलियाँ भी क्यों रंग जादुई,परों में हैं भरतीं ?
डाल-डाल क्यों रुकतीं,और फिर से हैं चलतीं ?
कुछ-कुछ तुमने भी समझा है,और कुछ-कुछ मैंने भी जाना है।

कोयल कुहू-कुहू क्यों,मतवाले गीत है गए ?
पपीहे की पीहू-पीहू क्यों,यूँ शोर सा मचाए ?
डालियाँ पवन संग क्यों यूँ,झूम-झूम हैं जाएं ?
सर-सर के मदभरे से क्यों,गीत फ़ुसफ़ुसाएं ?
कुछ-कुछ तुमने भी समझा है,और कुछ-कुछ मैंने भी जाना है।

हरी-भरी चादर ओढ़ के.ये धरा क्यों इतराए ?
आकाश भी धरा पे क्यों,रीझा-रीझा सा जाए ?
क्षितिज पे लगें दोनों ही,साथ मिलते से जाएं ?
तराने प्रेम भरे से भला क्यों,ये संग गुनगुनाएं ?
कुछ-कुछ तुमने भी समझा है,और कुछ-कुछ मैंने भी जाना है।

इक शून्य से ये जन्मी और,विराटता है इसने पाई ,
ये सृष्टि कहाँ से चली,और कहाँ तक हमें ले आई ,
उत्थान,पतन,अमरत्व की,अजब सी ये कहानियां ,
रीतों,गीतों की जीवंत,खिलखिलाती हुई जवानियाँ ,
कुछ-कुछ तुमने भी समझा है,और कुछ-कुछ मैंने भी जाना है।


गुज़रता वक्त क्या है कहता,सुनो तो मन लगा के,
ध्यान से सुनो तो ज़रा,भावों का प्रेम-दीप जगा के,
कुछ आमंत्रण सा छुपा है,इन बहकती हवाओं में,
शायद राज़ उजागर हैं,हमारी-तुम्हारी वफाओं के,
कुछ-कुछ तुमने भी समझा है,और कुछ-कुछ मैंने भी जाना है।

                                                              - जयश्री वर्मा

Monday, September 2, 2019

ज़िन्दगी में ढली मैं

माँ की कोख में रची मैं,ज़िन्दगी में ढली मैं ,
पिता की बाहों के पालने में,खेली-पली मैं ,
आँगन की चिरैया सी,चहक-चहक डोली ,
मीठी सी मुस्कान संग,खिलौनों की झोली।

भाई-बहन के रिश्ते का,पाया ढेर सारा प्यार ,
सखियों संग सवालों,और जवाबों की बहार ,
हर पल-दिन गुज़रा,ढलीं चांदनी सी रातें भी ,
यूँ बदले कई मौसम,गुज़रीं कई बरसातें भी।

ख़्वाब हुए जवान जब,यौवन ने रंग दिखाया,
कल्पनाओं ने तिलस्मयी,जहान इक बनाया,
सपने क्या थे बस,इक जादुई सी दुनिया थी ,
सतरंगी ख़्वाबों से भरी,दिल की पुड़िया थी।

फिर माँ की चिंता और बाबुल का था हिसाब ,
पसंदी न पसंदी के,अजीब से सवाल-जवाब ,
फिर सात फेरों संग,बेटियां पराई बनाने की ,
ऐसी ही तो ये रीत है,घर-आँगन छुड़ाने की।

संग आई थी प्रीत लिए,हर रिश्ता निभाने को ,
पर दिखीं तौलती सी निगाहें,बातें उलझाने को ,
तमाम उम्मीदें थीं,जिम्मेदारियों का बोझ था ,
बात-बात पे टिप्पणी थी,ताना और क्रोध था।

ख़ुशी,उत्साह,ख़्वाबों ने,जैसे उदासियाँ ओढ़ीं ,
प्रश्न,प्रश्न और प्रश्नों ने,उम्मीदें सारी ही तोड़ीं,
अकेले ही चलना था,अकेले ही सम्हलना था ,
ससुराल के नियमों में,अकेले ही ढलना था।

जो अपना बनाने को लाए थे,तो अपना बनाते ,
पराया कह पुकारा,क्यों ये शिकवा,शिकायतें,
बेटे संग उसकी सहचरी को भी,गले से लगाते ,
वंश बढ़ाने वाली का,काश सम्मान भी बढ़ाते।

तो न घटतीं बेटियां,न चढ़तीं दहेज़ की बलि ,
बेटी पैदा होने पे,घरों में न मचती यूँ खलबली ,
न समाज में असुरक्षित यूँ,माहौल ही मिलता ,
दोयम दर्जे का अहसास,यूँ मन में न पलता।

तो जीवन के मायने,अलग ही कुछ और होते ,
बेटी के जन्म लेने पर माँ-बाप,यूँ कभी न रोते ,
बेटी के आगमन पे भी,घरों में जश्न खूब मनाते ,
गर बहू-बेटियों को भी,हम बेटों सा अपनाते।

                                               - जयश्री वर्मा


Monday, August 26, 2019

तुम्हारे जाने के बाद

तुम क्या जानो के ऐसे,तुम्हारे जाने के बाद ,
कैसा बेबस सा हुआ,ये मेरा मन,ये मेरा तन ,
के देहरी पर निगाह,ठहर सी जाती है मेरी ,
जहाँ पे कि पग आहटें,पुकारती हैं तुम्हारी। 

गर कुछ भी न था,तो फिर ये संतति हमारी ,
जो है हमारे-अपने प्रेम की अमिट निशानी ,
जिस पर तुम्हारी,झलक का घना पहरा है ,
जो आधा तुम्हारा,और आधा मेरा अपना है।

न जाने कितनी ही रातें,आँखों में जागी हूँ मैं ,
बिन आँसू के रोई हूँ,ऐसी इक अभागी हूँ मैं ,
के दूर होकर भी,मेरे साथ सदा रहते हो तुम ,
मेरी यादों,बातों,साँसों में,सदा बसते हो तुम।

उफ़! इतनी विरक्ति के साथ तुम बने रहे मेरे ?
क्या सब झूठ था?वो समर्पण,वो बाहों के घेरे?
मैं तो स्वयं को हमेशा से ही,धन्य मानती रही,
तुम सिर्फ मेरे हो,बस ये एक सच जानती रही।

कुछ आभास तो हुआ था,पर हृदय न माना था ,
ये दृष्टिभ्रम है इक,मेरे अंतर्मन ने यही जाना था ,
ये नहीं जानती थी कि,यूँ अनहोनी बुला रही हूँ ,
खुद के अन्त की,मैं खुद ही,कहानी बना रही हूँ।

सदा दिल ने माना,मैं जिस्म और जान हो तुम ,
के मेरी इस जीवन-कहानी का,प्रमाण हो तुम ,
तुम्हारे ही साथ में,मैं अपने,ये दिन-रात ढालूँगी,
हाथों में हाथ ले,मैं जीवन के रास्ते निकालूँगी।

भरोसा था मुझे कि मेरा प्यार,कहीं नहीं जाएगा ,
के भला मुझ जैसा सच्चा दिल,कौन नहीं चाहेगा,
बड़ा ही गुरूर था खुदपे,के सब सम्हाल लूँगी मैं ,
नहीं जानती थी के ऐसे किस्मत उछाल लूँगी मैं।

न जाना था ये फरेब,मेरी ही कहानी बन जाएगी,
इस दिल की धड़कन से,भावनाएँ  दूर हो जाएँगीं,
अब जाना कैसे,आँखों के ख्वाब,बैरी हो जाते हैं,
और कैसे,जिस्म से,जिस्म के साए,गैर हो जाते हैं।
                                          
                                                     - जयश्री वर्मा








  




Monday, August 5, 2019

ये क्यों है ?

ये अपनों के ही दरमियान,खड़ी दीवार क्यों है ?
के आज आदमी ही,आदमी का शिकार क्यों है ?
मशीनी से जिस्म हुए,भावों के समंदर रीत गए ,
ये भाई-भाई के बीच में,खुली तकरार क्यों है ?

बचपन के दिन नहीं दिखते,अब बेफिक्र,सुनहरे ,
सबको ही शक से देखते हैं नवनिहालों के चेहरे ,
बोल फूटते ही,ये सीखते हैं,फरेबों के ककहरे ,
ये यूँ इक दूजे को,हराने की लगी कतार क्यों है ?

जवानी नहीं है अब,मासूम और शरमाई हुई सी ,
वादे,वफ़ा की बातें,अब करता नहीं है कोई भी ,   
सब कुछ ही खुलापन लिए,खुली किताब सा है ,
ये दो दिलों के बीच,बिछा हुआ व्यापार क्यों है ?

बुढ़ापे को निराश्रित होने के,भय की आहट है ,
बस-इंतज़ार,याद,आँसू वृद्धाश्रम की चौखट है ,
के सेवा-सम्मान कैसे,खो गया दुनिया में कहीं ?
ये जीते जी खोदी गई,रिश्तों की मज़ार क्यों है ?

