Monday, May 1, 2017

अनजानी,अनदेखी कल्पना

स्वर्ग की कामना समाई है,हर किसी के मन में,
और दुखों से पार,पाना चाहते हैं,अपने जीवन के,
धाम दर्शन करके प्रभु के,द्वार जाने की चाह है,
सभी पूजास्थल,ऊपरवाले को मनाने की राह है,
हर कोई स्वर्ग का दिल से तलबगार है,
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

जीवन की तकलीफों को जो असामान्य मान बैठे हैं,
मानो सुबह शाम,रात दिन के बदलावों से ही रूठे हैं,
यही जन्म तो है सत्य,और सत्य इसकी ये कहानी,
परलोक तो है अनदेखा,इसकी कथा भी है अनजानी,
कर्मलोक को भूल तर्पण को क्यों हैं बेकल?
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

कोई नहीं है शख्श,धरा पे,जो कि मृत्यु को पाना चाहे,
अपना घरद्वार भूले,और भूलना चाहे,अपनी ये राहें,
तो फिर जो मिला है उसको,क्यूँ न जी भर कर जियें,
तो क्यूँ न इस जीवन का,हर स्वाद घूँट-घूँट कर पियें,
दुखों से भाग क्यों देव द्वार की है चाहत।
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

ये सुन्दर रंग समेटे प्रकृति,ये झरने और ये नदियां,
प्रेम में रचे बसे रिश्तों से परिपूर्ण जीवंत ये दुनिया,
सहेजे हुए सुख-दुःख से भरी परिवार की ये बगिया,
ये रिश्ते-नाते,संगी-साथी,ये सुबह-शाम,ये गलियां,
फिर देव लोक को,दिखते क्यों हैं विह्वल?
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

मृत्यु से लौट किसने,किसे स्वर्ग का राज़ बताया?
इह लोक त्यागने का,किसके मन ख़याल आया?
ये पतलून की क्रीज़,मैचिंग कपड़े और ये साड़ी,
ये घर-द्वार,ये हाट,ये पड़ोस-पड़ोसी ये पनवाड़ी,
ये क्रीम,लिपस्टिक,झगड़ा,रूठना,मान मनुहारी,
सावन का झूला,गीत और बच्चों की किलकारी,
इस धरती के रंग हज़ार,और खूबसूरत नर-नारी,
ये शोहरत,सलाम,ये कुर्सी की हनक की चिंगारी,
कोई भी मोह इसका,न छोड़ सका,न छोड़ सकेगा,
इस सच्चाई को त्याग,भला अनदेखी से जुड़ेगा?
स्वर्ग-नर्क तो यहीं है,जीवन जीना इक कायदा है,
यूँ अन्धकार में,भटकने का,कोई नहीं फायदा है,
ये रिश्ते नाते,ये उनका रूठना मनाना ही सच्चे हैं,
मित्रों-ये जीवन के सुख-दुःख के खेल ही अच्छे हैं,
ये जीवन है अनमोल,यूँ अन्धविश्वाश में न अटकें,
और अनजानी,अनदेखी कल्पनाओं में न भटकें।
क्यों कि-
स्वर्ग के लिये तो मित्र मारना पड़ता है।
                                           
                                                      ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, April 19, 2017

आज तो प्रिय मेरा रूठने का मन है

आज सुनो!प्रिय तुमसे,मेरा रूठने का मन है,
बस अपना वज़ूद ढूंढना है,नहीं कोई गम है,
तुम्हारा प्यार यूँही,नापने का मन हो चला है,
तुम भूले ध्यान रखना,क्या बुरा,क्या भला है।

आज तो सर में दर्द बड़ा,यही बनाना बहाना है,
असल में तो आज यूँ ही,तुमको आजमाना है,
तौलना है कि,तुम्हें मुझसे,कितना लगाव है,
लव यू कहने में,कितना सच कितना बनाव है।

क्या अब भी तुम मुझे,देख सब भूल बैठोगे ?
क्या सारे दिन आज,संग में मेरे ही ठहरोगे ?
क्या चाय संग फटाफट,ब्रेड बटर बनाओगे ?
क्या पानी संग दौड़के,सेरिडॉन ले आओगे ?

क्या बाम मेरे माथे पे,अपने हाथों से मलोगे ?
मुझे सुकून पाता देख,मन ही मन खिलोगे ?
मेरा मन बदलने को,फिल्म कोई दिखाओगे ?
या पंचवटी की,चटपटी चाट तुम खिलाओगे ?

या कहोगे चलो तुम्हें,पार्क हवा खिला लाऊं ?
या अमूल की पसंदीदा,बटरस्कॉच दिलवाऊं ?
या फोन मिला के,मेरी माँ से बात कराओगे ?
या खुदही यहां-वहां की,सुना मन बहलाओगे ?

तुम्हारी उदासीनता से,मेरा मन बौखलाया है ,
अपना महत्व जानने का,कीड़ा कुलबुलाया है,
क्या अब तुम्हें मुझसे,मुहब्बत ही नहीं रही ?
या मैं अब पुरानी हो चली हूँ,ये बात है सही ?

ये भी कोई जीवन है,न रूठना और न मनाना ,
तुम्हारा रोज ऑफिस और मेरा टिफिन बनाना ,
या बहुत साल संग रहते,सब आदत हो गई है ,
जो थी प्यार की खुमारी,कहीं जा के सो गई है।

तुम कामकाज पे जाते हो,मैं घर सम्हालती हूँ ,
न तो तुम कुछ कहते हो,और न मैं बोलती हूँ ,
मुझे तो ये पल-छिन,बिलकुल भी नहीं हैं भाते ,
हम मशीन की तरह,रोज के ये दिन हैं बिताते।

तुम चाँद तारों की अब कोई,बात नहीं हो करते ,
ये दिन बोरियत भरे अब तो,मुझसे नहीं हैं कटते ,
सो ! आज तो प्रिय मेरा तुमसे,रूठने का मन है ,
बस अपना वजूद ढूंढना है,और नहीं कोई गम है।

                                                               (  जयश्री वर्मा  )

Monday, April 3, 2017

मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी

मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी,तुम्हें झुकना होगा,
तुम सिर्फ मेरे हो,ये वादा तुम्हें करना होगा,
धोखा नहीं चलेगा,प्यार के इस व्यापार में,
खुल के दुनिया के सामने,दम भरना होगा।

सूरज की लाली संग,आशाएं जगानी होंगी,
दिन भर मेरी गृहस्थी की,नाव चलानी होगी,
शाम ढले मेरी चाहतों के,संग ढलना होगा,
मैं हूँ शमा निःशब्द,मुझ संग जलना होगा।

सावन के सभी गीत,मेरे सुरों संग गाने होंगे,
मेरे जज़्बात पतझड़ में भी,गुनगुनाने होंगे,
घर की किलकारियाँ,गले से लगानी होंगी,
ऊँगली थाम के उन्हें,हर राह दिखानी होगी।

मायूसियों में,अपना कन्धा भी बढ़ाना होगा,
बाँहों के दायरे में बाँध कर,सहलाना होगा,
आंसुओं को मेरी पलकों में,नहीं आने दोगे,
खुशियों को कभी मुझसे,दूर न जाने दोगे।

जब मेरा ये वज़ूद,तुम्हारी पहचान बन जाए,
मेरा नाम भी जब,तुम्हारा नाम ही कहलाए,
मेरी हिफाज़त,तुम्हारे अरमान में ढल जाए,
तुम्हारे ख़्वाबों में जब,मेरा तसव्वुर घुल जाएं।

विवाह की सारी कसमों को,निभाना ही होगा,
हर सुख-दुःख में रहोगे साथ,ये जताना होगा,
कितनी भी विपत्ति हो,मुख नहीं फेरोगे कभी,
मेरे हो,मेरे रहोगे सदा,कहो यहीं और अभी।  

मौसमों के साथ,मुझे महफूज़ रखना होगा,
अपनी जान से भी ज्यादा,प्यार करना होगा,
मैं कितनी भी ढल जाऊं,संग मेरे रहोगे सदा,
सच्चा साथी होने का फ़र्ज़,पूरा करोगे अदा।

सच कहो कभी भी,भरोसा मेरा नहीं तोड़ोगे,
जीवन के झंझावातों में,अकेला नहीं छोड़ोगे ,
तब मैं तुम्हारी संगिनी,हमसाया बन जाऊँगी,
तुम्हारी हर परिस्थिति के साथ ढल जाऊँगी।
पर ----
मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी,तुम्हें झुकना होगा,
तुम सिर्फ मेरे हो,ये वादा तुम्हें करना होगा।

                                              ( जयश्री वर्मा )







Saturday, March 18, 2017

तुम ही बताओ
















ये निगाहें इक अजीब सा ही गुनाह किये जाती हैं,
इधर-उधर भटकती सी तुम पे ही ठहर जाती हैं।
ये ज़ुबाँ है कि लफ़्ज़ों संग खेलना शौक है इसका,
पर क्यों ये तुम्हारे सामने बेज़ुबान सी बन जाती है।

ख़्वाब हैं कि ये तो,तुम्हारा तस्सवुर सजाए रहते हैं,
पलकें हैं कि ये तो रात भर,रतजगा किये जाती हैं।
ये हाथ मेरे,हाल-ए-दिल लिख के,तुम्हें बताना चाहें,
पर ये कलम है कि,ज़माने के खौफ से घबराती हैं।

ये कदम हैं जोकि गुज़रे हैं,कई मोड़,कई राहों से,
आता है जब दर तेरा,बिन रोके ही ठिठक जाते हैं।
दिल ने तो चाहा है तुम्हें,खुद से भी ज़्यादा टूट कर,
इज़हार करना चाहे पर,अलफ़ाज़ ही खो जाते हैं।

ख़ैरख्वाहों ने कहा,ये जुनून है,राह है भरी काँटों से ,
शूल के डरसे क्या,मुहब्बत छोड़ी,किसी ने फूल से?
खुदा के बनाए इन,पाक-प्यार के एहसासों के संग,
जीवन की इस खूबसूरती को,हम कैसे नकार जाएं?

तुम ही बताओ कि कैसे हम,तुम्हें एहसास दिला पाएं,
इस दिल के इन जज़्बातों को,तुम तक कैसे पहुंचाएं?
तुम्हारे लिए कितना आसान है,यूँ बेख्याल बन जाना,
पर हम सरीखे,शमा पे मिटने वाले,परवाने कहाँ जाएं ?

