Saturday, March 30, 2013

साँसों की डोर


साँसों की डोर पर इस जीवन के खेल,
उजियारे सुख अंधियारे दुखों का मेल।

न आना मर्ज़ी से और,न ही जाना मर्ज़ी से,
जीवन इक नाटक और पात्रों की खुदगर्ज़ी है।

माँ के आँचल का पालना,पित्र-छाया का संग,
भाई,बहन,सखा से,रूठने और मनाने का रंग।

यौवन की दहलीज़ पर,नए रंगों की पहचान,
आसमान छूने सरीखी,नए सपनों की उड़ान।

हांथों में बांधना वो,अपना सारा घर-संसार,
नए जीवनों का जन्म,सब सहेजने का सार।

फिर बिछड़ते बुजुर्गों के छूटने का असीम दर्द,
दुःख-सुख का भान,सांसारिक कर्मों का मर्म।

ये कैसा खेल है और ये है कैसी अजब कहानी,
ये कैसा आया मैं और है ये मेरी कैसी रवानी।

साँसों की डोर पर ये अजब  जीवन के खेल,
उजियारे सुख और अंधियारे दुखों का मेल।

                                                      ( जयश्री वर्मा )

Thursday, March 28, 2013

होली


इस होली पर्व के इंतज़ार में,
इस फागुनी सी हुई बयार में,
नव युवाओं के दिल भाव डोलें,
रह-रह के मन के राज़ खोलें।
जलती होलिका की आग में,
आपसी पुराने राग-द्वेष छोड़ें,
बिखरे से रिश्तों के तार जोड़ें,
सहृदय बन मीठे बोल बोलें।

हर छोटे,बड़े मित्रों का संग,
दहीबड़ा,पापड़,गुझिया,भंग,
आओ अबीर से मुट्ठी भर लें,
चलो टोली को संग कर लें।

पर इस पर्व में हुडदंग न हो,
प्यार,सम्मान बीच जंग न हो,
कालिख,कीचड़,पेंट की जगह,
बस आर्गेनिक अबीर,रंग हों।


रिश्तों की मर्यादा की आस,
तृप्त हो हर सम्मान की प्यास,
गाँव,शहर,वृन्दावन का रास,
ये होली सबके लिए है ख़ास।

बिखरे प्रकृति के हजार रंग,
सरसों,डहेलिया,गुलाब संग,
फागुन ऋतु के ये अजब ढंग,
होली में बसे हर मन उमंग।

                                              ( जयश्री वर्मा )






Saturday, March 23, 2013

न जाने कहाँ

तुम चले गए वहाँ, न जानूं मैं, कैसा,कौन सा सफर,
न जाने कैसी वो दुनिया,कैसे उसके शाम और सहर ?
बस कह दिया-चलता हूँ,कहा सुना सब माफ़ करना,
मैं हाथ पसारे ही रह गया,न कुछ कहना न सुनना। 


छूट गया मैं पीछे ही,तुम्हारी बहुत सी,यादों के सहारे,
रूठना-मनाना,वो अपनी बात रखना,वो बहाने सारे,
वो रंगों भरे दिन और वो अँधेरी,बहुत अपनों सी रातें,
तुम्हारे मेरे बीच,कही-अनकही,अनगिनत सी बातें।

पता नहीं क्यों ऐसा होता है,जब कभी किसी के लिए-
साँसें बेकल हों और मन कहे अब किसके लिए जियें,
कि छटपटाता हूँ मैं,अब तुम्हें कहीं से भी ढूंढ लाने को,
पर जानता हूँ कि,लोग जाते हैं वहां,कभी न आने को।

सत्य है जो भी आया यहाँ,वो इक न इक दिन जाता है,
इसीलिए तो शायद मनुष्य का,उस ईश्वर से नाता है,
कि अब भी सावन आएगा और बगिया भी महकेगी,
बेला और रात रानी भी तो अपने शबाब पे बहकेगी।

कि मेरी वीरान हो चुकी जिंदगी की कहानी भी चलेगी,
हर साल के मौसम में तुम्हारी रिक्तता के साथ ढलेगी,
इस शरीर के लिखे हुए,जीवन कर्म,तो करने ही होंगे,
बिन तुम्हारे,सूनी ही सही,रातों में ख्वाब भरने ही होंगे।
                                                                                            