शुष्क से माहौल में जन्मे-पले,बंजर दिल लोग ,
ये फूल-तितली,चाँद-तारों की,बातें नहीं करते ,
क्यूँ अपनी ही तलाश में,भटक रहा है हर कोई ,
के हर ज़िन्दगी को,ज़िन्दगी की तलाश क्यों है ?

ये सवाल कौंधते हैं,हर तरफ,सवालों को लिए ,
बुझते नहीं हैं,टिमटिमाते हुए,आशाओं के दिए ,
इन्हीं आशाओं के सहारे,कट जाती है हर उम्र ,
मुस्कुराहटों को ओढ़े,भविष्य की उम्मीद लिए।  

                                                   - जयश्री वर्मा



Saturday, July 27, 2019

ऐसे कितने ही जाधव

न जाने कितने जाधव,कितनी विदेशी जेलों में फंसे हैं,
आँखों में झाइयाँ,शरीर है ढांचा,पर बेड़ियों में कसे हैं।

ये गालियों और लातों की रोटी से,मन का पेट भरते हैं ,
कल की आशाएं संजोए ये,रोज तिल-तिल के मरते हैं।

ये रात-रात,दर्द-दहशत संग,ख्यालों में जागा करते हैं ,
और दिन-दिन भर,जान-रहम की,दुआ माँगा करते हैं।

हर त्यौहार,सपनों में ही ये,अपनों के संग-साथ जीते हैं ,
उनके घर भी होली,क्रिसमस,बैसाखी,ईद कहाँ मनते हैं?

घर की दहलीज़ पे,उनकी आहट की उम्मीद पलती है,
पत्नियाँ उहापोह में,तीज-करवाचौथ कर मांग भरती हैं।

कितने बच्चों को अपने पिता की स्मृति ही नहीं कुछ भी,
दया-तिरस्कार ही नियति है,यही उनका जीवन सत्य भी।

बच्चे भी सुनी बातों,और फोटो के संग,यूँ ही पल जाते हैं ,
हालात के संग वे सब,खुद-ब-खुद,बस यूँ ही ढल जाते हैं।

ये बच्चे मन की उम्मीदों को,मन में ही दफ़न कर लेते हैं,
नहीं है पिता का साया,जान के कोई सवाल नहीं करते हैं।

बूढ़े माँ-बाप की आँखों के,उमड़ते समुंदर भी सूख जाते हैं,
अंतिम क्षण में औलाद को,देख पाने के ख्वाब टूट जाते हैं।

देशों की सरकारों के प्रयास भी नाकाम ही साबित होते हैं,
मीडिया वाले बस उम्मीद,कभी असमर्थता का राग रोते हैं।

ऐसे ही,कितने ही जाधव,न जाने,कितनी ही जेलों में फंसे हैं,
जिनका शरीर उनके साथ है,पर दिल अपने देशों में बसे हैं।

                                                                        - जयश्री वर्मा  


Monday, July 1, 2019

कहाँ से लाओगे ?

यूँ चाहतों का जाल,भेद कर,तुम कहाँ जाओगे ?
जो गर चाहोगे भूलना तो भी,भुला नहीं पाओगे ,
के हमारा हंसना,रूठना,उलझना,मान-मनुहार ,
बंध गए हो जिस बंधन में,वो कैसे काट पाओगे ?

वो मेरा इंतज़ार करना,रूठना,फिर मान जाना ,
फिर तुम्हारी इक इच्छा पे,वो मेरा कुर्बान जाना ,
तमाम पहरों को तोड़,मैं तुम तक चली आती थी ,
दुस्साहसपूर्ण ये सब बातें,तुम कैसे भूल पाओगे ?

मुहब्बत में दूरियां,बेचैनियाँ बढ़ाएंगी,मैंने माना ,
अगर राहें जिक्र करें मेरा,तो तुम लौट ही आना ,
के फूल,बाग़,नदी,और गलियां पूछेंगे बार-बार , 
अपने ही क़दमों के खिलाफ,कैसे बढ़ पाओगे ?

ऐसे किसी के जज़्बात से,खिलवाड़ नहीं करते ,
गर किसी से हो प्यार तो,यूँ तकरार नहीं करते ,
छुड़ाया जो हाथ हमसे,हम रो ही देंगे कसम से ,
मेरी नींदें उजाड़,अपने ख्वाब कैसे बसा पाओगे ?

ढूंढोगे लाख उम्र के बीते लम्हे,पर ढूंढें न मिलेंगे ,
बीते मौसम जैसे फूल,दूसरे मौसमों में न खिलेंगे ,
किसने कहा के काँच,टूट के फिर जुड़ सकता है ?
टूटी हुई उम्मीदों की लौ,फिर कैसे जगा पाओगे ?
                                           
के गर जा ही रहे हो,इक बार मुड़ कर देख लेना ,
मेरी आँखों की हसरत,इक पल को महसूस लेना ,
ये चाहत की ख्वाहिश,दोनों तरफ बराबर ही थी ,
ये सच झुठलाने की हिम्मत,तुम कहाँ से लाओगे ?

                                                                   - जयश्री वर्मा  

Wednesday, May 29, 2019

बनाते नहीं हैं


सच्चाई,सुकून,भरोसा,ये जीवन की खुश्बुएं हैं,
किसी से गर जो मिले,तो उसे भुलाते नहीं हैं,
ख्वाबों में जो खोया निश्छल,मुस्कुरा रहा हो,
ऐसी नींद से,उसको कभी भी,जगाते नहीं हैं।

जो कोई रात-रात जागा हो,इंतज़ार में तुम्हारी,
उससे मुख मोड़के,कभी भी कहीं जाते नहीं हैं,
जिसकी हँसी में,बसी हों,सारी खुशियाँ तुम्हारी,
उसके माथे पे,शिकन कभी भी,बनाते नहीं हैं।

जो साया बनकर आया हो,जन्म भर के वास्ते,
दोष उसके,कभी भी किसी से,गिनाते नहीं हैं ,
तुम्हारे घर की इज़्ज़त,तुम्हारी ही तो पहचान है,
सड़क पे उसकी बात कभी भी,लाते नहीं हैं ।

धोखा,झूठ और फरेब,जीवन के कलंक ही हैं,
प्रेम की नाव को मझधार कभी,डुबाते नहीं हैं ,
के गलत काम करने से पहले,सोचना कई बार ,
इंसानियत को कभी भी,दागदार बनाते नहीं हैं।

गम को भले ही भुला देना,काली रात जान के,
ख़ुशी के,उजले-लम्हे कभी भी,भुलाते नहीं हैं,
के दोस्ती के नाम,जो हाजिर हो,हर वक्त पर,
ऐसे रिश्ते में,शक़ की दीवार,यूँ उठाते नहीं हैं।

सुख-दुःख के दिन-रात तो,आते-जाते ही रहेंगे,
कभी हिम्मत नहीं हारते,कभी घबड़ाते नहीं हैं,
के तमाम ज़ख्म दिए हों,जिन रिश्तों ने बार-बार,
उन रिश्तों को गाँठ जोड़-जोड़,चलाते नहीं है।

                                              ( जयश्री वर्मा )

Monday, April 29, 2019

चिट्ठी तेरे नाम लिखी

सुन रे प्रिय! मैंने इक चिट्ठी,तेरे नाम लिखी,
इक दिन सूना,और अधूरी इक रात लिखी,
के जिसमें है व्यथा,कुछ कही,अनकही सी, 
कुछ तो है सहनीय,और कुछ अनसही सी। 

तमाम हलचल में भी,सूना सा दिन है बीता,
हंसी-ठहाकों बीच,मन का कोना रहा रीता,
यूँ कलियों,भवरों की,अठखेलियां थीं बड़ी, 
पर मेरी ये मन बगिया तो,है सूनी सी पड़ी।

शाम लहरों के संग,खेलती देखी इक नैया,
कैसी बेफिक्र डोलती थी,संग था खेवईया,
भीड़-भरे जग में,है मेरा मन अकेला यहाँ,
बेबस सी नज़रें मेरी,तुम्हें ढूँढतीं यहाँ-वहाँ।

रात को चाँद के संग,तारों की ठिठोली थी,
पतंगे ने रौशनी संग,कई कसमें बोलीं थीं,
कैसे-कैसे ख़याल मचले,जो के न हुए पूरे,   
रातें गुजरीं पलकों में,ख्वाब भी रहे अधूरे।

रोज के ये दिन रात मेरे,ऐसे ही गुज़रते हैं,
मेरे मन के भाव यूँ ही,वक्त से झगड़ते हैं,
तुम आओ तो जीवन की,ये जंग जीत लूँ मैं,
अपनी सारी प्रीत देकर,तुम्हें खरीद लूँ मैं।