                                                                 जयश्री वर्मा

Friday, March 3, 2017

होली के मतवाले रंग


इस प्रकृति के सात रंग से जन्मे कई हज़ार हैं रंग,
ख़ुशी जताते चटकीले रंग,फीके हैं दुखियारे रंग,
इस जीवन की उठापटक के टेंशन वाले न्यारे रंग,
गर जीते तो सर्वेसर्वा वर्ना हैं आरोपों के सारे रंग,
तू-तू,मैं-मैं,ऐसा-वैसा और चुभते से झगड़ालू रंग,
बैर पुराना भूल उठाओ,ये होली के मतवाले रंग। 

गीत संगीत भाव फागुनी है,अल्हड़ हुआ ये मन,
भंग मलंग करे है दिल को,फुर्तीला हुआ है तन, 
चूनर ये रंग बिरंगी मत करना,ओ रंगरेज सजन,
धमकी आज नहीं चलेगी,चाहे कितने करो जतन,
हंसी ठिठोली,नयन चतुर और चुगली करें कंगन,
रंग बरसे,तन-मन भीगे,ये होली के मतवाले रंग। 

चाचा-चाची,मुन्ना-मुन्नी,कोई बचके जाने न पाए,
रोक-टोक अब नहीं चलेगी,कुछ मनमानी हो जाए,
ऐसे कैसे जाने दूँ भौजी,मौका फिर-फिर न आए,
चिप्स,पकौड़े,कचरी ले आओ,घर में जो हैं बनाए,
पापड़,दहीबड़ा,गुझिया संग,भंग का साथ सुहाए,
चलो उड़ाएं गुलाल लाल,ये होली के मतवाले रंग। 

धरती ने भी ली अंगड़ाई,रंग रंगीली बन कर छाई,
कोयल प्रेम गीत है गाती,अमियों ने है डाल झुकाई,
भँवरों के हैं गीत रसीले,बगिया है पुष्पों की सौगात,
लाल पलाश,बुरुंश दहके हैं,फागुन की नई है बात,
शर्म हया के दौर चल रहे,मन चंचल है भाव उदात्त,
कही,अनकही सब जानें,ये होली के मतवाले रंग।

रंग बिखेर जादू सा करती,प्रकृति हुई मतवाली,
डहेलिया,पिटूनिया,पैन्ज़ी,सुर्ख गुलाबों की लाली,
तिलस्मयी रंग बिखेर ये,जहां तिलस्मयी बनाए,
सब जीवों के मन भावों में देखो,प्रेम राग जगाए,
वशीभूत हुए हैं सभी,प्रकृति के देख निराले रंग,
बुलाएं सराबोर होने को,ये होली के मतवाले रंग।
 
कैसा ये खुमार छाया और,कैसा बिखरा हुआ है नूर,
मादकता है हवाओं में फैली,तन पे है चढ़ा  सुरूर,
रंगों की होड़ चली और सबको खुद पर है गुरूर,
इन साकार हुए ख़्वाबों को,पलकों में ही रहने दो,
शब्दों को मौन करो और अँखियों से ही कहने दो,
सभी भाव बयान कर देंगे,ये होली के मतवाले रंग।

                                                                                 ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, February 1, 2017

मन बसंत


पीले-पीले फूल खिले,सरसों से भरे हैं खेत झुके,
प्रकृति की ये छटा देख,कदम भी हैं रुके-रुके,
गेंदा हज़ारा की खिली,पंखुड़ियों की पीत छटा,
पीले से सभी फूल झांकें,हरे पत्तों की ओट हटा,
आसमान के योग से ये,खुल रहे हैं राज अनंत,
मदमाती,इठलाती सी,धरती हुई है आज बसंत।

माँ सरस्वती का वन्दन,बसंत का अभिनन्दन,
गीतों की फुहार से है,मन-मन,आनंद-आनंद,
होलिका का आह्वान,ख़ुशी,उत्साह संग-संग,
किसानों के सुर गूंजे,गुजरियों की चाल उमंग,
अठखेलियाँ,ठिठोली,ख़ुशी का नहीं कोई अंत,
हर ख़ुशी में बसंत और हर हास छलके बसंत।

तन,सांस महक रही,दिल की धड़कन है तेज़,
चूनर मोरी रंग दे बसंती,ओ रे सयाने रंगरेज,
सात सुर गूंजें नस-नस,प्रीत रच गीत संगीत,
मन विचार हैं बहके,कैसी ये प्रीत अगन रीत,
इस मीठी सिहरन का,नओरछोर,न कोईअंत,
ओ सुन पिया सँवारे!आज मेरा है मन बसंत।

                                       ( जयश्री वर्मा )

Friday, January 27, 2017

खेल राजनीति का खेलें

आओ हम मिलकरके खेल,राजनीति-राजनीति का खेलें,
देश को रखें एक तरफ और फिर सम्पूर्ण स्वार्थ में जी लें।

भिन्न-भिन्न पार्टियाँ बनाकर,चिन्ह अपनी पसंद का लगाएं ,
कमल,साइकिल,हाथी,पंजे या अन्य से,आओ इसे सजाएं।

करें घोटाले,घपले,हवाले,सबको खुली छूट है इस खेल में,
पैसे की महिमा के बल पर,कोई भी नहीं जाओगे जेल में।

देश डूबे या दुश्मन के हमले हों,कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ,
बस इक दूजे पे आक्षेप लगाएं,यह खेल है अलग सा निराला।

किसी को विदेशी,किसी को कट्टर कह जनता को भड़काएं,
सत्र कितना भी जरूरी हो पर,हर काम में ही रोड़ा अटकाएं।

बस अपने घर को धन से भर लें,चाहे ये जनता जाए भाड़ में ,
हर तरह का कर्म कर डालें,मुस्कुराते मुखौटे की आड़ में।

रमजान में रोज़ा इफ्तारी और मकर संक्रांति में हो खिचड़ी ,
हिन्दू,मुस्लिम वोट बैंक छलावे में,ये जनता भोली है जकड़ी ।

भाषण व उदघाटन उद्घोष कर,इस पब्लिक को बरगलाएं ,
और हर मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारा जा,ईशवर को भी फुसलाये।

पोशाक रहेगी सफ़ेद टोपी संग,पर कोई दाग न लगने पाए ,
सफ़ेद लिबास की आड़ में क्या करते हैं,कोई ये जान न पाए।

नए वादों के घोषणा पत्र बनाकर,मीडिया से प्रचार करवाएं ,
वादा खिलाफ़ी कर सकते हैं,पर पहले सत्ता अपनी हथियाएँ। 

स्कूल,अस्पताल,सड़क के नाम पर,धन में गोते खूब लगाएं ,
काम धकाधक होना जरूरी,चाहे सब फाइलों पे निपटाएं।

नियम क़ानून ताक पर रखकर,बस नोट की खेती उगाएं,
भूख,बाढ़ से कोई मरे तो,परिवार को,दो-दो लाख पकड़ाएं।

तुम सत्ता में रहो तो हमें सम्हालो,हम सत्ता में तुम्हें सम्हालें ,
कोर्ट,सीबीआई सब ही सध जाएगी,बेखौफ़ कुर्सी अपनालें ।

बड़ा आनंद आएगा चलो मिल,इस सत्ता का स्वाद भी ले लें ,
तो आओ हम मिल करके,खेल राजनीति-राजनीति का खेलें ।

                                                                         ( जयश्री वर्मा )





Wednesday, January 18, 2017

हमारे बाँकुरे जवान

जिनसे अपनी है सुबह शाम,वो हैं सीमाओं पर खड़े हुए,
वो प्रहरी वो सीमा रक्षक,वो जवान सीमाओं पर डटे हुए।

उनके होने से हम बेफिक्र,उनसे सुरक्षित अपना सम्मान,
उनके लिए तो बस सर्वोपरि,देश की-आन,बान और शान।

उनका भी तो है घर-द्वार,और उनका भी है अपना परिवार,
पर देश है उनकी प्राथमिकता,देश ही उनका सच्चा प्यार।

उनके लिए दिन-रात एक हैं,हरदम,हरपल सचेत वो रहते,
भारत माँ की रक्षा करने को,हंस-हंस कर सब कुछ सहते।

चाहे आंधी हो,तूफान चले,चाहे बरसें तीखे बर्फ के गोले ,
हो कैसा भी संकट,रुकावट,वो साहस संग सबकुछ सहलें।

दुश्मन कितनी कोशिश कर ले,पर इरादों को न डिगा सके,
हिम्मत उनकी है फौलादी,उन्हें कोई भी चुनौती न डरा सके,

प्राणों की बाजी लगा,शत्रुओं को हराएं ऐसे हैं बाँकुरे जवान,
तब स्वतंत्र हवा में सांस हम लेते,हमारे सपने चढ़ते परवान।

उनकी उम्मीद,तसल्ली उनके परिवार की चिट्ठी से जुड़ी है,
और घर जाने की छुट्टी स्नेह और उम्मीद से जुड़ी-कड़ी है।

रहे ये अमर जवान ज्योति सदा,हो सुरक्षित देश की आवाम,
हे वीरों ! शत-शत नमन तुम्हें,है मेरा शत-शत तुम्हें सलाम।

                                                                                        - जयश्री वर्मा 









Friday, December 9, 2016

ओ सृष्टि जननी

ओ पावन जीव जननी जलधार,महिमा तेरी अपरम्पार,
तेरे कारण ही,इस धरती पे फैला,इस सृष्टि का संचार,
तेरे वज़ूद के कारण ही,यह पृथ्वी,है नीला ग्रह कहलाई,
नदी किनारे बसीं सभ्यताएं,और विराटता इसने पाई।

तूने जलचर,थलचर,नभचर,सबकी ही प्यास बुझाई है,
तू जहाँ-कहीं से गुज़री जग में,वहीं पे हरियाली छाई है,
अपनी धुन में चंचल लहरों से,मधुर संगीत सुनाती तू,
हर बाधा को पार कर हमें,है जीवन का मर्म बताती तू।

है चहुँ और स्पंदन नदियों से,और नदियों से ही संसार,
युगों-युगों के इस बंधन संग,न हो उपेक्षा का व्यवहार,
नदियों से जीवन का रिश्ता,हमें हरहाल समझना होगा,
और जल संचयन का पाठ,हम सबको ही पढ़ना होगा।

वर्ना धरती पर बिखरी ये,मनभावन,हरियाली न होगी,
पशु,पक्षी,कीट और शिशुओं की किलकारी भी न होगी,
गर जल न रहा,वृक्ष न होंगे,तो आक्सीजन भी न बनेगी,
बिना प्राणवायु,इस जीवन की,फिर कहानी कैसे रहेगी।