                                                                                              ( जयश्री वर्मा )

Monday, March 18, 2013

रूमानी हो जाइये



होली के कई रंगों में,रंगों के छंद घोल,
छंदों संग बहक कर,होली गीत गाइए,
छोटा-बड़ा छोड़,अपनत्व बीज रोपकर,
हंसिये-हंसाइये,थोड़े रूमानी हो जाइये।


सुबह-सुबह उठ कर,रंग गुलाल भर कर,
साले घर जाइये,थोड़ा बेईमानी हो जाइये,
बिना किसी झिझक के,सलहज बुलाइये,
गाल गुलाल मल कर,पक्का रंग चढ़ाइए।


गर ससुराल पहुचें तो,जहाँ कहीं छुपी हों,
सालियों को ढूँढ-ढूँढ के,आँगन में लाइए,
पत्नी का डर छोड़,लाल-पीले तेवर भूल,
रंग खूब लगाइये,ससुराल में छा जाइये।


लस्सी में भंग घोल,भंग संग डोल-डोल,
फगुआ की तान पर,थिरक-थिरक गाइये,
गुझिया की मिठास में,राग द्वेष भूलकर,
बस खाइए-खिलाइये,मेहमानी हो जाइये।



मर्यादाओं का रहे ख्याल और रिश्तों का हो मान,
बच्चों का हो स्नेह और बुजुर्गों का रहे सम्मान,
रिश्ते नए बनाइये और साथ पुराने भी निभाइए,
दिल रहें साफ़,रंग हों हाथ और होली मनाइये।                                         

                                                                        ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, March 13, 2013

बापू मुझे आने दो


हंसने दो हँसाने दो,नए गीत सार्थक बनाने दो,
सृष्टि की देन हूँ मैं,मुझे जीवन गुनगुनाने दो,
नन्ही सी निर्दोष हूँ,पापा-मम्मी तो बुलाने दो,
बेटी को सहेजो,अपनी पहचान तो बन जाने दो,
बापू मुझे आने दो।

पापा कह बोलूंगी,मम्मी आँचल संग खेलूंगी,
उंगली पकड़ तुम्हारी मैं ठुमक-ठुमक डोलूँगी,
मुझको मत रोको,अरे मुझको भी तो जीने दो,
इस जीवन संगीत में,सुर बनके घुल जाने दो,
बापू मुझे आने दो।

बच्चों संग मैं भी तो स्कूल पढ़ने जाऊँगी,
बड़ी होकर तुम्हारा मैं सम्मान ही बढ़ाऊँगी,
टीचर,पायलट या नेता बन के दिखाऊँगी,
डाक्टर,इंजीनिअर या फिर सेना में जाने दो,
बापू मुझे आने दो।


न रहूंगी मैं तो,राखी त्यौहार का क्या होगा ?
बेटी न होगी तो, बहन शब्द भी कैसे होगा ?
तुम्हारे आँगन की चिड़िया बन गुनगुनाने दो,
रंग -बिरंगे कपड़ों में, मुझे सपने सजाने दो,
बापू मुझे आने दो।

बेटी न होगी तो सोचो,देहरी बारात कैसे आएगी ?
कन्यादान और हल्दी की तो रस्म ही टूट जायेगी,
गर बेटी न हुई तो,घर में कभी बहू भी न आएगी,
दादी-नानी के नाम का मतलब तो आगे बढ़ाने दो,
बापू मुझे आने दो।

बेटी बन जनमूँगी संग रौनक भी तो लाऊंगी,
मीठी-मीठी बातों से तुम्हारी थकान मिटाऊँगी,
कन्या भ्रूण हत्या,ये अपराध खुदसे न होने दो,
अपनी ही रचना को,स्वयं से ही खो न जाने दो,
बापू मुझे आने दो।

                                                     ( जयश्री वर्मा )



Monday, March 4, 2013

पुनर्जन्म

पत्ता-कांपा,टूटा,बिछड़ा,गिरा,उड़ चला कहीं डाल से दूर,
बोला-नियति में साथ अपना इतना ही,मैं हूँ अब मजबूर,
जा रहा हूँ वहां,जहाँ मुझे खुद भी नहीं मंजिल का पता,
न दिशा,न दशा,कुछ भी तो नहीं,तुमको सकता मैं बता।