मन उड़ेल दिया सारा,कुछ भी न सुहाता है,
तुम बिन तो मुझे,अब ये जहान नहीं भाता है,
सुन प्रिय! मैंने इक चिट्ठी,तेरे नाम है लिखी,
इस अधूरे से मन की,अधूरी सी चाह लिखीं।

                                            - जयश्री वर्मा  



Friday, March 15, 2019

सुंदर ख्वाब

अगर प्यार जो हुआ है तो,हो भी जाने दो,
ये दिल जो खिला है तो,खिल भी जाने दो,
ये इक तिलस्मयी,दुनिया का आगाज़ है,
चाहत को मीठे सपनों में,खो भी जाने दो।

इस दुनिया का क्या है,ये तो नहीं मानेगी,
नवप्रेम की इस पुकार को,ये नहीं जानेगी,
दुःख देने में तो इसे,बड़ा ही मज़ा आता है,
छोड़ो इसे,नया अफसाना,बन भी जाने दो। 

के हमदम सबके,नसीब में नहीं है मिलता,
ये फूलों का खिलना,सबको नहीं है दिखता,
बागों की खुश्बूएँ भी,सबको नहीं हैं रिझातीं,
ये प्रेम है निर्बन्ध,उन्मुक्त बह भी जाने दो।

ये चाँद-तारों की बातें,सबको कहाँ हैं आतीं,
कसमों,वादों की रातें,सबको नहीं हैं भातीं,
सबके कदमों पे,यूँ इंद्रधनुष नहीं हैं झुकते,
जो बढ़े कदम इस ओर,तो बढ़ भी जाने दो।

सब नहीं जानते,अमर है,प्रेम की परिभाषा,
पतझड़ के रूठे हुओं को,रंगों से क्या आशा,
के ये जन्मों संग,जीने और मरने की बातें हैं,
क़दमों पे रखे फूल,दिल से लग भी जाने दो।  

दिलों की ये भाषा तो,दिलवाले ही जानते हैं,
शमा की पुकार तो,बस परवाने पहचानते हैं,
के सूनी डगर का राही,बनने से क्या फायदा,
बहारों का है बुलावा,तो बाहें भर भी जाने दो। 

                                            - जयश्री वर्मा


Monday, March 4, 2019

ये अजीब भटकाव

रोज सूरज का आना,और दिन का चढ़ना ,
वही किरणों का धरती पे,धीरे-धीरे बढ़ना ,
वही सड़कों पे दौड़ते हुए,लोग इधर-उधर ,
भरते हुए स्कूल-दफ्तर,खाली से होते घर।

बाजारों का शोर-शराबा,सामानों के दाम,
लेते-देते हुए लोगबाग,बस काम ही काम ,
संतुलन का कर हुनर,नट दिखाता खेला ,
जैसे साँसों संग जूझता,जिंदगी का मेला।

मनमानी की सबने,खुमारी में जवानी की,
कुछ को है रुलाया,और कुछ संग हंसी की,
जैसे किसी के हाथों डोर है,हमें नचाने की ,
थिरकती कठपुतलियाँ,हम है जमाने की। 

साँसों का ये ज्वार-भाटा,उतरता और चढ़ता ,
ऐसे ही बीते जीवन,यूँ मौत की ओर बढ़ता ,
रोज की ये कहानी,और रोज का ये दोहराव,
कुछ न हासिल होने का,ये अजीब भटकाव।

दुःख-सुख,हँसी-आँसू,कुछ खोना और पाना ,
इसी सब में भटक रहा है,ये सारा ही ज़माना,
जीवन इक अतृप्त खेल,अनबूझा,अनजाना ,
ये जन्म से मरण तक का,है अजीब हर्जाना।

बचपन से बुढ़ापे की दौड़ में,हर दिन है जीना,
अनुकूल सब नहीं मिलेगा,गरल भी होगा पीना,
के हार-जीत की हाट है ये,लेना-देना तो पड़ेगा,
तभी तो अमूल्य जीवन ये,अनुभवों में ढलेगा।


                                                - जयश्री वर्मा




Thursday, February 14, 2019

ओ बसंत फिर आए तुम


अरे ओ बसंत! फिर से आए तुम ,
इक अजब हलचल सी लाए तुम ,
तुमने रंग बिखेरे पहले धरती पर ,
और फिर खुद पे ही इतराए तुम।

रंग भरी सी शरारतें सब बिखरीं ,
खूबसूरती जवाँ चेहरों पे निखरी ,
खेतों में है लहराए,गीतों की झड़ी ,
पर मेरी पलकें तो,सूनी सी पड़ीं।

कैसे हाल कहूँ तुम्हें इस जिय का ,
इस रीते और व्याकुल से मन का ,
यूँ न मुस्कुरा ओ निष्ठुर-निर्मोही ,
ये मन सूना,रास्ता देखे पिय का।

तुम क्या जानों,कैसी,विरह-वेदना ,
हर आहट पर द्वार,चौखट तकना,
हर सरसराहट पे धड़कन बढ़ जाना ,
तुम यूँ जानबूझ के न बनो बेगाना।

अब जब आ ही गए,तो ठहरो ज़रा ,
इन नैनों में,सपने ही भर लूँ ज़रा ,
ये भ्रम ही सही,पर ये है तो सुखद ,
इस डूबते मन को,कुछ लगे भला।  

दिल को बहलाने की,ये चाल चली ,
कल्पना लोक की है,ये डगर भली ,
सपनों की गलियों में,मैं टहली बड़ी ,
यूँ फिर से,अरमानों की बलि चढ़ी।

सारे रंग-उमंग,सब ओर बिखेरते ,
ऐसे पूरी धरती को,पुष्पों से घेरते ,
अरे ओ बसंत! फिर से आए तुम ,
इक अजब हलचल सी लाए तुम।

                                  - जयश्री वर्मा

Monday, February 4, 2019

अच्छा ही होगा

अच्छा हुआ के जो,तुमने बात बोल दी,
के मन की दुखन,मेरे प्याले में घोल दी,
यूँ कहने को मैं,तुम्हारा अपना भी नहीं,
पर अपना जानके,तमाम गांठे खोल दीं। 

इस दिल को,अपने करीब जाना तुमने,
है शुक्रिया कि,मुझे अपना माना तुमने,
मैं भरोसे के पर्याय पर,सच्चा उतरूंगा,
के जब पुकारोगे कभी,तुम संग दिखूंगा।

पलकों से जो दर्द बहे,तो बह जाने दो,
दिल-दिमाग धुलता है,तो धुल जाने दो,
दिल का पत्थर सा बोझ,कम ही होगा,
घबराना मत,अच्छा ही होगा,जो होगा।

इतना मत डरो के,नज़रें ही बोलने लगें,
इतना मत हँसो के,लोग तौलने ही लगें,
के बातें न करो कभी,दिल की परायों से,
कहीं लोग छिपे ज़ख्म ही न कुरेदने लगें।

के यूँ तो अपनों के दिए,गम ही जलाते हैं,
सब कुछ व्यर्थ है,ये गुज़रे लम्हे बताते हैं,
तोड़ ही डालेंगे ये झंझावात,नहीं हैं कमतर,
के विश्वास करो,वक्त जवाब देगा बेहतर।

                                          - जयश्री वर्मा

Wednesday, January 16, 2019

बताऊँ कैसे ?

कैसे समझाऊं उन्हें यूँ रूठ के जाया नहीं करते ,
दिल नाज़ुक है,बार-बार यूँ सताया नहीं करते ,
जो उदास हो चल दिए हम,तो इल्म रहे उनको ,
लाख चाहेंगे मनाना,तो फिर मनाएंगे किसको ?

उनका यूँ जाना,कि रंगों का बिखर जाना मानो ,
के हरियाली भी,पतझड़ सरीखी लगे है मुझको ,
यूँ तो बहार आई है,और गुल भी खिले है लेकिन ,
जो जज़बात मचले हैं दिल में,दिखाऊँ किसको ?

रात का आना कि ज़ख्मों का कसमसाना जैसे ,
ख्वाबों का चले जाना कहीं,पलकों से दूर जैसे ,
चाँद उनींदा सा और,रात भी बोझिल सी हुई है ,
अरमान जो जागे हैं जेहन में,सुनाऊं किसको ?

वो दिलफरेब मुस्कान,बार-बार आती है सामने,
उनकी नज़रों की अठखेलियों के,हम हैं दीवाने,
लम्हों की ये शरारतें,और दिल बहक सा चला है,
के मचले एहसासों का,एहसास दिलाऊं किसको ?

उन राहों पे भी चला हूँ,कि जिनसे वो गुज़रे थे ,
डालों से गिरे फूल चुने,जो उन्हें छू के बिखरे थे ,
उनके दामन से खेल के,हवाएं इधर ही आती हैं ,
इन अनकहे से पहलुओं को,समझाऊं किसको ?