जल का  महत्व जानके हम,इसकी उपलब्धता की सोचें,
जल संचय के उपाय निकालें,और जल संरक्षण की सोचें,
सदानीरा नदियाँ ये रहें और उनकी अमरता की भी सोचें ,
सोचें कि कैसे ये प्रकृति बचे,और भूजल बढ़ाने की सोचें।

जल संरक्षण हेतु इस जल को,व्यर्थ में न बहने दें हम,
वर्षा से प्राप्त जल,संचित कर,बेकार में न जाने दे हम,
नदियों अपनी स्वच्छ रखें,उन्हें प्रदूषित न होने दें हम,
गन्दगी,कूड़ा,पूजन-सामग्री फेंक बीमार न होने दे हम।

मृत पशु,मृत शरीर कदापि न,इन नदियों में बहाए जाएं,
अंतिम संस्कार को,इलेक्ट्रिक शव दाह गृह ही अपनाएं,
न डालें कारखानों का दूषित जल,इन पावन नदियों में,
वर्ना जीवन मुश्किल होगा,आगे आने वाली सदियों में। 

जल राशि का मूल्य जानें,ताकि भविष्य भयावह न रहे,
वृक्षों की तादाद बढ़ाएं,ताकि जल धरती में ही रुका रहे,
कुँए,पोखर व तालाब बनाएं,ताकि जल संचित होता रहे,
हर व्यक्ति जागरूक हो,ताकि जीवन धरती पे बचा रहे।

जल जीवन है,जल स्पंदन है,जल से है यह धरती जवान,
नदी बचाएं,नदी सहेजें,यही जल,जंगल,जमीन की जान,
इस आकाशगंगा में है केवल,पृथ्वी ही,जीवन की पहचान,
जल से ही जीवन संभव है,सबमें बांटना होगा यह ज्ञान।

                                                              ( जयश्री वर्मा )

Monday, October 24, 2016

"शुभ दीपावली"मनाएं

चलो दीप पर्व को,इस वर्ष,कुछ अलबेला सा मनाएं,
बुराइयों को बुहार के,आँगन में,खुशियों को ले आएं,
नवल वसन हों,भाव शुभता संग,आपसी प्रेम जगाए,
इस दीपावली को,मिल सब "शुभ दीपावली"बनाएं।

बढ़ाऊं दीपक,मैं हांथों से,और बाती को आप जगाएं,
विपरीत पवन,अगर तेज बहे तो,हथेली ओट बचाएं,
ले चलें उस,अँधेरी चौखट पे,जहां कहीं लगे वीराना,
हाथ बढ़ा के,नेह का सब मिल,जगमग दीप जलाएं।

शब्द सुनहरे आप चुनें,और संग में,सुरलहरी मेरी हो,
राग एक हो,तान एक हो,सबमें स्नेह लहर गहरी हो, 
गीत सरल हो,पकड़ गहन हो,जीवन संगीत सजाएं,
मधुरता से,गूँथ के हृदयों को,अपनत्व धुन बिखराएं।

रंग इन्द्रधनुष के,मैं समेट लूँ,कल्पनाएं आप सजाएं,
अल्पना के बेलबूटों में,सारे रंग,एकता के भर जाएं,
नारंगी,सफ़ेद,हरा रंग सुन्दर,सबसे ही प्रखर लगाएं,
इस दीपावली पर हिलमिल के,शुभता प्रतीक रचाएं।

मैं खुशियाँ,चुनकर ले लाऊँ,मुस्कुराहट आप फैलाएं,
मीठी बातों के संग हम,इक दूजे के,हृदयों बस जाएं,
धोखा,झूठ,मनमुटाव छोड़,मानवता को गले लगाएं,
इस त्यौहार,गले मिल आपस में,भाईचारा अपनाएं।

बिजली के बल्ब न हों,दीपों की झिलमिल लड़ी हो,
चेहरे पे मुस्कराहट सबके,खुशियों की फुलझड़ी हो,
भूखे पेट न सोए कोई भी,हर शख्स तृप्ति रस पाए,
स्वागत,सौहार्द से,मिलजुल सब मिलबांट के खाएं।

न हो उदासी,किसी ओर,खुशियों का अम्बार लगे,
न हो अंधियारा,कहीं पर,दीपक सारे जगमग जगें,
हिलमिल खुशियाँ,उमंग हृदय,अमावस को हराएं,
चलो हम सब मिल संग में"शुभ दीपावली"मनाएं।

                                                        ( जयश्री वर्मा )


Friday, October 7, 2016

कांटे की व्यथा

इक रोज़ पार्क में,बैठा था मैं,इक क्यारी के पास,
तभी आवाज़ आई,कुछ अपरिचित सी,कुछ ख़ास,
फिर चहुँ ओर मैंने,नज़र दौड़ाई,पर दिखा न कोई,
सोचा कि शायद,मेरे अंतर्मन का ही,भ्रम है कोई। 

फिर देखा,इक पौधे का काँटा,मुझको देख रहा था,
कुछ सवालिया सी दृष्टि,मुझ पर ही वो फेंक रहा था,
मैंने पूछा,क्या तुम्हें ही मुझसे,कुछ पूछना ख़ास है?
याकि मुझे यूँ ही,हो चला किसी भ्रम का,आभास है। 

वह बोला,ये सच है मैं तुमसे ही,मुखातिब हो रहा हूँ,
तुम भ्रम न समझो,मैं तुमसे सच में ही,बोल रहा हूँ,
कुछ सवाल हैं मेरे,मुझे तो तुम बस,उत्तर बतला दो,
मेरे मन की,यह उलझन,बस तुम जरा सुलझा दो।

मैं बोला,कि चलो कहो,क्या तुम्हारी प्रश्न-कथा है?
कह डालो,मुझसे आज,जो अंतरमन की व्यथा है,
वह बोला,क्यों भेद बड़ा है,मेरे और पुष्प के बीच?
जबकि एक डाल,रस,एक ही जल से गए हैं सींच।

तुम कवि हो कहो,तुम्हारा विषय,मैं क्यों न बना?
मुझपे,तुम्हारी लेखनी ने,भाव सुंदर क्यों न चुना?
फूल की ही,प्रशंसा पे तुमने,पोथियाँ हैं भर डालीं,
सारी ही सुन्दर उपमाएं,उसके नाम ही कर डालीं।

मैं कितना हूँ बलशाली,ज़रा मुझपे,नज़र तो डालो,
और कुछ,बेहतरीन नज़्में,मुझपे भी तो गढ़ डालो,
मेरी ताकत के आगे,देखो हर कोई,कमजोर पड़े,
मुझे छूने से मानव,तितली,भँवरे और पशु भी डरें। 

ताकत के कारण,उसके सर,दम्भ चढ़ा परवान था,
मैं उसकी घमंड भरी,मुस्कान पे,बहुत ही हैरान था,
मैं बोला कि,बुरा न मानो,तो मैं एक बात कहूँ भाई,
जिसको तुम,गुण समझ रहे,वही तो हैअसली बुराई।

शूल हो तुम,काम तुम्हारा,सिर्फ दुःख और दर्द देना,
सुख न देना कोई,बस,यूँ ही ताकत में,अकड़े रहना,
शूल से ही तो,सूली बनी,जिसका जान लेना काम है,
पुष्प भले ही,नाज़ुक सही,पर दिल मिलाना काम है। 

पुष्प तो,रंग दे जहान को,और खुशबूओं को नाम दे,
जन्म,मृत्यु,विवाह या मंदिर हो,हर जगह ही काम दे,
है पुष्प लचीला,हलकी हवा के,झोंकों में ही झूम ले,
जो भी उसे,प्यार से ले उठा,उसके हांथों को चूम ले।

दिलदार इतना कि,ओस की बूँदें भी,उस पर ठहर सकें,
रंग सुन्दर देख के,पंछी और तितलियाँ,आकर के रुकें,
इस प्यार और त्याग की तो,दुनिया ही पूरी दीवानी है,
गर कवि न मुग्ध हो,तो ये उसकी कलम की,नादानी है।

सारे जहां में रंग बिखेरे,ऐसा तिलस्मयी है उसका प्यार,
चरणों से शीश तक राज करे,ऐसे हैं उसके गुण हजार,
दुनिया भर में,प्रेम दिवस पे,जवां दिलों की वो आस है,
क्या अब तुम्हें अवगत हुआ,क्यों पुष्प दिल के पास है ?  

                                                                  ( जयश्री वर्मा)









 



Thursday, September 29, 2016

साथ तुम्हारा


साथ तुम्हारा पा के,ये जीवन,यूं खिल सा गया है,
जैसे ठहरी तंद्राओं को,इक वज़ूद सा,मिल गया है।

तुम्हारे इन हाथों में,जब भी कभी,मेरा हाथ होता है,
तो जैसे कि,मेरी खुदी का एहसास,तुम में खोता है।

तुम संग,मैंने जाना कि प्रकृति के रंग और भी हैं,
फूल,तितली,भंवरे,पंछी के गीत-गहन और भी हैं।

कि सब कुछ,लगे है कुछ अलग,और सुनहरा सा,
कि सोच पे से,जैसे उठ चला हो,धुंध का पहरा सा।

देखो जरा,इंद्रधनुष के ये रंग ज़्यादा चमकीले से हैं,
आज प्रकृति के,फैले राज़,जादा ही चटकीले से हैं।

कि आज ये धरती,आसमान,ये चाँद अपने से लगें,
जैसे प्रेम के,कई अध्याय,जेहन में एकसाथ जगें।

कि सूरज की,तपती लपट भी,शीतल सी लगती है,
और शीतल रात में,झुलसाती ख्वाहिशें,जगती हैं ।

सुबह की,मंद-मंद हवा,नए गीत गुनगुनाती सी है,
साँझ की,बोझिलता भी,नए उत्साह जगाती सी है।

कि तुमसे,मिलने को बेकरार,मन मेरा हो जाता है,
सामने तुमको,देख कर तृप्ति,और सुकून पाता है।

तुम संग,नया बंधन,कुछ अलग ही निराला सा है,
कि जैसे,सारा जहान मैंने,इन बाहों में सम्हाला है।

ये प्रेम बंधन,सृष्टि की हर जीवनी में,नज़र आते हैं,
ये बंधन,खुदा के साथ होने का एहसास दिलाते है।

काश कि! अपना ये संग-साथ,इतना प्रगाढ़ हो जाए,
मेरा तुम्हारा,वज़ूद मिट के,हम में तब्दील हो जाए।
                                                   
                                                                     जयश्री वर्मा
                                   

Friday, September 23, 2016

जल ही जीवन

जल के बिन किसी दशा में जीवन संभव नहीं हमारा,
जल संरक्षण ही अब रह गया जीवन का मात्र सहारा,
अन्धाधुन्ध जल दोहन से भविष्य बन रहा अंधियारा,
तब हाहाकार मचेगा जब,जल ही काल बनेगा हमारा।

जल,जंगल,जमीन स्थिति को गर हमने नहीं संवारा
डूबेगी सृष्टि उस सागर में जिसका कोइ नहीं किनारा
जलचर,थलचर,नभचर में ही है धरा का स्पंदन सारा
अंधाधुंध दोहन से बच पाएगा क्या ये संसार हमारा?