क्या पता किसी पांव तले आकर,चरमरा के बिखर जाऊं,
क्या पता किसी जलधार के साथ,कहीं बहता चला जाऊं,
क्या पता किसी वनचर की क्षुधा,मिटाने के काम मैं आऊं,
क्या पता किसी पंछी के,नीड़ के लिए,सहेज लिया जाऊं।

क्या पता कि मिट्टी में मिल के मैं अपना वजूद ही मिटा दूँ,
क्या पता कि किसी नन्हे से जीव को मैं बहने से बचा लूँ,
क्या पता कि किसी दावानल में झुलस के भस्म हो जाऊं,
क्या पता किसी कवि के पन्ने की जिन्दा नज़्म बन जाऊँ।

नहीं-नहीं,मेरी याद में न उदास होना,न आंसू बहाना तुम,
मैं पुनर्जन्म को मानता हूँ,बस सच्चे दिल से बुलाना तुम,
कि मेरे इस तरह से जाने को मेरा इक सफ़र ही समझना, 
मेरी याद में,न बेकल होना,न रोना,न मन करना अनमना।

चारों तरफ जब सावन की रिमझिम फुहारें नेह बरसाएंगी,
और धरती पुराना त्याग अपने कलेवर को रंगीन बनाएगी,
कि यकीन मानो जब बहार आएगी फ़िज़ा में फैलेगा सुरूर,
तुम्हारी ही डाल पे कोपल बन के मैं खिलखिलाऊंगा जरूर।
     
                                                     ( जयश्री वर्मा )

Thursday, February 14, 2013

तू और मैं



तू और मैं,
क्या हैंऔर कौन हैं ?
कब से हैं ? कब तक हैं ?
प्रश्न से उत्तर तक या,
उत्तर के प्रश्न तक ?

आसमान से धरती,और ,
धरती के कण- कण में,
निर्जीव में या स्पंदन में,
सब में हैं और हर में हैं।

प्रश्न है कैसे ?
उत्तर है ऐसे -

तू सागर,मैं लहरें,
तू सूरज,मैं किरणें,
तू बादल,मैं पानी,
यही सृष्टि की कहानी।

तू पर्वत,मैं सरिता,
तू अंतर,मैं कविता,
तू लेख,मैं पाती,
तू दीपक,मैं बाती।

तू शिल्पी,मैं कल्पना,
तू रंग,मैं अल्पना,
तू जीवन,मैं हलचल,
हम संग-संग हर पल।

तू राग,मैं तान,
तू शब्द,मैं गान,
तू लता,मैं फूल,
तू जीवन,मैं भूल।

तू पारखी,मैं कंचन,
तू आँख,मैं अंजन,
तू हाथ,मैं कंगन,
तू रिश्ता,मैं बंधन।

तू बादल,मैं दामिनी,
तू काम,मैं कामिनी,
तू जीवन,मैं धड़कन,
तू अंजुली,मैं अर्पण।

तू नेत्र,मैं दृष्टि,
तू मनु,मैं सृष्टि,
तू भ्रमर,मैं शतदल,
तू प्रश्न और मैं हल।

                             ( जयश्री वर्मा )                     

Friday, February 8, 2013

इंतज़ार और सपने

               

माँ!
इंतज़ार ही, तुम्हारी किस्मत क्यों है ?
कभी पापा का इंतज़ार,
कभी स्कूल से हमारे लौटने का इंतज़ार,
क्यों मेरी एक झलक के लिए,
बैचेन रहती हो ?
मैं तुम्हारे आँचल की गुड़िया थी छोटी सी,
तुमने हर पल मुझे पाला रीझ-रीझ,
छोटी थी तब,
मेरे बड़े होने के सपने,
बड़ी हुई तब -
पराया बनाने के सपने,
पराया कर दिया तब,
मेरे सुखी होने के सपने,
अब जब मैं सुखी हूँ तब,
रक्षाबंधन पर,
मेरे मायके आने के सपने,
माँ तुम्हारा जीवन तो जैसे,
इंतज़ार और सपनों का पर्याय हो गया।
सारे सपने बस हमारे के लिए ?
कभी मेरे सुख के लिए सपने,
कभी भैया की पढ़ाई और नौकरी के सपने,
कभी पापा के प्रमोशन और स्वास्थ्य के सपने,
तुम्हें कभी तृप्त,कभी शांत नहीं देखा माँ,
तुम्हारी बढ़ रही झुर्रियों और,
घट रही आँखों की रौशनी के बाद भी,
इतना प्रेम,इतनी ममता,इतनी पूजा,
सिर्फ हमारे लिए ?
अब समझ रही हूँ सार,
माँ और माँ के सपनों का संसार,
अब,जब -
मैं भी बन चुकी हूँ माँ,
मेरी निगाह भी लगी रहती है,
घर की चौखट पर,
मैं भी रास्ता देखती रहती हूँ सबका,
मेरा जीवन भी बन गया है,
पर्याय -
इंतज़ार और सपनों का।