ऐ खुदा! जो दिलबर दिया मुझे,तो करम है तेरा,
पर यूँ इस कदर हुस्न और हठ से,नवाजा क्यों है,
गुनहगार होके भी वो,यूँ अनजान से बने बैठे हैं,
तू ही बता ये हाल-ए-दिल,उनको मैं बताऊँ कैसे ?


                                            -  जयश्री वर्मा

                                           

Tuesday, January 1, 2019

नमन आपको


पुष्प खिलें खुशियों के,जीवन में,
उल्लसित विचार हों,अंतर्मन में ,
अभिनंदन हो इस,नव संघर्ष का,
है ये नमन आपको,नव वर्ष का। 

राह हो सुगम,स्वप्न चढ़ें परवान,
सरल बनें,सुख-दुख के मेहमान,
आशीष मिले प्रभु कृपादृष्टि का ,
है ये नमन आपको,नव वर्ष का।

सदा विराजे,मृदु मुस्कान चेहरे पे,
दूरी रहे कायम,कष्ट,रोग,शोक से ,
2019 बने,आपका,चमन हर्ष का,
है ये नमन आपको,नव वर्ष का।

गुज़रा हुआ वक्त,यादों में सहेजें,
ये भविष्य आगमन,बाहों में ले लें,
नव जाल बुनें,आशाओं,संघर्ष का,
है ये नमन आपको,नव वर्ष का।

                                                                            - जयश्री वर्मा
                                                                            





Thursday, October 4, 2018

आप चुप क्यूँ हैं ?

मित्रों मेरी यह रचना "दिल्ली प्रेस प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पत्रिका सरिता अप्रैल-प्रथम 2019" में
प्रकाशित हुई है आप भी इसे पढ़ें। -



कुछ कहिये कि आप,यूँ चुप क्यूँ हैं ?
बदले हुए हवाओ के,यूँ रुख़ क्यूँ हैं ?
ऐसा भी क्या यूँ गुमसुम सा हो जाना ?
कि मौसमों का जैसे,रूठ ही जाना ?

के आज हवाओं में,गुनगुनाहट नहीं है ,
फूलों का खो सा गया,निखार कहीं है ,
तितलियाँ भी,सुस्त सी नज़र आती हैं ,
भवरों की अठखेलियां,नहीं भाती है।

के आपसे ही तो हमारी,ज़न्नत है जुड़ी,
कैसे समझाऊं,दिल में,बेचैनी है बड़ी ,
यूँ समझिये कि,सूरज में तेज नहीं है ,
धुंध के रुख का,आभास भेज रही हैं।

कि ये मायूसी,नहीं खिलती है आप पे ,
जैसे छाए हैं बादल,रौशनी के नाम पे ,
आपको नहीं पता,ये पल दुःख भरे हैं ,
जैसे खिले न फूल,और मुरझा गिरे हैं।

कि अजी आपको,मुस्कुराना ही होगा ,
इस गम का सबब,तो बताना ही होगा ,
क्या खता कोई हुई है मुझ दीवाने से ?
या फिर कोई शिकायत है ज़माने से ?

क्या ठिठक गए हैं रास्ते क़दमों के तले ?
या कि बंधन समाज के पड़ गए हैं गले ?
कि गुज़र ही जाएंगे,ये मौसमों के झोंके ,
ज़माने से तो,छुपा लूँगा मैं,बाहों में लेके। 
            
                                                         - जयश्री वर्मा



Tuesday, June 5, 2018

फरेब कैसे हैं

वो जानते है सब कुछ,पर खुद पे गुमान किये बैठे हैं ,
दिलों के व्यापार खेलते हैं,और अनजान बने बैठे हैं ,
मेरे सब्र की इन्तहां भी,कोई कम नहीं,उनके हुस्न से ,
हम भी इंतज़ार में हैं,कब वो पूछें,अजी आप कैसे हैं ?


यूँ तो वो,रह-रह कर,चुपके,छुपके बेचैन नज़रों से देखें,
मिले नज़र तो,बेखयाली सी दिखा,अपने दुपट्टे से खेलें,
बनते यूँ हैं जैसे कि उन्हें,हमारी कोई तमन्ना ही नहीं ,
अजी जाने भी दीजिये,न पूछिए हुस्न के फरेब कैसे हैं।

माना हैं वो,नूरों में नूर,दिलकश ग़ज़ल,बहारों की बहार ,
हम इश्क हैं,उन्हें भी तो होगी हमारी नज़रों की दरकार ,
बेशक खुदा ने,बेशकीमती हीरे सा,हुस्न दिया है उनको ,
कम तो हम भी नहीं,पारखी हैं,हुनरमंद जौहरी जैसे हैं।

आखिर हम बिन,उनकी सारी खूबियां,किस काम की हैं,
कोई सराहने वाला न हो तो,ये रौनकें सिर्फ नाम की हैं,
यूँ तो चाहकर भी,हमारे वज़ूद को,वो नकार सकते नहीं,
अजी गर वो चाँद हैं,तो हम भी चकोर की चाह जैसे हैं।

                                                    -  जयश्री वर्मा









Saturday, March 24, 2018

ढल रहे हैं

आप पहली मुलाक़ात से ही,मेरे अपने से बन रहे हैं,
सुनहरे ख़्वाब मेरे,शब्द बनके कविता में ढल रहे हैं,
मेरे ख्यालों के शब्द,प्रश्न बनके मुझसे ही पूछते हैं,
ये प्रश्न मेरे जवाब बन,आपके लफ़्ज़ों में पल रहे हैं। 

आप हैं वो मंज़िल,जिसकी रही इस दिल को आस,
बुझती ही नहीं आप पे,ठहरी हुई निगाहों की प्यास,
कि कितना ही बहलाऊँ इन्हें,ये आप पे ही जाती हैं,
रूप आपका निहार के ये,अजब सी तृप्ति पाती हैं। 

आपके आने से,खुशनुमा हो जाए बोझिल सा समां,
क्या कहूँ कि इस दीवाने के लिए,आप हैं सारा जहाँ,
हर बार,हर महफ़िल में आपकी ही आवाज़ ढूंढता हूँ,
जितना चाहूँ दूर जाना,आपसे उतना ही जुड़ता हूँ। 

आपकी इस इक मुस्कराहट ने,सारे जवाब दे दिए हैं,
कि मेरे प्रश्न और,आपके जवाब बस मेरे ही लिए हैं,
आप नहीं समझेंगे कि मैं,अब क्या कुछ पा गया हूँ,
कि जैसे ठहरे से पानी में,इक तूफ़ान सा छा गया हूँ।  
ये तूफ़ान सिमट जाए बाहों में,बस यही है तमन्ना,
लाख रोके ज़माने की दीवारें,बस तुम मेरे ही बनना,
आपको नहीं पता,बिन बोले ही आप क्या कह रहे हैं,
ख्वाब मेरे हकीकत बन के,अफ़सानों में ढल रहे हैं।

                                                                                                         -  जयश्री वर्मा

Friday, February 2, 2018

हम करें तो गुस्ताखी

 मित्रों मेरी यह रचना "हम करें तो गुस्ताखी "सरिता जनवरी (द्वितीय) 2018 में प्रकाशित हुई है। यह आपके सम्मुख भी प्रस्तुत है। 

आते-जाते मेरी राहों पर,आपका वो नज़रें बिछाना, 
पकड़े जाने पे वो आपका,बेगानी सी अदा दिखाना,  
आप करें तो प्रेम मुहब्बत,जो हम करें तो गुस्ताखी। 

काजल,बिंदी,गजरा,झुमके,ये लकदक श्रृंगार बनाना,  
मन चाहे कोई देखे मुड़कर,देखे तो तेवर दिखलाना, 
आप सजें तो हक़ आपका,जो हम देखें तो गुस्ताखी।

भीनी खुशबू,भीनी बातें,भीनी-भीनी सी,हलकी हँसी,
जो खिलखिलाहटें गूँजी आपकी,मैखाने छलके वहीँ,  
हँसे आप तो महफ़िल रौनक,हम बहके तो गुस्ताखी।

प्रेम वृहद् है,प्रेम अटल है,प्रेम का पाठ है दिलों ने पढ़ा,  
प्रेम धरा है,प्रेम गगन है,प्रेम से सृष्टि का ये जाल बुना, 
इज़हार आपका,करम खुदा का,हम कहें तो गुस्ताखी।

                                                   - जयश्री वर्मा 







Wednesday, August 23, 2017

ऐ वक्त

ऐ वक्त तेरा आना और फिर,चुपके से गुज़र जाना,
आना हमसफ़र बनके और,चोरों सा निकल जाना,
ये वक्त,मेरा वक्त है कह,मैंने ही तुझे अपना माना,
पर ओ दगाबाज़,तू बना न मेरा,निकला तू बेगाना।
पहली किलकारी संग ही मैंने,तुझसे नाता था जोड़ा,
तब जाकर कहीं माँ की तरफ,अपना अस्तित्व मोड़ा,
यूँ अंतरंग होके कोई ऐसे भी,अनजान बनता है भला?
कितनी आसानी से कह दिया,तुमने अब मैं तो चला।

अपना हर लम्हा,हर क्षण,मैंने तेरे ही तो नाम लिखा,
बाल्यावस्था,तरुणाई,यौवन,हर वक्त तेरे साथ दिखा,
मैंने अपनी हर सांस का,हर पल,तुझ संग ही जिया,
तूने मुझे केवल,जन्मतिथि-पुण्यतिथि में दर्ज किया?