ये जीवन इसी लिए है क्योंकि धरती पर है जलनिधि,
इसे बचाने की कोशिश हमें करनी ही होगी हर विधि,
जल बिन तो यह धरती अपनी बन जाएगी शमशान,
शुष्क गृह कहलाएगी जीवन का न होगा नामोनिशान।

कठिन नहीं है बहुत सरल है जल संरक्षण का व्यवहार,
संरक्षण में चाहिए बस जागरूकता,ध्यान,ज्ञान-आधार,
जल क्षति बहुत हुई इसीसे,आज जल भी बना व्यापार,
जल के कारण ही है मिला हमें इस जीवन का उपहार।

जल जीवन है,जल औषधि है,जल सृष्टि और धरती है,
जल बर्बादी से आखिर जलनिधि की उम्र भी घटती है,
कुछ नियम हैं सीख सकें तो भविष्य भी सुरक्षित होगा,
जीवन सांस ले सकेगा तभी,जब जल संरक्षित होगा।

कुछ व्यवहार में लाने योग्य बातें....
जल संरक्षण होगा ......
जब घर का व्यर्थ जल गृह वाटिका के प्रयोग में आए,
जब टॉयलेट की फ्लश टंकी छोटे साइज़ की लगवाएं,
जब शेविंग समय नल की टोंटी लगातार खुली न छोड़ें,
घर की टपकती टोंटियों की तरफ अपना ध्यान मोड़ें।
जल संरक्षण होगा......
गर हम मुहीम छेड़ के बचे तालाबों को पाटने से रोकें,
जल संरक्षण होगा जब हम जंगल की कटान को रोकें,
जब अपनी सदानीरा नदियों को प्रदूषित होने से रोकें,
शासन-प्रशासन सक्रिय हो अपनी सारी ताकत झोंके।

उच्च शिक्षण तक जल संरक्षण अनिवार्य विषय बनाएं,
हर मानव अपने हिस्से का इक वृक्ष अपने हाथों लगाए,
जल ही जीवन इस स्लोगन का महत्व सभी को बताएं,
और जल संरक्षण की ये मशाल अगली पीढ़ी को थमाएं।

जल से पूर्ण धरती का सीमित जल ही है स्पंदन आधार,
ब्रह्माण्ड में हमें मिला इस जीवन का बहुमूल्य उपहार,
तो गर हम अपनी भावी पीढ़ी से करते हैं सचमें प्यार?
तो....
जल संरक्षण करके भविष्य पे करना होगा उपकार,
संरक्षण स्वयं ही होगा जब ये बन जाएगा व्यवहार।
                                            
                                                     (जयश्री वर्मा)

Tuesday, September 20, 2016

ज़िन्दगी क्या है ?

ज़िन्दगी क्या है ?

क्या ज़िन्दगी सवाल है ?
शायद ये सवाल है------
मुझे किसने है भेजा?कहाँ से हूँ मैं आया ?
क्या उद्देश्य है मेरा?ये जन्म क्यूँ है पाया ?
कब तक मैं हूँ यहां?और कहाँ मैं जाऊँगा ?
क्या छूटेगा मुझसे?और क्या मैं पाऊँगा ?
अपना कौन है मेरा?और पराया है कौन ?
किससे बोलूँ मैं?आखिर क्यों रहूँ मैं मौन ?
जिंदगी प्रश्नों से बुना इक जाल है।
हाँ !ज़िन्दगी इक सवाल है !

क्या जिन्दगी खूबसूरत है?
शायद ये ख़ूबसूरत है------

अनन्त ब्रह्माण्ड में विचरती पृथ्वी ये निराली ,
हर अँधेरी रात्रि के उपरान्त सुबह की ये लाली ,
फूलों के संग खेलते हुए ये भँवरे और तितली ,
सप्तरंगी सा इन्द्रधनुष और चंचल सी मछली ,
मधुर झोंकों संग झूमती बगिया की हरियाली,
क्षितिज पे अम्बर से मिलती धरती मतवाली।
जिंदगी विधाता की गढ़ी मूरत है।
हाँ !ज़िन्दगी खूबसूरत है !

क्या ज़िन्दगी प्यार है?
शायद ये प्यार है------
रिश्तों का प्यार और सारे बंधनों का सार ,
पाने और चाहने की इक मीठी सी फुहार ,
हौसलों से हासिल इक जीत का उल्लास ,
दुःख,सुख,प्रेम का है ये अनोखा अहसास ,
दोनों हाथों में भरके बहार को समेट लेना ,
कुछ प्यार बांटना कुछ हासिल कर लेना।
जिंदगी प्रेम का अजब व्यापार है।
हाँ !ज़िन्दगी इक प्यार है !

क्या जिन्दगी तलाश है?
शायद ये तलाश है ------
लक्ष्य कोई ढूंढना और फिर पाने की प्यास,
सतत् कोशिशों का इक निरंतर सा प्रयास,
तलाश स्वयं की,जन्म-मृत्यु,लोक-परलोक,
क्या जाने दूँ ,क्या सम्हालूँ,किसको लूँ रोक,
ज़िन्दगी की तलाश में उलझ-उलझ गया मैं,
कभी खुद के अधूरेपन से सुलग सा गया मैं,
जिंदगी तो आती-जाती हुई श्वाश है।
हाँ! ज़िन्दगी इक तलाश है!

क्या ज़िन्दगी कहानी है?
शायद ये कहानी है ------
अनादि काल से जीते-मरते असंख्य अफ़साने,
इतिहास के संग जो सुने-कहे गए जाने-अंजाने,
हर जीवन इक दूजे से मिलती-जुलती कहानी है,
स्वयं से स्वयं को रचने की इक कथा अंजानी है,
हमारा भूत और भविष्य ही हमारी ज़िंदगानी हैं,
आज हम वर्तमान हैं जो कल हो जानी पुरानी हैं,
जिंदगी कुछ अपनी कुछ वक्त की मनमानी है।
हाँ !ज़िन्दगी इक कहानी है !

जिंदगी के सवालों को उलझाता-सुलझाता रहा,
जिंदगी की खूबसूरतियों में खुद को डुबाता रहा,
प्यार पगी सी गरमाहटों को हृदय में भरता रहा,
कुछ पाने की तलाश मैं अनवरत ही करता रहा,
अपूर्ण,अतृप्त,अनभिज्ञ सा क्यों महसूस होता है?
सब कुछ है पास फिर भी अन्तर्मन क्यों रोता है?
खूब पढ़ा,जाना,परखा फिर भी अजब ज़िंदगानी है,
जिंदगी की परिभाषा,अब भी उतनी ही अनजानी है।
जिंदगी की परिभाषा-
अब भी उतनी ही अनजानी है।

                                               ( जयश्री वर्मा )




तुम आ जाओ

तुम आ जाओ कि देखो -
सांझ भी तो अब थकी-थकी सी हो चली है ,
गगन में पंछियों की कतारें लग रही भली हैं,
आपस में कह रहे दिनभर के शिक़वे गिले हैं,
नीड़ की ओर लौटते लग रहे कितने भले हैं,
आके देखो मैंने खुद को भी संवार लिया है,
चौखट पे भी रौशन कर लिया इक दीया है ,
कब से तुम्हारी बाट जोह रही हूँ घड़ी-घड़ी ,
हृदय में हलचल,कुछ सोच रही हूँ पड़ी-पड़ी ,
मैंने पांवों में अपने आलता भी तो है लगाया,
दिल के सोए हुए अरमानों को भी है जगाया,
देखो ज़रा पथिकहीन सूनी सी हो गई हैं राहें,
चाँद ने भी फैला दी हैं अपनी चांदनी की बाहें,
रात की शीतलता भी अब दिल जलाने लगी है,
विकलता भी तो किसी की नहीं हुयी सगी है,
दिन भर सुनती हूँ पपीहे की पीहू-पीहू के ताने ,
सखियों की छेड़छाड़ रहती है जाने-अनजाने,
कि यूँ जाया न करो कहीं दूर इतना तुम हमसे ,
रौशनी की तपन से नहीं,मन सुलगता है तम से ,
देखो अब तो घरों की कुण्डियाँ भी हैं लग गईं ,
और सोए हुए अरमानों की नींदें भी जग गईं ,
आ जाओ तुम कि-
अब मेरी विरह व्यथा इज़हार को तो समझो,
बुझे न मन की ये लौ,अरमान को तो समझो,
अब तो ये दीपक भी कंपकंपाने सा लगा है ,
मेरा इंतज़ार और श्रृंगार भी मुरझाने लगा है,
कि आ जाओ अब वरना मैं बेबसी से रो दूँगी,
तुम हो मेरे फिर भी मैं तुम्हें अपना न कहूँगी।


                                                   ( जयश्री वर्मा )



Monday, August 3, 2015

जरा कह दो

जरा इन राहों से कह दो,कि पलकें बिछाएं,
हवाओं से कह दो,दिलकश गीत गुनगुनाएं,
मोहक सुरलहरी से,दिलों में हलचल मचाके,
बहके जज़्बात के संग,आसमां पे छा जाएँ।  


बगिया से कह दो,नहीं फूलों पे कोई बंदिश,
जिन फूलों को संवरना है,खूब रंगों में नहाएं,
मतवाला बना दें,खुशबुओं से ये सारा समां,
ये विचारों में ढल के,मेरी सम्पूर्णता महकाएं।

नदियों से कह दो बनके,चंचल बेख़ौफ़ बहें ये,
कल-कल के शोर से,हर जीवन को भर जायें,
सूरज की ये मचलती,कुनकुनी धूप जो आई है,
पलकों में बसके,ये मेरी तमाम सुबहें चमकाएं।

चाँद-तारों से कह दो,टिमटिमा के संग सारे ये,
बदली की ओट छोड़,आके मेरी चूनर दमकाएं,
तितलियों से कह दो,भले ही यहाँ-वहाँ उड़ें सब,
ये जज़्बात मेरे दिल के,वो किसी से भी न बताएं।

जज़्बात मेरे सपने हैं,और ये राज मेरे अपने हैं,
मेरे अंतरमन के संग जुड़े,ये भाव बड़े गहरे हैं,
खो जाऊं जब मैं इन,मतवाले से ख़्वाबों के संग,
तब कह दो जमाने से कि,कोई शोर न मचाए।

ये ज़माना है मुझसे ही,भले ही ये इक भ्रम सही,
ये नव दास्ताँ है मेरी,जो किसी ने न पहले कही,
ये धरती तो मेरी है,और ये आसमान भी मेरा है,
मुक्त कंठ स्वीकारेगा युग,जो मेरी है कही-सुनी। 

जब सोच और स्वच्छंदता,मुझे ऐसे बेखौफ बनाए,
तब कोई भी छुपके-चुपके से,मेरे ख़्वाब न चुराए,
यूँ यौवन की दहलीज का,कुछ तकाज़ा ही ऐसा है,
कि खुशियाँ सारे जग की,इन बाहों में समा जाएं।

                                                                           ( जयश्री वर्मा )


Saturday, June 27, 2015

चोरनी हो तुम !

