Wednesday, October 15, 2014

भविष्य नया ढूंढूंगी

लो मैंने तोड़ दिए अब,सब तुम्हारे ये बंधन ,
तुम्हारे दोषारोपण और तुमसे ये अनबन ,
अब और नहीं जागूंगी मैं और नहीं रोऊंगी,
काल की किताब के मैं पृष्ठ नए खोलूंगी।
अपनों का साथ छोड़,तुम्हारे संग मैं आई थी ,
आँखों में सपने और प्यार भी अथाह लाई थी ,
पर ये कैसा जीवन और कैसा ये संसार था ,
बाहों का सहारा नहीं,काँटों भरा यह हार था।

कैसा ये आँगन था और कैसा था ये घरबार ,
सब कुछ था यहाँ,न था अपनत्व और प्यार ,
आशीर्वाद की छाँव नहीं,था आँखों का अंगार ,
एक-एक कर बिखरा मेरा सपनों का संसार।

भले जग पुरुष प्रधान पर उतना ही हमारा है,
न हो कोई साथ पर संग में आत्मबल हमारा है,
बिन तुम्हारे सहारे,मैं भी कमजोर नहीं पड़ूँगी,
आक्षेप,कठिनाई कुछ भी हो सबसे ही लड़ूंगी।

माना इस संस्कृति में,जीवन दो हैं हर नारी के,
एक जन्म के संग मिला तो दूजा संग है शादी के,
हर हाल समझौता करना यही धर्म रीत सिखाई,
पूर्ण सामर्थ्य किया सब कुछ फिर भी बेवफ़ाई।

मैं भी हूँ मनुष्य और ये सुन्दर जग मेरा भी तो है,
जीवन माधुर्य सभी,मुझे भी महसूस तो करना है,
नहीं जाएगा जन्म निरर्थक ठानी है जब मन की,
मेरी भी जवाबदेही है आखिर मेरे इस जीवन की,

बस-बस-बस मुझे अब अति और नहीं सहना है ,
भावों के आवेश में मुझे अब और नहीं बहना है ,
बना लूंगी रास्ते और भविष्य अपना नया ढूंढूंगी ,
अस्तित्व नहीं खाऊँगी मैं अब कैसे भी जी लूंगी।


                                                                  ( जयश्री वर्मा )