क्या मेरा साथ,कुछ भी याद नहीं,तुम बिलकुल भूले?
हंसना,रोना,छीनना,छिपाना,वो आम के बाग़ के झूले,
तितलियाँ पकड़ना,फूलों को गिनना कि कितने खिले,
दोस्तों संग खेल में,कितने जीत-हार के पॉइंट मिले।

दरवाजा खोल फ्रिज का,देखना कि बत्ती कब जली,
मेरी कागज़ की नाव,बहते पानी में,कितनी दूर चली,
कुछ गोपनीय बातें थीं,जो बस,मेरे तुम्हारे बीच रहीं,
कुछ राज़ भरी कहानियाँ,जो हमने किसी से न कहीं।

मेरे पीड़ा के भागीदार,आंसुओं के संग,तुम भी रहे,
प्रिया की खूबियों के,सारे किस्से,तुम संग ही तो कहे,
तुम जानते हो,कब मेरे घर में,संतान का फूल खिला,
और कब मुझे नौकरी,और प्रमोशन का सुख मिला।

फिर कहाँ चूक हुई मुझसे,जो तुमने यूँ साथ है छोड़ा,
मुझे दगा देके इस बेरुखी से,मुझ संग यूँ नाता तोड़ा,
फिर क्यों एहसास कराया,ऐसा,अब वक्त तुम्हारा है,
मैं खुल के खेला यह जान,कि मुझे तो तेरा सहारा है।

मैंने क्या,जमाने ने भरोसा कर,तुझे अपना माना है,
ऐ वक्त,तू तो किसी का भी न बना,सबका बेगाना है,
तू यूँ सदियों से,अपनेपन का,जाल बिछाता आया है,
हर जीव को फंसा इसमें,तुझे,खेल खेलना भाया है।

हम अनजाने में तुझे,अपना समझ धोखा खाते रहे,
तू फिसलता गया हाथ से,हम जन्मदिन मानते रहे,
हर आते त्यौहार को हमने,पूरी शिददत से है जिया,
और अनजाने ही,उम्र के,हर पड़ाव को कम किया।

ऐ वक्त,तू मीठी छुरी से,सबको ही हलाल करता है,
गलती मनुष्य की है,जो तेरे साथ का दम भरता है,
हर किसी का वक्त तो,उसके संग ही,गुज़र जाता है,
तू सबके साथ तो है,पर किसी से,निभा नहीं पाता है।

ऐ वक्त,तेरा चेहरा अपना नहीं,बिल्कुल ही बेगाना है,
मेरा होके भी मेरा न बना,तू एकदम ही अनजाना है,
ऐ वक्त!तेरा आना और,ऐसे यूँ चुपके से गुज़र जाना,
आना जीवन बनके,और मृत्यु बन के निकल जाना।
                                           
                                                                 - जयश्री वर्मा 

Thursday, June 8, 2017

वही वादे वही कसमें

जन्म लेने के साथ ही जन्मी,
मेरी पहचान इस दुनिया में,
अजब विस्मित करें ये बातें,
जीवन मेरा ख्वाहिशें उनकी,
तमाम उम्मीदों के संग पालें,
वही मेरे वही अपने।
उंगली पकड़ के यूँ चलना,
सदा,नहीं मंजूर मुझको तो,
मुझे आवाज़ दे बुलाती राहेँ,
खुद की तकदीर गढ़ने को,
कोई न पूछे मेरी ख्वाहिश,
वही रोना वही झगड़े।

अचकचा के मैंने चुन ली हैं,
अपने अन्तर्मन की जो राहें,
किसी के रोके नहीं रुकना,
किसी के आगे नहीं झुकना,
कदम जिस भी ओर बढ़े मेरे,
वही मंजिल वही राहें।

उम्र के मौसम फिर यूँ बदले,
आँखों में इंद्रधनुष भी मचले,
के दिलबर से हुईं तमाम बातें,
और तमाम बीतीं रंगीन रातें,
फिर वो इन्तजार सदियों का,
वही गाने वही नगमे।

सारी रात के,रहे वे रतजगे,
सपने सोए से,कुछ अधजगे,
ये झुके दिल मेरा किस ओर,
पुकारे उसे बिना ओर,छोर,
भटकन मृग मरीचिका सी,
वही मायूसी वही तड़पन। 

वही बिखरना मुहब्बत का,
वही हतप्रभ सी जिंदगानी,
फिर नाम दिया उसे धोखा,
यही है जवानी की कहानी,
बस वही हर बार का रोना,
वही फरेब वही बाहें।

फिर वही गृहस्थी की चक्की,
और कपड़े,रोटी में पिस जाना ,
वही नई पीढ़ी की फिर चिन्ता,
यूँ अधेड़ावस्था का आ जाना,
वही जिम्मेदारियों का है रोना,
वही झंझट वही लफड़े।

वही अंतिम छोर पे हूँ मैं खड़ा,
के विस्मित हुआ हूँ अब खुद से,
गलत क्यूँ चुन लिया ये जीवन,
कभी नहीं सोचा था ऐसा कुछ,
ये कैसा है छल ज़िंदगानी का,
वही अफसोस वही आँसू।

अजब सी पहेली है ज़िंदगानी,
एक सी लगे सबकी ही कहानी,
सुख-दुःख का बहता सा पानी, 
कहीं जन्मे और कहीं बह चले,
बिन मंजिल की ये अजब यात्रा, 
वही आना,वही जाना।
                            
                             
                                                     ( जयश्री वर्मा )

Monday, May 1, 2017

अनजानी,अनदेखी कल्पना

स्वर्ग की कामना समाई है,हर किसी के मन में,
और दुखों से पार,पाना चाहते हैं,अपने जीवन के,
धाम दर्शन करके प्रभु के,द्वार जाने की चाह है,
सभी पूजास्थल,ऊपरवाले को मनाने की राह है,
हर कोई स्वर्ग का दिल से तलबगार है,
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

जीवन की तकलीफों को जो असामान्य मान बैठे हैं,
मानो सुबह शाम,रात दिन के बदलावों से ही रूठे हैं,
यही जन्म तो है सत्य,और सत्य इसकी ये कहानी,
परलोक तो है अनदेखा,इसकी कथा भी है अनजानी,
कर्मलोक को भूल तर्पण को क्यों हैं बेकल?
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

कोई नहीं है शख्श,धरा पे,जो कि मृत्यु को पाना चाहे,
अपना घरद्वार भूले,और भूलना चाहे,अपनी ये राहें,
तो फिर जो मिला है उसको,क्यूँ न जी भर कर जियें,
तो क्यूँ न इस जीवन का,हर स्वाद घूँट-घूँट कर पियें,
दुखों से भाग क्यों देव द्वार की है चाहत।
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

ये सुन्दर रंग समेटे प्रकृति,ये झरने और ये नदियां,
प्रेम में रचे बसे रिश्तों से परिपूर्ण जीवंत ये दुनिया,
सहेजे हुए सुख-दुःख से भरी परिवार की ये बगिया,
ये रिश्ते-नाते,संगी-साथी,ये सुबह-शाम,ये गलियां,
फिर देव लोक को,दिखते क्यों हैं विह्वल?
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

मृत्यु से लौट किसने,किसे स्वर्ग का राज़ बताया?
इह लोक त्यागने का,किसके मन ख़याल आया?
ये पतलून की क्रीज़,मैचिंग कपड़े और ये साड़ी,
ये घर-द्वार,ये हाट,ये पड़ोस-पड़ोसी ये पनवाड़ी,
ये क्रीम,लिपस्टिक,झगड़ा,रूठना,मान मनुहारी,
सावन का झूला,गीत और बच्चों की किलकारी,
इस धरती के रंग हज़ार,और खूबसूरत नर-नारी,
ये शोहरत,सलाम,ये कुर्सी की हनक की चिंगारी,
कोई भी मोह इसका,न छोड़ सका,न छोड़ सकेगा,
इस सच्चाई को त्याग,भला अनदेखी से जुड़ेगा?
स्वर्ग-नर्क तो यहीं है,जीवन जीना इक कायदा है,
यूँ अन्धकार में,भटकने का,कोई नहीं फायदा है,
ये रिश्ते नाते,ये उनका रूठना मनाना ही सच्चे हैं,
मित्रों-ये जीवन के सुख-दुःख के खेल ही अच्छे हैं,
ये जीवन है अनमोल,यूँ अन्धविश्वाश में न अटकें,
और अनजानी,अनदेखी कल्पनाओं में न भटकें।
क्यों कि-
स्वर्ग के लिये तो मित्र मारना पड़ता है।
                                           
                                                      ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, April 19, 2017

आज तो प्रिय मेरा रूठने का मन है

आज सुनो!प्रिय तुमसे,मेरा रूठने का मन है,
बस अपना वज़ूद ढूंढना है,नहीं कोई गम है,
तुम्हारा प्यार यूँही,नापने का मन हो चला है,
तुम भूले ध्यान रखना,क्या बुरा,क्या भला है।

आज तो सर में दर्द बड़ा,यही बनाना बहाना है,
असल में तो आज यूँ ही,तुमको आजमाना है,
तौलना है कि,तुम्हें मुझसे,कितना लगाव है,
लव यू कहने में,कितना सच कितना बनाव है।

क्या अब भी तुम मुझे,देख सब भूल बैठोगे ?
क्या सारे दिन आज,संग में मेरे ही ठहरोगे ?
क्या चाय संग फटाफट,ब्रेड बटर बनाओगे ?
क्या पानी संग दौड़के,सेरिडॉन ले आओगे ?

