Sunday, April 15, 2012

सन्देश

मित्रों ! मेरी यह रचना मासिक पत्र " मृगपाल " ( सितम्बर 1995 अंक ) जो कि झाँसी से प्रकाशित है में प्रकाशित हुई है , आप भी इस रचना को पढ़ें !                                                                


चिंताएं जिससे डरती थीं,
मुस्कानें जिस पर मरतीं थीं,
अपना प्यारा भोला-भला वो,
बचपन कितना प्यारा था।

दादी की कहानी राजा- रानी,
परियों की नगरी में रहते थे,
अपनी दुनिया के शेर बने,
हम नहीं किसी की सहते थे।

तब नहीं थी कोई छूत-छात,
तब नहीं थी कोई जात-पात,
तब नहीं था कोई धर्म-वर्म,
तब नहीं था कोई प्रान्त-व्रांत।

बड़े हुए तो सब छिन गया,
वह अपनापन, वह प्रेम प्यार,
चार धर्म की बात तो छोड़ो,
हर धर्म में ही कई जात-पात।

एक ही धरती पर पैदा हो,
धरती के टुकड़ों को लड़ते हैं,
धरती माँ के लाल आज,
आपस में कटते मरते हैं।

भारत माँ के हम चार पुत्र,
हिन्दू ,मुस्लिम,सिख,ईसाई,
माँ को कितना दुःख होता होगा,
लड़ पड़ते जब भाई-भाई।

हम एक छत के चार खंभ,
जब बंट कर अलग हो जायेंगे,
गिर पड़ेगी टूटकर घर की छत,
तब क्या हासिल कर पायेंगे।

जागो-चेतो ऐ माँ के बेटों,
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा,
जो हुई हानि वो भूल जाओ,
छोड़ो आपसी लड़ाई झगड़ा।

तुम नहीं समझ रहे दुश्मन को,
वो बहुत चतुर है बहुत सबल,
अगर अभी नहीं संभले तुम तो,
फिर नहीं निकलेगा कोई हल।

तुम नहीं सिख, तुम नहीं हिन्दू ,
न मुस्लिम और न ईसाई हो,
तुम सब हो एक आँचल के लाल,
तुम एक ही घर के भाई हो ।

न कश्मीर,न असम और,
न खालिस्तान हमारा है,
यह हिंदुस्तान हमारा है,
यह भारत देश हमारा है।

युगों-युगों,लहरा-लहरा कर,
गाए यह गीत तिरंगा प्यारा,
"सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दुस्तान हमारा,
हम बुलबुले हैं इसकी,ये गुलसितां हमारा "।

                                                                       ( जयश्री वर्मा )