Friday, April 13, 2012

पावन जल धार

                                                              
स्वच्छ, धवल,कंचन नील अंचल सी,
कल-कल,छल-छल नित हलचल सी,
इक नदी बह रही शांति से,चंचल सी,
सदा से रही जो जीव का संबल सी।
यह जग जननी है अनजानी सी,
और मृत्यु भी सत्य है पानी सी,
यह विश्वस्त सखी पहचानी सी,
हर मानव जीवन की कहानी सी ।

इसकी हर लहर दीप्त है तारा सी,
जीव के उत्थान पतन की कारा सी,
ये कभी तो बही अमृत की धारा सी,
और कभी ये उफन पड़ी अंगारा सी ।

तू कहीं पे कहलाई पावनी गंगा सी,
कहीं पे मचल पड़ी अलकनंदा सी,
ओ पावन स्वर्ग लोक की बाला सी,
है शत-शत प्रणाम जग माला सी।

                                                                        ( जयश्री वर्मा )