क्या बाम मेरे माथे पे,अपने हाथों से मलोगे ?
मुझे सुकून पाता देख,मन ही मन खिलोगे ?
मेरा मन बदलने को,फिल्म कोई दिखाओगे ?
या पंचवटी की,चटपटी चाट तुम खिलाओगे ?

या कहोगे चलो तुम्हें,पार्क हवा खिला लाऊं ?
या अमूल की पसंदीदा,बटरस्कॉच दिलवाऊं ?
या फोन मिला के,मेरी माँ से बात कराओगे ?
या खुदही यहां-वहां की,सुना मन बहलाओगे ?

तुम्हारी उदासीनता से,मेरा मन बौखलाया है ,
अपना महत्व जानने का,कीड़ा कुलबुलाया है,
क्या अब तुम्हें मुझसे,मुहब्बत ही नहीं रही ?
या मैं अब पुरानी हो चली हूँ,ये बात है सही ?

ये भी कोई जीवन है,न रूठना और न मनाना ,
तुम्हारा रोज ऑफिस और मेरा टिफिन बनाना ,
या बहुत साल संग रहते,सब आदत हो गई है ,
जो थी प्यार की खुमारी,कहीं जा के सो गई है।

तुम कामकाज पे जाते हो,मैं घर सम्हालती हूँ ,
न तो तुम कुछ कहते हो,और न मैं बोलती हूँ ,
मुझे तो ये पल-छिन,बिलकुल भी नहीं हैं भाते ,
हम मशीन की तरह,रोज के ये दिन हैं बिताते।

तुम चाँद तारों की अब कोई,बात नहीं हो करते ,
ये दिन बोरियत भरे अब तो,मुझसे नहीं हैं कटते ,
सो ! आज तो प्रिय मेरा तुमसे,रूठने का मन है ,
बस अपना वजूद ढूंढना है,और नहीं कोई गम है।

                                                               (  जयश्री वर्मा  )

Monday, April 3, 2017

मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी

मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी,तुम्हें झुकना होगा,
तुम सिर्फ मेरे हो,ये वादा तुम्हें करना होगा,
धोखा नहीं चलेगा,प्यार के इस व्यापार में,
खुल के दुनिया के सामने,दम भरना होगा।

सूरज की लाली संग,आशाएं जगानी होंगी,
दिन भर मेरी गृहस्थी की,नाव चलानी होगी,
शाम ढले मेरी चाहतों के,संग ढलना होगा,
मैं हूँ शमा निःशब्द,मुझ संग जलना होगा।

सावन के सभी गीत,मेरे सुरों संग गाने होंगे,
मेरे जज़्बात पतझड़ में भी,गुनगुनाने होंगे,
घर की किलकारियाँ,गले से लगानी होंगी,
ऊँगली थाम के उन्हें,हर राह दिखानी होगी।

मायूसियों में,अपना कन्धा भी बढ़ाना होगा,
बाँहों के दायरे में बाँध कर,सहलाना होगा,
आंसुओं को मेरी पलकों में,नहीं आने दोगे,
खुशियों को कभी मुझसे,दूर न जाने दोगे।

जब मेरा ये वज़ूद,तुम्हारी पहचान बन जाए,
मेरा नाम भी जब,तुम्हारा नाम ही कहलाए,
मेरी हिफाज़त,तुम्हारे अरमान में ढल जाए,
तुम्हारे ख़्वाबों में जब,मेरा तसव्वुर घुल जाएं।

विवाह की सारी कसमों को,निभाना ही होगा,
हर सुख-दुःख में रहोगे साथ,ये जताना होगा,
कितनी भी विपत्ति हो,मुख नहीं फेरोगे कभी,
मेरे हो,मेरे रहोगे सदा,कहो यहीं और अभी।  

मौसमों के साथ,मुझे महफूज़ रखना होगा,
अपनी जान से भी ज्यादा,प्यार करना होगा,
मैं कितनी भी ढल जाऊं,संग मेरे रहोगे सदा,
सच्चा साथी होने का फ़र्ज़,पूरा करोगे अदा।

सच कहो कभी भी,भरोसा मेरा नहीं तोड़ोगे,
जीवन के झंझावातों में,अकेला नहीं छोड़ोगे ,
तब मैं तुम्हारी संगिनी,हमसाया बन जाऊँगी,
तुम्हारी हर परिस्थिति के साथ ढल जाऊँगी।
पर ----
मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी,तुम्हें झुकना होगा,
तुम सिर्फ मेरे हो,ये वादा तुम्हें करना होगा।

                                              ( जयश्री वर्मा )







Saturday, March 18, 2017

तुम ही बताओ
















ये निगाहें इक अजीब सा ही गुनाह किये जाती हैं,
इधर-उधर भटकती सी तुम पे ही ठहर जाती हैं।
ये ज़ुबाँ है कि लफ़्ज़ों संग खेलना शौक है इसका,
पर क्यों ये तुम्हारे सामने बेज़ुबान सी बन जाती है।

ख़्वाब हैं कि ये तो,तुम्हारा तस्सवुर सजाए रहते हैं,
पलकें हैं कि ये तो रात भर,रतजगा किये जाती हैं।
ये हाथ मेरे,हाल-ए-दिल लिख के,तुम्हें बताना चाहें,
पर ये कलम है कि,ज़माने के खौफ से घबराती हैं।

ये कदम हैं जोकि गुज़रे हैं,कई मोड़,कई राहों से,
आता है जब दर तेरा,बिन रोके ही ठिठक जाते हैं।
दिल ने तो चाहा है तुम्हें,खुद से भी ज़्यादा टूट कर,
इज़हार करना चाहे पर,अलफ़ाज़ ही खो जाते हैं।

ख़ैरख्वाहों ने कहा,ये जुनून है,राह है भरी काँटों से ,
शूल के डरसे क्या,मुहब्बत छोड़ी,किसी ने फूल से?
खुदा के बनाए इन,पाक-प्यार के एहसासों के संग,
जीवन की इस खूबसूरती को,हम कैसे नकार जाएं?

तुम ही बताओ कि कैसे हम,तुम्हें एहसास दिला पाएं,
इस दिल के इन जज़्बातों को,तुम तक कैसे पहुंचाएं?
तुम्हारे लिए कितना आसान है,यूँ बेख्याल बन जाना,
पर हम सरीखे,शमा पे मिटने वाले,परवाने कहाँ जाएं ?

                                                                 जयश्री वर्मा

Friday, March 3, 2017

होली के मतवाले रंग


इस प्रकृति के सात रंग से जन्मे कई हज़ार हैं रंग,
ख़ुशी जताते चटकीले रंग,फीके हैं दुखियारे रंग,
इस जीवन की उठापटक के टेंशन वाले न्यारे रंग,
गर जीते तो सर्वेसर्वा वर्ना हैं आरोपों के सारे रंग,
तू-तू,मैं-मैं,ऐसा-वैसा और चुभते से झगड़ालू रंग,
बैर पुराना भूल उठाओ,ये होली के मतवाले रंग। 

गीत संगीत भाव फागुनी है,अल्हड़ हुआ ये मन,
भंग मलंग करे है दिल को,फुर्तीला हुआ है तन, 
चूनर ये रंग बिरंगी मत करना,ओ रंगरेज सजन,
धमकी आज नहीं चलेगी,चाहे कितने करो जतन,
हंसी ठिठोली,नयन चतुर और चुगली करें कंगन,
रंग बरसे,तन-मन भीगे,ये होली के मतवाले रंग। 