होंठों की लाली और,ये कपोलों की आभा गुलाबी,
फूलों की रंगीन सुर्खियां चुरा के रूप में सजाया है। 

छलिया भवरों की लेके चटक काली सी कालिमा,
काजल का नाम दे तुमने इन नयनों में बसाया है।

चाल भी तो चुराई है चंचल सी,चंचला हिरनी की,
चपलताओं की परिभाषा को,यूँ साक्षात बनाया है।

विभिन्न कलाएं चुराईं हैं,रूप बदलते चन्द्रमा से,
गुन गहन देख कर,ये गुणी चाँद भी शरमाया है। 

ये रंग लिए हैं सारे,तितली के रंगभरे परों से चुरा,
परिधानों बीच अपने,उन सभी रंगों को रचाया है। 

मिठास भी चुराई है बोली की,कोयल की कूक से,
झंकृत से शब्दों के संग,सारा समां ये चहकाया है।

बदलियों से चुराई है तुमने चाँद को छुपाने की कला,
के लटों से वैसे ही अपने मुखमण्डल को छुपाया है।

चोरनी हो तुम! तुमने मेरे दिल,ख़्वाब तो लिए हैं चुरा,
बल्कि पलकों के नीचे से,मेरी नींदों को भी चुराया है।


                                                                                                        जयश्री वर्मा
                                                                                                                                                                    

Saturday, May 30, 2015

अब दादी नहीं है

बचपन की बातें ,
मीठे से सपनों भरी रातें ,
गर्मी की छुट्टियाँ और गाँव को जाना ,
दादी के गलबहियाँ डाल लाड़ लड़ाना ,
वो आम के बगीचे में ,
सखियों संग उछलना-कूदना ,
वो फ्रॉक मोड़ छोटी-छोटी अमियाँ बटोरना ,
घर लौट सिलबट्टे पे ,
चटनी पिसवाना ,
और रोटी संग खूब चटखारे लेके,खाना,
मेड़ों पे दोनों हाथ फैला ,
हवाई जहाज़ बन दौड़ना ,
नाव बनाने को कागज़ दस जगह से मोड़ना ,
फिर नहर की लहरों संग उसको छोड़ना ,
किसकी नाव आगे है ये होड़ लगाना ,
देवी चबूतरे के पास मोरों को दौड़ाना ,
ट्यूबवेल पे जाके छप-छप नहाना ,
रेलगाड़ी की तरह लम्बी रेल बनाना ,
सबकी फ्रॉक पकड़ के छुक-छुक दौड़ाना,
स्टेशन आने पे झूठे ही-
चाय वाला,पान वाला चिल्लाना ,
शाम को थक हार दादी की गोदी में झूलना ,
किस्से-कहानी बूझना ,
अचंभित हो हंसना और सोचना ,
थपकी संग आँगन के नीम तले सोना ,
रात भर मीठे सपनों में झूलना खोना ,
अबकी जो गर्मी आएगी -
गाँव न मुझे खींचेगा ,
स्नेह की छाँव से कौन अब सींचेगा ,
मन में उठे सवालों का जवाब कौन देगा ,
गले से चिपका कौन लाड-प्यार करेगा ,
अब गाँव का रुख करने को दिल नहीं करता ,
मन की उहापोह से खुद ही है लड़ता ,
गाँव में मेरी अब दादी नहीं है ,
दादी तो अब खुद इक कहानी बनी है।

                                           ( जयश्री वर्मा )


Wednesday, May 13, 2015

काश कि




काश कि इस रात की चादर नीचे झुक जाए,
इतना कि मेरे इन दोनों हाथों से वो टकराए,
तोड़-तोड़ तारों को अपनी चूनर में टांक लूंगी,
चाँद को खींच के मैं इस आँचल में बाँध लूंगी,
चूनर को ओढ़ जब भी पल्लू की ओट देखूंगी,
खूबसूरती से भरे नवीन आयाम मैं रच दूंगी।

काश कि तितलियों का संग मुझे मिल जाए,
वो रंग सारे मिला दूँ तो रंग नया खिल जाए,
उन निराले रंगों से मैं श्रृंगार नवीन कर डालूं,
नव गजरों और फूलों से खुद को मैं भर डालूं,
तब रखूं मैं पग जहाँ भी राह नई सी बन जाए,
प्रेम में डूबे-पगे से मोड़ मीठे कई मिल जाएं।

काश कि हों बादल घनेरे आसमाँ बाहें फैलाए,
तड़ित की चपलता संग इन्द्रधनुष भी मुस्काए,
बावरा हो जाए समां,ये मन हो बहका-बहका,
धरती खिल उठे हो पवन सुर महका-महका,
काश कि ऐसे में कहीं से प्रिय प्यारा आ जाए,
तब स्वप्नों को पंख लगें,पंछी मन चहचहाए।

शब्दों को चुन-चुन के जो गीत नए मैंने बनाए,
पवन से कहूँगी की सुर लहरी बन के छा जाएं,
छा जाएं आसमाँ पे और बादलों में घुलमिल के,
वर्षा की बूंदों संग फिर से धरती को भिगा जाएं,
पर जानती हूँ ऐसा कुछ सम्भव न होगा कभी,
ये कल्पना लोक तो बसे हैं यथार्थ से परे कहीं।

                                                                                  - जयश्री वर्मा


Wednesday, May 6, 2015

क्यों पूछते हैं?

हाथों में हाथ थाम,साथ-साथ तय की लम्बी दूरियाँ,
हर मोड़ पे कसमें-वादे भी,निगाहों ने किये हैं बयाँ,
आपकी मंजिल की राहें,जब बन गयीं मंजिल मेरी,
फिर भला आप मेरा पता,मुझसे ही क्यों पूछते हैं?

आपकी हमराज़ हूँ मैं,ये तो खुद ही कुबूला आपने,
मुस्कान और आंसुओं के राज,खोले हमने साथ में,
आपको दिल देने में मैंने,देर न की इकपल सनम ,
फिर भी मुहब्बत की थाह,मुझसे ही क्यों पूछते हैं?

आपके हर गीत में,जादुई-शब्दों संग रहा साथ मेरा,
सप्तक कोई भी रहा हो,मधुर राग रहा है मेरा खरा,
बेसुरा-सुरीला तो आपके,हाथों रहा है हरदम सनम,
फिर गीतों की झंकार फीकी,मुझसे ही क्यों पूछते हैं?

आपके दिन-रात संग मैं,सोई-जगी हूँ आपके लिए,
आपके ख्वाब,जज़्बात,अहम रहे सदा ही मेरे लिए,
आपने खुद से ही है माना,खुद को अधूरा मेरे बिन,
फिर भला रिश्ते का नाम, मुझसे ही क्यों पूछते हैं?

जमाने की निगाहें तो,हरदम ही रिश्तों को हैं तोलतीं,
हर इक बंधन की डोर के,रेशों को हैं रह-रह खोलतीं,
गर साथ अपना है सच्चा,और अटूट है भी,ऐ साथी मेरे,
फिर लोगों के सवालों के जवाब,मुझसे ही क्यों पूछते हैं?

                                                                                              - जयश्री वर्मा


Wednesday, April 8, 2015

ओ प्रिये मेरी !

ओ प्रिये मेरी ! संगिनी मेरी ! ओ मेरे सपनों की रानी,
तुम बनी हो जब से मेरे इस जीवन की अमिट कहानी,
मैंने पाकर तुम्हें अपने साथ में धन्य खुद को है माना,
पर आसान नहीं है विवाह बंधन को यूँ निभा ले जाना ।

पहली रात से ही तुमने बनाई अजब वसूली की रीत,
जैसे कंगन,हार या झुमके पे ही टिकी हो मेरी ये प्रीत,
उस उपहार की कीमत से मेरा प्यार परखा था तुमने,
तुम्हारी मधुर मुस्कराहट पे दिल हार दिया था हमने। 

विवाह के साथ ही जैसे ये हक़ लेकर के तुम थीं आईं,
मैंने जुटाया मेहनत से,और मालकिन तुम कहलाईं,
आते ही टोका-टाकी संग मुझे जीने के ढंग सिखाए,
सज्जनता,सलीके से रहने के पाठ भी नए थे पढ़ाए।

मैं क्या खाऊंगा,पहनूंगा क्या,सबपे रही नज़र तुम्हारी,
मैं कहाँ गया,किससे बोला,इन सबपे बिठाई पहरेदारी,
ज़रा टाल-मटोल करने पे तुमने तेवर तीखे से दिखलाए,
बाहर अफ़सर,घर में क्या हूँ,इसके फर्क मुझे समझाए।

आसान नहीं था तुमसे कोई भी बात छिपा ले जाना,
किससे सीखा गुर ये तुमने,खुद में ही जासूस जगाना ?
कितनी बार कुरेद-कुरेद के कई सच तुमने उगलवाए,
हमें शर्मिंदा करके चेहरे पे विजय मुस्कान तुम लाए। 

पर जब गलती खुद से होती,झट भोली तुम बन जातीं,
तब हर-हाल में रो-रो के तुम अपनी ही बात मनवातीं,
रूठ जाओ तुम तो तुम्हें मनाना भी तो आसान नहीं है,
हर ख़ुशी के पीछे छिपी,ब्लैकमेलिंग की अदा कहीं है।

जीवन सफ़र कठिन था,हंसना-रोना,रूठना और मानना,
इस समाज में खुद को अच्छा पति बन करके दिखलाना,
के जिम्मेदार हुआ प्रिये मैं,तुम्हारे ही संग में चलते-चलते,
किनारा भी दिखने लगा यूँ उम्मीदों के संग पलते-पलते।

मैं प्रिये अब हुआ हूँ वृद्ध,तुम्हारे साथ में जीते और मरते,
कभी मैं हँसा,झुंझलाया कभी,कटी कभी तू-तू,मैं-मैं करते,
अब ओ प्रिये!मुझे तो तुम झुर्रियों संग भी भली लगती हो,
के मेरे इस जीवन में तुम,नित-नव आशाओं सी जगती हो।

मैंने जीवन में अब जाकर बहुमूल्य मोल तुम्हारा है जाना,
धूप-छाँव और सुबह-साँझ के सुखमय मेल को पहचाना,
तुम दूर न जाना ओ प्रिये मेरी इन पलकों से ओझल होके,
मेरे लिए तो ओ प्रिये!अब तुम हो,मुझमें मुझसे भी बढ़ के।

                                                                            - जयश्री वर्मा

Tuesday, March 17, 2015

अस्तित्व कहाँ ?