चाचा-चाची,मुन्ना-मुन्नी,कोई बचके जाने न पाए,
रोक-टोक अब नहीं चलेगी,कुछ मनमानी हो जाए,
ऐसे कैसे जाने दूँ भौजी,मौका फिर-फिर न आए,
चिप्स,पकौड़े,कचरी ले आओ,घर में जो हैं बनाए,
पापड़,दहीबड़ा,गुझिया संग,भंग का साथ सुहाए,
चलो उड़ाएं गुलाल लाल,ये होली के मतवाले रंग। 

धरती ने भी ली अंगड़ाई,रंग रंगीली बन कर छाई,
कोयल प्रेम गीत है गाती,अमियों ने है डाल झुकाई,
भँवरों के हैं गीत रसीले,बगिया है पुष्पों की सौगात,
लाल पलाश,बुरुंश दहके हैं,फागुन की नई है बात,
शर्म हया के दौर चल रहे,मन चंचल है भाव उदात्त,
कही,अनकही सब जानें,ये होली के मतवाले रंग।

रंग बिखेर जादू सा करती,प्रकृति हुई मतवाली,
डहेलिया,पिटूनिया,पैन्ज़ी,सुर्ख गुलाबों की लाली,
तिलस्मयी रंग बिखेर ये,जहां तिलस्मयी बनाए,
सब जीवों के मन भावों में देखो,प्रेम राग जगाए,
वशीभूत हुए हैं सभी,प्रकृति के देख निराले रंग,
बुलाएं सराबोर होने को,ये होली के मतवाले रंग।
 
कैसा ये खुमार छाया और,कैसा बिखरा हुआ है नूर,
मादकता है हवाओं में फैली,तन पे है चढ़ा  सुरूर,
रंगों की होड़ चली और सबको खुद पर है गुरूर,
इन साकार हुए ख़्वाबों को,पलकों में ही रहने दो,
शब्दों को मौन करो और अँखियों से ही कहने दो,
सभी भाव बयान कर देंगे,ये होली के मतवाले रंग।

                                                                                 ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, February 1, 2017

मन बसंत


पीले-पीले फूल खिले,सरसों से भरे हैं खेत झुके,
प्रकृति की ये छटा देख,कदम भी हैं रुके-रुके,
गेंदा हज़ारा की खिली,पंखुड़ियों की पीत छटा,
पीले से सभी फूल झांकें,हरे पत्तों की ओट हटा,
आसमान के योग से ये,खुल रहे हैं राज अनंत,
मदमाती,इठलाती सी,धरती हुई है आज बसंत।

माँ सरस्वती का वन्दन,बसंत का अभिनन्दन,
गीतों की फुहार से है,मन-मन,आनंद-आनंद,
होलिका का आह्वान,ख़ुशी,उत्साह संग-संग,
किसानों के सुर गूंजे,गुजरियों की चाल उमंग,
अठखेलियाँ,ठिठोली,ख़ुशी का नहीं कोई अंत,
हर ख़ुशी में बसंत और हर हास छलके बसंत।

तन,सांस महक रही,दिल की धड़कन है तेज़,
चूनर मोरी रंग दे बसंती,ओ रे सयाने रंगरेज,
सात सुर गूंजें नस-नस,प्रीत रच गीत संगीत,
मन विचार हैं बहके,कैसी ये प्रीत अगन रीत,
इस मीठी सिहरन का,नओरछोर,न कोईअंत,
ओ सुन पिया सँवारे!आज मेरा है मन बसंत।

                                       ( जयश्री वर्मा )

Friday, January 27, 2017

खेल राजनीति का खेलें

आओ हम मिलकरके खेल,राजनीति-राजनीति का खेलें,
देश को रखें एक तरफ और फिर सम्पूर्ण स्वार्थ में जी लें।

भिन्न-भिन्न पार्टियाँ बनाकर,चिन्ह अपनी पसंद का लगाएं ,
कमल,साइकिल,हाथी,पंजे या अन्य से,आओ इसे सजाएं।

करें घोटाले,घपले,हवाले,सबको खुली छूट है इस खेल में,
पैसे की महिमा के बल पर,कोई भी नहीं जाओगे जेल में।

देश डूबे या दुश्मन के हमले हों,कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ,
बस इक दूजे पे आक्षेप लगाएं,यह खेल है अलग सा निराला।

किसी को विदेशी,किसी को कट्टर कह जनता को भड़काएं,
सत्र कितना भी जरूरी हो पर,हर काम में ही रोड़ा अटकाएं।

बस अपने घर को धन से भर लें,चाहे ये जनता जाए भाड़ में ,
हर तरह का कर्म कर डालें,मुस्कुराते मुखौटे की आड़ में।

रमजान में रोज़ा इफ्तारी और मकर संक्रांति में हो खिचड़ी ,
हिन्दू,मुस्लिम वोट बैंक छलावे में,ये जनता भोली है जकड़ी ।

भाषण व उदघाटन उद्घोष कर,इस पब्लिक को बरगलाएं ,
और हर मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारा जा,ईशवर को भी फुसलाये।

पोशाक रहेगी सफ़ेद टोपी संग,पर कोई दाग न लगने पाए ,
सफ़ेद लिबास की आड़ में क्या करते हैं,कोई ये जान न पाए।

नए वादों के घोषणा पत्र बनाकर,मीडिया से प्रचार करवाएं ,
वादा खिलाफ़ी कर सकते हैं,पर पहले सत्ता अपनी हथियाएँ। 

स्कूल,अस्पताल,सड़क के नाम पर,धन में गोते खूब लगाएं ,
काम धकाधक होना जरूरी,चाहे सब फाइलों पे निपटाएं।

नियम क़ानून ताक पर रखकर,बस नोट की खेती उगाएं,
भूख,बाढ़ से कोई मरे तो,परिवार को,दो-दो लाख पकड़ाएं।

तुम सत्ता में रहो तो हमें सम्हालो,हम सत्ता में तुम्हें सम्हालें ,
कोर्ट,सीबीआई सब ही सध जाएगी,बेखौफ़ कुर्सी अपनालें ।

बड़ा आनंद आएगा चलो मिल,इस सत्ता का स्वाद भी ले लें ,
तो आओ हम मिल करके,खेल राजनीति-राजनीति का खेलें ।

                                                                         ( जयश्री वर्मा )





Wednesday, January 18, 2017

हमारे बाँकुरे जवान

जिनसे अपनी है सुबह शाम,वो हैं सीमाओं पर खड़े हुए,
वो प्रहरी वो सीमा रक्षक,वो जवान सीमाओं पर डटे हुए।

उनके होने से हम बेफिक्र,उनसे सुरक्षित अपना सम्मान,
उनके लिए तो बस सर्वोपरि,देश की-आन,बान और शान।

उनका भी तो है घर-द्वार,और उनका भी है अपना परिवार,
पर देश है उनकी प्राथमिकता,देश ही उनका सच्चा प्यार।

उनके लिए दिन-रात एक हैं,हरदम,हरपल सचेत वो रहते,
भारत माँ की रक्षा करने को,हंस-हंस कर सब कुछ सहते।

चाहे आंधी हो,तूफान चले,चाहे बरसें तीखे बर्फ के गोले ,
हो कैसा भी संकट,रुकावट,वो साहस संग सबकुछ सहलें।

दुश्मन कितनी कोशिश कर ले,पर इरादों को न डिगा सके,
हिम्मत उनकी है फौलादी,उन्हें कोई भी चुनौती न डरा सके,

प्राणों की बाजी लगा,शत्रुओं को हराएं ऐसे हैं बाँकुरे जवान,
तब स्वतंत्र हवा में सांस हम लेते,हमारे सपने चढ़ते परवान।

उनकी उम्मीद,तसल्ली उनके परिवार की चिट्ठी से जुड़ी है,
और घर जाने की छुट्टी स्नेह और उम्मीद से जुड़ी-कड़ी है।

रहे ये अमर जवान ज्योति सदा,हो सुरक्षित देश की आवाम,
हे वीरों ! शत-शत नमन तुम्हें,है मेरा शत-शत तुम्हें सलाम।

                                                                                        - जयश्री वर्मा 









Friday, December 9, 2016

ओ सृष्टि जननी

ओ पावन जीव जननी जलधार,महिमा तेरी अपरम्पार,
तेरे कारण ही,इस धरती पे फैला,इस सृष्टि का संचार,
तेरे वज़ूद के कारण ही,यह पृथ्वी,है नीला ग्रह कहलाई,
नदी किनारे बसीं सभ्यताएं,और विराटता इसने पाई।

तूने जलचर,थलचर,नभचर,सबकी ही प्यास बुझाई है,
तू जहाँ-कहीं से गुज़री जग में,वहीं पे हरियाली छाई है,
अपनी धुन में चंचल लहरों से,मधुर संगीत सुनाती तू,
हर बाधा को पार कर हमें,है जीवन का मर्म बताती तू।

है चहुँ और स्पंदन नदियों से,और नदियों से ही संसार,
युगों-युगों के इस बंधन संग,न हो उपेक्षा का व्यवहार,
नदियों से जीवन का रिश्ता,हमें हरहाल समझना होगा,
और जल संचयन का पाठ,हम सबको ही पढ़ना होगा।

वर्ना धरती पर बिखरी ये,मनभावन,हरियाली न होगी,
पशु,पक्षी,कीट और शिशुओं की किलकारी भी न होगी,
गर जल न रहा,वृक्ष न होंगे,तो आक्सीजन भी न बनेगी,
बिना प्राणवायु,इस जीवन की,फिर कहानी कैसे रहेगी।

जल का  महत्व जानके हम,इसकी उपलब्धता की सोचें,
जल संचय के उपाय निकालें,और जल संरक्षण की सोचें,
सदानीरा नदियाँ ये रहें और उनकी अमरता की भी सोचें ,
सोचें कि कैसे ये प्रकृति बचे,और भूजल बढ़ाने की सोचें।

जल संरक्षण हेतु इस जल को,व्यर्थ में न बहने दें हम,
वर्षा से प्राप्त जल,संचित कर,बेकार में न जाने दे हम,
नदियों अपनी स्वच्छ रखें,उन्हें प्रदूषित न होने दें हम,
गन्दगी,कूड़ा,पूजन-सामग्री फेंक बीमार न होने दे हम।

मृत पशु,मृत शरीर कदापि न,इन नदियों में बहाए जाएं,
अंतिम संस्कार को,इलेक्ट्रिक शव दाह गृह ही अपनाएं,
न डालें कारखानों का दूषित जल,इन पावन नदियों में,
वर्ना जीवन मुश्किल होगा,आगे आने वाली सदियों में। 

जल राशि का मूल्य जानें,ताकि भविष्य भयावह न रहे,
वृक्षों की तादाद बढ़ाएं,ताकि जल धरती में ही रुका रहे,
कुँए,पोखर व तालाब बनाएं,ताकि जल संचित होता रहे,
हर व्यक्ति जागरूक हो,ताकि जीवन धरती पे बचा रहे।

जल जीवन है,जल स्पंदन है,जल से है यह धरती जवान,
नदी बचाएं,नदी सहेजें,यही जल,जंगल,जमीन की जान,
इस आकाशगंगा में है केवल,पृथ्वी ही,जीवन की पहचान,
जल से ही जीवन संभव है,सबमें बांटना होगा यह ज्ञान।

                                                              ( जयश्री वर्मा )

Monday, October 24, 2016

"शुभ दीपावली"मनाएं

चलो दीप पर्व को,इस वर्ष,कुछ अलबेला सा मनाएं,
बुराइयों को बुहार के,आँगन में,खुशियों को ले आएं,
नवल वसन हों,भाव शुभता संग,आपसी प्रेम जगाए,
इस दीपावली को,मिल सब "शुभ दीपावली"बनाएं।

बढ़ाऊं दीपक,मैं हांथों से,और बाती को आप जगाएं,
विपरीत पवन,अगर तेज बहे तो,हथेली ओट बचाएं,
ले चलें उस,अँधेरी चौखट पे,जहां कहीं लगे वीराना,
हाथ बढ़ा के,नेह का सब मिल,जगमग दीप जलाएं।

शब्द सुनहरे आप चुनें,और संग में,सुरलहरी मेरी हो,
राग एक हो,तान एक हो,सबमें स्नेह लहर गहरी हो, 
गीत सरल हो,पकड़ गहन हो,जीवन संगीत सजाएं,
मधुरता से,गूँथ के हृदयों को,अपनत्व धुन बिखराएं।

रंग इन्द्रधनुष के,मैं समेट लूँ,कल्पनाएं आप सजाएं,
अल्पना के बेलबूटों में,सारे रंग,एकता के भर जाएं,
नारंगी,सफ़ेद,हरा रंग सुन्दर,सबसे ही प्रखर लगाएं,
इस दीपावली पर हिलमिल के,शुभता प्रतीक रचाएं।

मैं खुशियाँ,चुनकर ले लाऊँ,मुस्कुराहट आप फैलाएं,
मीठी बातों के संग हम,इक दूजे के,हृदयों बस जाएं,
धोखा,झूठ,मनमुटाव छोड़,मानवता को गले लगाएं,
इस त्यौहार,गले मिल आपस में,भाईचारा अपनाएं।

बिजली के बल्ब न हों,दीपों की झिलमिल लड़ी हो,
चेहरे पे मुस्कराहट सबके,खुशियों की फुलझड़ी हो,
भूखे पेट न सोए कोई भी,हर शख्स तृप्ति रस पाए,
स्वागत,सौहार्द से,मिलजुल सब मिलबांट के खाएं।

न हो उदासी,किसी ओर,खुशियों का अम्बार लगे,
न हो अंधियारा,कहीं पर,दीपक सारे जगमग जगें,
हिलमिल खुशियाँ,उमंग हृदय,अमावस को हराएं,
चलो हम सब मिल संग में"शुभ दीपावली"मनाएं।

                                                        ( जयश्री वर्मा )


Friday, October 7, 2016

कांटे की व्यथा

इक रोज़ पार्क में,बैठा था मैं,इक क्यारी के पास,
तभी आवाज़ आई,कुछ अपरिचित सी,कुछ ख़ास,
फिर चहुँ ओर मैंने,नज़र दौड़ाई,पर दिखा न कोई,
सोचा कि शायद,मेरे अंतर्मन का ही,भ्रम है कोई। 

फिर देखा,इक पौधे का काँटा,मुझको देख रहा था,
कुछ सवालिया सी दृष्टि,मुझ पर ही वो फेंक रहा था,
मैंने पूछा,क्या तुम्हें ही मुझसे,कुछ पूछना ख़ास है?
याकि मुझे यूँ ही,हो चला किसी भ्रम का,आभास है। 

वह बोला,ये सच है मैं तुमसे ही,मुखातिब हो रहा हूँ,
तुम भ्रम न समझो,मैं तुमसे सच में ही,बोल रहा हूँ,
कुछ सवाल हैं मेरे,मुझे तो तुम बस,उत्तर बतला दो,
मेरे मन की,यह उलझन,बस तुम जरा सुलझा दो।

मैं बोला,कि चलो कहो,क्या तुम्हारी प्रश्न-कथा है?
कह डालो,मुझसे आज,जो अंतरमन की व्यथा है,
वह बोला,क्यों भेद बड़ा है,मेरे और पुष्प के बीच?
जबकि एक डाल,रस,एक ही जल से गए हैं सींच।

तुम कवि हो कहो,तुम्हारा विषय,मैं क्यों न बना?
मुझपे,तुम्हारी लेखनी ने,भाव सुंदर क्यों न चुना?
फूल की ही,प्रशंसा पे तुमने,पोथियाँ हैं भर डालीं,
सारी ही सुन्दर उपमाएं,उसके नाम ही कर डालीं।

मैं कितना हूँ बलशाली,ज़रा मुझपे,नज़र तो डालो,
और कुछ,बेहतरीन नज़्में,मुझपे भी तो गढ़ डालो,
मेरी ताकत के आगे,देखो हर कोई,कमजोर पड़े,
मुझे छूने से मानव,तितली,भँवरे और पशु भी डरें। 

ताकत के कारण,उसके सर,दम्भ चढ़ा परवान था,
मैं उसकी घमंड भरी,मुस्कान पे,बहुत ही हैरान था,
मैं बोला कि,बुरा न मानो,तो मैं एक बात कहूँ भाई,
जिसको तुम,गुण समझ रहे,वही तो हैअसली बुराई।

शूल हो तुम,काम तुम्हारा,सिर्फ दुःख और दर्द देना,
सुख न देना कोई,बस,यूँ ही ताकत में,अकड़े रहना,
शूल से ही तो,सूली बनी,जिसका जान लेना काम है,
पुष्प भले ही,नाज़ुक सही,पर दिल मिलाना काम है। 

पुष्प तो,रंग दे जहान को,और खुशबूओं को नाम दे,
जन्म,मृत्यु,विवाह या मंदिर हो,हर जगह ही काम दे,
है पुष्प लचीला,हलकी हवा के,झोंकों में ही झूम ले,
जो भी उसे,प्यार से ले उठा,उसके हांथों को चूम ले।

दिलदार इतना कि,ओस की बूँदें भी,उस पर ठहर सकें,
रंग सुन्दर देख के,पंछी और तितलियाँ,आकर के रुकें,
इस प्यार और त्याग की तो,दुनिया ही पूरी दीवानी है,
गर कवि न मुग्ध हो,तो ये उसकी कलम की,नादानी है।

सारे जहां में रंग बिखेरे,ऐसा तिलस्मयी है उसका प्यार,
चरणों से शीश तक राज करे,ऐसे हैं उसके गुण हजार,
दुनिया भर में,प्रेम दिवस पे,जवां दिलों की वो आस है,
क्या अब तुम्हें अवगत हुआ,क्यों पुष्प दिल के पास है ?  

                                                                  ( जयश्री वर्मा)