बिन पुष्पों के है मधुबन कैसा,
बिना अश्क के कोई नेत्र कहाँ ?
बिन रंगों के उत्सव भला कैसा,
बिना कहकहे उल्लास कहाँ ?
बिन पिता के पहचान है कैसी,
बिना जननी के है जन्म कहाँ ?
बिन मित्रों के खेल भला कैसा,
बिना क्रीड़ा के बाल्यकाल कहाँ ?
बिन साधना कोई शिक्षा कैसी,
बिना गुरु के है कोई ज्ञान कहाँ ?
बिन भूल का कोई यौवन कैसा,
बिना भ्रमर भला कमल कहाँ ?
बिन आध्यात्म साधू है कैसा,
बिना मानव भला ईश कहाँ ?
बिन साँस कोई जीवन कैसा,
बिना जल के कोई मीन कहाँ ?
बिन तरुवर के हरियाली कैसी,
बिना भाव के कोई हृदय कहाँ ?
बिन पाठक कोई लेखक कैसा,
बिना लेखक भला इतिहास कहाँ ?
बिन विछोह प्रेम-परख है कैसी,
बिना व्याकुलता के तृप्ति कहाँ ?
तुम बिन ओ प्रिय-प्रियतम मेरे,
तो फिर मेरा है अस्तित्व कहाँ ?

                                                                    ( जयश्री वर्मा )



Thursday, February 19, 2015

झूठ न बोलो

मित्रों! मेरी यह रचना दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन द्वारा प्रकाशित " सरिता " मार्च 2015 में प्रकाशित हुई है,आप भी इसे पढ़ें।
मित्रों! मेरी यह रचना जून  (द्धितीय ) 2017 में पुनः प्रकाशित हुई।

जब नज़र मिली तब था तुमने नज़रों को फेरा ,
पर रह-रह,फिर-फिर और रुक-रुक के देखा,
चेहरे पे अनजाने से थे भाव दिखाए ,
तुमने लाख छुपाए भाव मगर,
नज़रों में तो बात वही थी ।

महफ़िल में अनजाना सा था व्यवहार दिखाया,
तुम्हारी बातों में मेरा कोई भी जिक्र न आया,
तुम चहरे पर कोई शिकन भी न लाए,
पर जिन ग़ज़लों को छेड़ा तुमने ,
लफ़्ज़ों में तो बात वही थी ।

वही राहें सभी थीं पुरानी जानी और पहचानी,
जिन राहों पे कभी की थी हमने मनमानी,
तुम्हारा हर मोड़ पर रुकना और ठहरना,
फिर बोझिलता के संग कदम बढ़ाना,
बुझा-बुझा सा अहसास वही था।

चलो तुम्हारा यूँ नज़र फेरना मैंने माना जायज़,
तुम्हारे लफ्ज़ बेगाने थे ये भी माना जायज़,
राह बदलना चलो वो भी सब जायज़,
मगर ये झूठ न बोलो साथी कि-
तुमको मुझसे प्यार नहीं था।

तुमने नज़र जब फेरी थी तब आँसू थे उनमें,
लफ्ज़ भी तुम्हारे थे दर्द भरे और सहमे,
राहें जब बदलीं तब रुक-रुक के देखा,
पर ये सच तुम न छुपा सके थे,
कि-
तुमको मुझसे प्यार बहुत था,
अब सच कह दो न साथी-
तुमको मुझसे प्यार बहुत था।

                                          जयश्री वर्मा
                                                              

Monday, February 2, 2015

कुछ तो कहा है

कलियाँ अंगड़ाई भर-भर के मोहक रूप रख रहीं ,
फूलों की रंगीन सी छटा जैसे हर दृष्टि परख रही ,
खुशबू मनभावन सी भीनी-भीनी सी है बिखर रही ,
आखिर इन भवरों ने कलियों से कुछ तो कहा है।


हरियाली का जादू बिखेर देखो धरा श्रृंगार कर रही ,
पतझड़ की उदासीनता त्याग आँचल रंग भर रही ,
समृद्धि से भरी-भरी सी नव जीवनों को संवार रही ,
आखिर नीले एम्बर ने इस धरा से कुछ तो कहा है।

मेघों का अथक प्रयास है बूँदें वर्षा बन के झर रहीं ,
महीन-महीन धाराएं देखो नदियां बनके मचल रहीं  ,
कल-कल के सुर सजीले सजा के राग नए गुन रहीं ,
आखिर इस बदरिया से सागर ने कुछ तो कहा है।

केश काले उलझ-उलझ,उड़ चेहरे को हैं छेड़ रहे ,
बिंदिया,झुमके,कंगन,पायल यूँ शोर-जोर कर रहे ,
पलकें हैं झुकी-झुकी और मुखर शब्द क्यों मौन हैं ,
आखिर तो प्रियतम ने प्रिया से कुछ तो कहा है।

क्यों ऐसा लगे है सब तरफ जैसे साजिशें हजार हैं ,
चारों तरफ से घेर रही हो जैसे बहकी सी बयार है ,
मौसमों की हलचल में जैसे फितूर ही सा सवार है ,
सृष्टिकर्त्ता ने जैसे जवाँ दिलों से कुछ तो कहा है। 
                                 

                                                                                   ( जयश्री वर्मा )




Tuesday, January 13, 2015

तुम सुन रहे हो न?

ये पवन की सरसराहट,ये अजब जीवन की गुनगुनाहट ,
जगत-निर्माण से अब तक की ये रहस्यमयी सी आहट ,
सब जीवों में रह रही है,ये मुझमें तुममें भी तो बह रही है ,
हमारी कहानी सदियों से है एक,कुछ ऐसा ही कह रही है ,
हमारी धड़कनें अलग जिस्म,पर एक साथ चल रही हैं।
तुम सुन रहे हो न?
हमारी साँसें एक हो,एक रिदम में,एक साथ ढल रही हैं।


ये चाँद तारों से भरी सजीली-सुखद रात को तो देखो ज़रा ,
इसने बना दिया है मेरे बेरौनक से ख़्वाबों को भी सुनहरा ,
कोई न कोई मीठा स्वप्न पलकों में मेरी पलता रहता है ,
रात के गहराने के साथ भविष्य के लिए ढलता रहता है ,
रातें जगा रही हैं,मेरी और तुम्हारी तन्द्रा को बता रहीं हैं ,
तुम सुन रहे हो न?
ये हमारी मंजिल को इंगित कर इक नई राह दिखा रहीं हैं।


हमारी मुस्कराहट का एक दूसरे को देख रहस्यमयी होना ,
इन प्यार भरे अमूल्य लम्हों को तुम भूल कर भी न खोना ,
देखो हम मनुष्य हैं,हमें सामाजिक बंधनों के संग है जीना ,
बावजूद इसके भी,आसान नहीं इक दूजे का होकर के रहना ,
कुछ वादे हैं,कुछ कसमें हैं,संग-साथ में जीने-मरने के लिए ,
तुम सुन रहे हो न?
ये हमें समझा रहें हैं कुछ मायने गूढ़ साथ चलने के लिए।

सफल तो वही जो हर उतार-चढ़ाव के अमृत-गरल को पी ले ,
कैसा भी आये वक्त घबड़ाए न कभी और हर लम्हे को जी ले ,
तभी पहचान बनेगी हमारे जीवन की सफलता की कहानी की,
वर्ना तो कहानी है आंसुओं में खोई हुई गुमनाम ज़िंदगानी की ,
इस बंधन के धागे जितने पक्के हैं सुना है उतने ही कच्चे हैं ,
तुम सुन रहे हो न?
ये धागे अपनत्व भरे भाव से हमें बनाने सतरंगी और सच्चे हैं।

मैं तो हर आते पल,हर क्षण बस प्रिय सिर्फ तुम्हारी ही रहूंगी,
अपनी उठती गिरती हर सांस के संग विश्वाश से भर कहूँगी,
कि इस जन्म और जीवन पर हक़ सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा है,
तुम्हारे हर बढ़े हुए कदम के संग मेरे हर कदम का सहारा है,
मैंने तो स्वयं के लिए तुम्हारे सिवा है नहीं चुना कोई विकल्प,
तुम सुन रहे हो न?
तुम भी चुन रहे हो न!संग हाथ थाम साथ चलने का संकल्प।

                                                  जयश्री वर्मा










Tuesday, December 9, 2014

सब तिलिस्मयी

फूलों के रंगों की छटा कुछ हो चली है सुरमई,
वो भी दिल खोल के खिले जो थे पुष्प छुई-मुई,
कलियों की मुस्कुराहटें हो चलीं हैं रहस्यमयी,
भंवरों की गुनगुनाहट भी हो चली है मनचली।

हवाओं में भी कुछ-कुछ सिहरन सी जागी है,
बागों में बिखरीं चंचलताएं,संग नए साथी हैं,
हाथों में हाथ लिए गूढ़ विश्वास संग डोलते हैं,
साथ-साथ,जीने-मरने के वादे पक्के बोलते हैं।

धरा भी खुद पे रीझती,इठलाती सी है दिख रही,
यहाँ-वहाँ,जहाँ-तहाँ जादू सा जगाती फिर रही,
गेंदा,गुलाब,डहेलिया या गुलदाऊदी,सूरजमुखी,
रंग बिखेर दिए हैं सारे सब के सब तिलिस्मयी।

ऐसे में हर मन के भाव स्वतः ही खुल जाते हैं,
दिल की वीणा के तार स्वतः ही झनझनाते हैं,
बंधन सारे खुल गए,मन-तन्द्रा की तिजोरी के,
वो स्वप्न उजागर हुए,जो देखे थे कभी चोरी से।

मन में छुपाऊं उन्हें पर आतुर नैनों से झांकते हैं,
पारखी तो नैनों को पढ़ के प्रेम गहराई आंकते हैं,
स्वप्न हैं सजीले से कुछ लजीले व कुछ शातिर हैं,
ये वक्त की शिला पे चिन्ह लिखने को आतुर से हैं।

हृदय को मैं लाख रोकूँ कि भावों को यूँ न बहकाओ,
रह-रह के यूँ विचारों को तुम बेलगाम न भटकाओ,
पर दिल विवश हो कहता है कहीं से तुम आ जाओ,
के मेरे साथ सृष्टि की इन खूबसूरतीयों में खो जाओ।

                                                                                                     -  जयश्री वर्मा




Friday, November 28, 2014

शुक्रगुज़ार हूँ तुम्हारा !

आज तेरी यादों ने मन की राहों को ऐसे मोड़ा है ,
कि भरे जग में मुझे यूॅ वीरानियों में लाके छोड़ा है ,
घेरे हुए हैं मुझे चहुंओर से तेरे तमाम अफ़साने , 
वो तुम्हारा हॅसना,रूठना,मनाना जाने-अनजाने। 

ये मन तमाम कोशिशों बावजूद जकड़ता जाता है ,
बेबस हो तुम्हारी यादों का हाथ पकड़ता जाता है ,
चला आया हूँ जहां पे सारी कोशिशें बेमानी सी हैं ,
ये जग सारा और उसकी ये जीवंतता पानी सी है।  

कि इक सुख है अजीब इस बेरुखे एकाकीपन में ,
जहां मैं हूँ और बस साथ तेरे सपने हैं अंतर्मन में ,
लोग तो इसे मेरा अजीब दीवानापन ही कहते हैं ,
कुछ बेचारा,दुखियारा और कुछ परवाना कहते हैं। 

वो नहीं समझते कि जीवन का एक रूप यह भी है ,
हम जैसों के लिए मौसम की धूप-छाँव ऐसी भी है ,
इस मेरे कल्पनालोक में मेरे जन्मों का प्रेम रहता है ,
जो हम सरीखों के किस्से दोहराता और कहता है। 

यहां सुखद प्रेमभरी,अपनत्वभरी निजता की बातें हैं ,
जहां कुछ भी विलगाव नहीं बस उम्मीद से भरी रातें हैं ,
इस संसार में जहां विछोह,कटुता,धोखा और धृष्टता है ,
 पर ये मेरा प्रेम-संसार सिर्फ प्रेम में ही रचता-बसता है। 

मौसम,फूल,पंछी देखो सब के सब सुहाने से हो गए हैं ,
भागते हुए से विचार भी जहां के मनमाने से हो गए हैं ,
शुक्रिया है ऐ जमाने तेरा ! कि मुझे नए से तराने दिए हैं ,
शुक्रिया है तुम्हारा इस नई दुनिया से मिलाने के लिए। 

                                         
                                                                              - जयश्री वर्मा 



Thursday, November 13, 2014

ज़माना हमारा-तुम्हारा

वो पर्दों के अंदर चुपके-छुपके झांकती निगाहें,
लाज भरी खिलखिलाहटें औरसिमटी सी बाहें,
कहीं पे खो सा गया है शर्मिंदगी का वो उजाला,
आधुनिकता ने आज सबको बेबाक बना डाला।

अब बागों में है कुछ सहमी सी हवा की रवानी,
वो सूखे दरख्तो पे गूंजती हरियाली की कहानी,
वो भवरों का कलियों-फूलों में सुगंध को ढूंढना,
अब जैसे है बेरौनक फूलों की बुझी सी जवानी।

विवाह जोड़ मिलाना सुसम्पन्न वर-वधू प्यारे,
अब बेलगाम बातें हैं और बेलगाम से हैं इशारे,
क्यों बेरौनक से हो चले ख्वाब युवाओं के सारे,
लिहाज़ छोड़ अब बेशर्मी का समां सा छा गया।

न बड़ों का सम्मान है न छोटों से है कुछ लगाव,
बस दिखता है सिर्फ अपने सुख-दुःख का बहाव,
ज़माना कहाँ से चला था और अब कहाँ आ गया,
आज की उच्श्रृंखलता ने देखो अदब मार डाला।

न दादी की बातें हैं और न है अब नानी का प्यार,
न रहे खेल निश्छल निराले,न झूले और बरसात,
टी०वी०,कम्प्यूटर के हिंसक खेल के अब ज़माने,
ये बच्चे भटककर आज अनजाने ही कहाँ आ गए।

ये फिसलन है गहरी जो अब नहीं है रुकने वाली,
बस बेख़ौफ़ उच्श्रृंखलता और बात-बात में गाली,
स्वार्थ को सिर्फ जानते हैं परमार्थ से है किनारा,
अब खो गया है वो कहीं-ज़माना हमारा-तुम्हारा।

                                               ( जयश्री वर्मा )







Wednesday, October 29, 2014

मैंने कब कहा ?

मैंने कब कहा प्रिय कि मुझे तुमसे बेहद प्यार है ?
हर पल,हर घड़ी बस सिर्फ तुम्हारा ही इंतज़ार है,
वो तो निगाहें हैं जो कि उठ जाती हैं हर आहट पर,
ढूँढती हैं तुम्हारी छवि,इनका वश नहीं है खुद पर ,
कि जैसे आ ही जाओगे तुम कहीं से और कभी भी,
इक इच्छा सी है अंदर,कुछ जगी सी,कुछ बुझी सी।

मैंने कब कहा कि सबके बीच तुम्हें याद करती हूँ ?
कि बातों में तुम बसे हो तुम्हारा ही दम भरती हूँ,
वो तो ज़ुबान है की बरबस ही तुम्हारा नाम लेती है,
और मेरी बातों में दुनिया तुम्हारा अक्स देखती है,
न,न मैं तो जिक्र भी नहीं तुम्हारा करती हूँ कभी,
पशोपेश में हूँ मैं,न जानूँ ये गलत है या फिर सही।


मैंने कब कहा,मैंने अपना दिल तुमको है दिया ?
और इस जीवन भर का वादा तुमसे ही है किया,
ये तो मेरी रातें हैं जोकि मेरा मजाक सा उड़ाती हैं,
न जाने मुझे क्यूँ बरबस ही ये रात भर जगाती हैं,
ख्वाब भी जो थे मेरे,तुम्हारे ही साथ में हो लिए हैं,
तुम्हारी ही सूरत से जैसे सारे नाते जोड़ लिए हैं ।

पर शायद कुछ ऐसा हो रहा है,अंजाना सा मेरे संग,
घेर रहे हैं तुम्हारे याद बादल,ले के साजिशों के रंग,
ये बादल बेरहम मुझे तन्हा नहीं छोड़ते हैं कभी भी,
छाए रहते हैं मनमस्तिष्क पे हरपल और अभी भी,
पर फिर भी इसका मतलब,इसे इकरार न समझना,
मुझे तुमसे प्यार है ये हरगिज़-हरगिज़ न समझना।

                                                ( जयश्री वर्मा )



Wednesday, October 15, 2014

भविष्य नया ढूंढूंगी

लो मैंने तोड़ दिए अब,सब तुम्हारे ये बंधन ,
तुम्हारे दोषारोपण और तुमसे ये अनबन ,
अब और नहीं जागूंगी मैं और नहीं रोऊंगी,
काल की किताब के मैं पृष्ठ नए खोलूंगी।
अपनों का साथ छोड़,तुम्हारे संग मैं आई थी ,
आँखों में सपने और प्यार भी अथाह लाई थी ,
पर ये कैसा जीवन और कैसा ये संसार था ,
बाहों का सहारा नहीं,काँटों भरा यह हार था।

कैसा ये आँगन था और कैसा था ये घरबार ,
सब कुछ था यहाँ,न था अपनत्व और प्यार ,
आशीर्वाद की छाँव नहीं,था आँखों का अंगार ,
एक-एक कर बिखरा मेरा सपनों का संसार।

भले जग पुरुष प्रधान पर उतना ही हमारा है,
न हो कोई साथ पर संग में आत्मबल हमारा है,
बिन तुम्हारे सहारे,मैं भी कमजोर नहीं पड़ूँगी,
आक्षेप,कठिनाई कुछ भी हो सबसे ही लड़ूंगी।

माना इस संस्कृति में,जीवन दो हैं हर नारी के,
एक जन्म के संग मिला तो दूजा संग है शादी के,
हर हाल समझौता करना यही धर्म रीत सिखाई,
पूर्ण सामर्थ्य किया सब कुछ फिर भी बेवफ़ाई।

मैं भी हूँ मनुष्य और ये सुन्दर जग मेरा भी तो है,
जीवन माधुर्य सभी,मुझे भी महसूस तो करना है,
नहीं जाएगा जन्म निरर्थक ठानी है जब मन की,
मेरी भी जवाबदेही है आखिर मेरे इस जीवन की,

बस-बस-बस मुझे अब अति और नहीं सहना है ,
भावों के आवेश में मुझे अब और नहीं बहना है ,
बना लूंगी रास्ते और भविष्य अपना नया ढूंढूंगी ,
अस्तित्व नहीं खाऊँगी मैं अब कैसे भी जी लूंगी।


                                                                  ( जयश्री वर्मा )

Thursday, September 25, 2014

आप कहें तो

मित्रों मेरी यह रचना दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन द्वारा प्रकाशित गृहशोभा में प्रकाशित हुई है,आप भी इसे पढ़ें।


आप कहें तो आपको इस दिल की गहराइयों में बसाऊं,
आपकी कल्पनाओं को थाम के कई अफ़साने सजाऊं। 



आप कहें तो आपको सोते-जागते से ख़्वाबों के शहर में ,
गुनगुनाते,खोए-खोए,सुन्दर स्वप्न सजे,नित गाँव घुमाऊं। 

फूलों और तितलियों के रंगों में डूबे,गीतों से सजे सुरों में ,
बेबाक सुलझे-अनसुलझे सवालों की उलझनें सुलझाऊँ।  

पूस सी सर्द सिहरनभरी और जेठ सी तपती ख्वाबगाह में ,
आप का साथ पाके मैं इक महफूज़ अपना जहान बसाऊं। 

जग से चुरा लूँ आपको,टकरा जाऊं जमाने की हर शै से ,
अगर जो मैं आपका हमदम,हमसफ़र,हमराज़ कहलाऊं। 

आपको अपना बनाने के दरम्यान जमाने के हर सवाल पर , 
आपको आंच न आने दूँ,हर निगाह का जवाब मैं बन जाऊँ।  

आपके यूँ मुस्कुरा के निकल जाने की बेख़याल अदा को , 
अपने प्रेमपगे भावों संग गूंथ,कोई प्यारा,इक नाम दे जाऊं। 

आप कहें मनमीत तो मैं जीवनभर बस आपका ही होकर , 
खुशियों और उमंगों को समेटने में सारा ये जहान भुलाऊं ।

                                                                       ( जयश्री वर्मा )  





Thursday, September 11, 2014

जानम मैं हूँ न !


अपना बनाने की कला,जो तुमने है सीखी,
एम.बी.ए. की डिग्री भी,फेल मैंने है देखी,
आँखों के फंदे में ऐसा,तुमने मुझे फंसाया,
हाय ! ख़ुदा भी मेरा,न मुझे सम्हाल पाया,
सारे अस्त्र-शस्त्र प्रेम के,मारे हैं तुमने ऐसे,
ताउम्र का बांड निभाने को जानम मैं हूँ न !



मैं,मुन्नी,चिंटू सब हैं जैसे तुम्हारे सबॉर्डिनेट,
आर्डर देने में प्रिय तुमने,किया कभी न वेट,
चलाओ धौंस,पड़ोसियों से भी उलझ जाओ,
हक़ है तुम्हें मुकाबले में,जीत तुम ही पाओ,
ढाल हूँ मैं आखिर तुम्हारी,सुरक्षा ही करूंगा,
सारे बिगड़े मसले सुलझाने को जानम मैं हूँ न !


किटी पार्टी में जाओ तो,बहार बनके छाओ,
टिकुली,झुमका,सेंट,सारे श्रृंगार भरके जाओ,
हाउज़ी खेलने में प्रिय पैसे लगाना बेझिझक,
कहलाना न पिछड़ी,एक-दो घूँट लेना गटक,
हंसना है सेहतमंद,सो कहकहे खूब लगाना,
तुम्हारे ये सारे खर्च उठाने को जानम मैं हूँ न !



बटुए के पैसे ज़ेवर और साड़ियों पे लुटाओ,
पहन-पहन के सब,जबरन मुझे दिखाओ,
तारीफ़ न मिले जो,तुम्हारे मन के मुताबिक़,
रूठ जाना हक़ से,संग शब्दबाण अधिक,
मानना तभी,जब फरमाइश हो कोई पूरी,
आखिर तो नाज़ उठाने को जानम मैं हूँ न !


फिर भी हो जानम तुम,मेरे इस घर की रानी,
मेरे इस जीवन-जनम की,हो अमिट कहानी,
तुम रूठो,रिझाओ या मुझे बातों से बहकाओ,
खुशियों में सदा झूलो,हरदम खिलखिलाओ,
मैंने जीवन सौंपा तुम्हें,पूरे इस जन्म के लिए,
हर तरह की शै से जूझने को जानम मैं हूँ न !

                                                      ( जयश्री वर्मा )

Thursday, September 4, 2014

बहका गई

बादल जो बेख़ौफ़ उमड़े हैं,कैसे घनघोर घुमड़े हैं,
प्रकृति के वाद्य पर देखो,सुरीले गीत कई उमड़े हैं,
हलकी ठंडी-ठंडी बयार,और देखो बूँद-बूँद फुहार,
तन को भिगो गई,और मन में सपने भी संजो गई।
पपीहे की ये पिहु-पिहु,ये पक्षियों की चहक-चहक,
किलोल करते फूलों की,ये मदमाती महक-दहक,
सतरंगी इन्द्रधनुष की,रंगीली,रंगों भरी ये रंगधार,
कोरी ओढ़नी में रंग भर,प्रीत के गीत में डुबो गई।

ये कैसी फुसफुसाहट है,अजब सी सरसराहट है ?
ये कैसी कलियों के संग भंवरों की गुनगुनाहट है ?
फूलों के रंगों संग,फूट पड़ी धरती की बौराहटह,
अजब सी अनुभूति जागी,तन-मन उमंगें पिरो गई।

ऐसे में चुप-चुप रह बेपरवाह से सुर अनंत फूटे हैं,
कई राग-रंग अंग बिखेर दिए,सपनों ने जो लूटे हैं,
मन की सुर-वीणा की मधुर,नशीली सी ये झंकार ,
बौराए मन आँगन का देखो छोर-छोर भिगो गई।

कुछ भी न कहो ऐसे में बस निःशब्द ही रहने दो,
बोलने दो भावों को,ज़ुबान के बोल शांत रहने दो,
हृदय की विरह वेदना,पलकों से छलक जो पड़ी है ,
वर्षों की एकाकी जीवन व्यथा,दो बूंदो से कह गई।

                                                                                       ( जयश्री वर्मा )



Thursday, August 28, 2014

सदा बनी रहे

सूरज की लाली,पृथ्वी की हरियाली,
सागर का धैर्य,नदियों की लहरें मतवाली,
पंछियों का कलरव,भँवरों के गुनगुन का हौसला,
पुष्पों की रंगत और मनभावन ख़ुश्बू,सदा बनी रहे,बनी रहे।

बच्चों का बचपन,माँ का ममत्व,दुलराना,
पिता की छत्रछाया,गुरु का जीवन संवारना,
शिष्यों में शिष्टाचार,दोस्तों का हो विश्वास,प्यार,
दादी,नानी की कहानियाँ हज़ार,सदा बनी रहें,बनी रहें।

पुरुषों में स्वाभिमान,ललनाओं का सम्मान,
बुज़ुर्गों का आशीर्वाद,सन्यासियों में हो साधुवाद,
आपसी भाईचारा,समाज सदा विकसित हो हमारा,
संस्कृति और सभ्यता की पहचान,सदा बनी रहे,बनी रहे।

बहन का रक्षाबन्ध,भाई की सौगंध,
त्योहारों के रंग,संस्कृतियों के नवीन ढंग,
गीतों की सुरलहरी और सीमा पर सजग प्रहरी,
कर्मठता के हौसलों की नित प्यास,सदा बनी रहे,बनी रहे।

 धर्मों की अनेकता,ईश्वर नाम की एकता,
भाषाओं में चाहे भिन्नता,भावों की समानता,
प्रेम,दया,सौहार्द,अपनत्व,सम्मान और स्वाभिमान,
सहिष्णुता,सदभावना की मिठास,सदा बनी रहे,बनी रहे।

राष्ट्र गान,राष्ट्र गीत,राष्ट्रीय चिन्ह,राष्ट्रीय खेल,
लोक गीत,लोक कलाएं,वीर गाथाओं की अमर बेल,
ग्रामीण जीवन,जल,जंगल,जमीन,विज्ञान का अद्भुत मेल,
जगत में भारत के इस तिरंगे की पहचान,सदा बनी रहे,बनी रहे।


                                                                                  -  जयश्री वर्मा

 


Tuesday, August 19, 2014

तो जी ही लूंगा

मुख फेर रहे हो क्यों मुझसे,जा रहे हो क्यूँ हाथ-साथ छोड़ कर ?        
सच है!जी नहीं पाओगे तुम भी इस तरह,राह अपनी मोड़ कर।

क्यों समेटे लिए जा रहे हो संग अपने,मेरे जीवन के सारे बसंत,
जियूँगा कैसे मैं पतझड़ सी वीरानी,बेखौफ़ ख़ामोशियों के संग।

बिन सहारे मैं तुम्हारे,न रह पाऊंगा,खुद ही से गैर हो जाऊँगा,
ख्यालों में छवि देखूंगा तेरी,लिखके तेरा नाम यूँ ही मिटाऊंगा।  

पर अगर इस तरह जाना ही है,तुम्हें यूँ मुझसे अंजाना बनकर,
ले जाओ सारी यादें अपनी,और फिर देखना न मुझे घूमकर।
  
करो मुझसे कुछ वादे,तुम्हें,तुम्हारे उन अपने लम्हों की कसम,
मेरा ज़िक्र भी नहीं लाओगे,कभी जुबां पर अपनी,ऐ मेरे सनम।

नहीं कमजोर पड़ूंगा,तुम्हारे लिए,जो जीना पड़ा तो जी ही लूंगा,
नहीं करूंगा अब प्रेम किसी से,न रोऊंगा न आहें ही भरूँगा।

शुभकामनाएं देता हूँ क्योंकि,सच्चा दिल सिर्फ दुआएं देता है,
राह में जो बिखरे हों कांटे तो उन्हें चुन के फूल बिछा देता है।

ईश्वर किसी दुश्मन को भी,कभी ऐसा,दर्द भरा दिन न दिखाए ,
कि जिस्म को रहना पड़े अकेले और जान उससे जुदा हो जाए। 

                                                     ( जयश्री वर्मा )


Wednesday, August 13, 2014

मैं हूँ युग युवा

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
मैं हूँ युग युवा,नित नयी लगन लगा,नव राहों पे बढ़ता जा हूँ,
शिक्षा की सीढ़ी,हौसलों के साथ,हर ऊँचाइयाँ चढ़ता जा  हूँ। 

राह में अनेक देवालय,मस्जिद,गिरजाघर और गुरूद्वारे मिले,
उन्हें शीश झुकाके,अंतर हृदय से,नमन मैं करता जा रहा हूँ। 

सभी ग्रंथों की शिक्षा,कुरान,बाइबिल,गुरुग्रंथ या पवित्र गीता,
उनकी सीख,सर-आँखों पे रख,मन ही मन गुनता जा रहा हूँ। 

अनेकता संग एकता में बसी,भारत की सुन्दर भिन्न संस्कृति, 
दोनों हाथों से अंगीकार कर,अंतर्मन से समझता जा रहा हूँ।

मैं भारत की नव तकदीर,मेरे लिए हर भारतीय एक सामान,
मैं मानवता का बीज लिए,हर जन के मन में रोपता जा रहा हूँ।

मुझे कहीं अन्यत्र न ढूंढो,मैं हर जागरूक सोच में बसा हुआ,
नव विकास की मशाल जला,ये राहें रौशन करता जा रहा हूँ। 

मैं इस हिन्दुस्तान का निर्भय युवा,मुझे बाधाओं से कैसा डर,
अपने इतिहास को धरोहर बना,नव भविष्य गढ़ता जा रहा हूँ।

मैं हूँ भारत की सच्ची तस्वीर,संसार पटल पर,अमरता लिख, 
आकाश-चाँद मुठ्ठी में बाँध,मंगल की जमीन छूने जा रहा हूँ।

मैं विकसित विचार,मैं हूँ युग युवा,उत्सुकता और हौसलों संग,
अपनी भारत माँ के आँचल के,नित नव सूत बुनता जा रहा हूँ।

                                                                 - जयश्री वर्मा