                                        ( जयश्री वर्मा )





Tuesday, February 5, 2013

रंग भरे सपने


मित्रों मेरी यह रचना " रंग भरे सपने " समाचार पत्र " अमर उजाला " की " रूपायन "में आज प्रकाशित हुई है, आप भी इसे पढ़ें !

तितली के पंखों सरीखे,रंग भरे सपने हों ,
नहीं किसी गैर के,बस सिर्फ मेरे अपने हों।

मेरे सपनों की नैया की पतवार मेरे हाथ हो,
मन चाहे कहीं चलूँ,इस पार या उस पार को,
कोई न रोके और अब कोई भी न टोके मुझे,
मेरी सोच की लहरों से भरा सागर अथाह हो।

कब कहाँ रुकोगे ?अब कहाँ को जाते हो ?
कोई भी न बूझे मुझसे,कोई न सवाल हो ,
बाँहों को फैलाकर,अंजुली भर-भर ले लूं,
बूँद-बूँद पीलूं मैं ऐसी खुशियाँ अपार हों।

मेरी ही दुनिया हो और मेरा ही सागर हो,
इन्द्रधनुष के रंगों से भरी मेरी गागर हो,
पंछी बन उड़ चलूँ मैं,यहाँ-वहां जहाँ-तहाँ,
मेरे संसार में प्यार की,गलियां हज़ार हों।

शब्दों को बांध-बांध,मैं प्रेम गीत बुन डालूं,
जोड़-जोड़ रिश्तों को,आपस में सिल डालूं,
इंसानी दुनिया में,जहाँ मानवी ही नाते हों,
नफ़रत की फसल न हो,सौहार्द की बातें हों।

तितली के पंखों सरीखे,रंग भरे सपने हों,
नहीं किसी गैर के,बस सिर्फ मेरे अपने हों।

                                                         (जयश्री वर्मा )


Friday, July 27, 2012

वर्तमान में

                                                                    

जो बीत गया सो वो जाने दो ,
जो आ रहा वो स्वीकार करो ,
ये वर्तमान जो अब हाथ में है,
तो इस वर्तमान से प्यार करो।
कुछ खट्टा सा है,कुछ मीठा सा है ,
कुछ तीखा सा है,कुछ फीका है ,
कुछ खुशियों सा,कुछ दुःख भरा,
कुछ सम्मुख है,तो कुछ छूट रहा।

अलग-अलग सा रूप है इसका,
और कुछ अलग-अलग सा रंग ,
अलग-अलग सा दर्शन है सबका,
और कुछ अलग-अलग सा ढंग ।

यूँ हार न मानो इस वर्तमान में,
तुम ऐसा वर्तमान को जी लो,
वर्तमान की सुस्वादु हाला यह,
इसके तुम हर स्वाद को पी लो।

कुदरत ने है सबको समान रचा,
मत तुम यूँ कोसो अपना भाग्य,
अपने ही हाथों से लिख डालो तुम,
खुद के इस जीवन-जन्म का राग।

कुछ ज्ञान भरोऔर कुछ प्रेम भरो,
कुछ तुम मेहनत से साकार करो ,
कुछ खुशी भरो,कुछ त्याग भरो,
कुछ अलग-अलग सा सार भरो ।

फिर देखो जीने का क्या मतलब,
जब खुद के हाथों से तकदीर बने,
वक्त झुके सम्मुख और तब इस,
सुन्दर जीवन की तस्वीर बने ।

तुम वर्तमान की रचना में डूबो,
और इसके ख्वाबों में उतराओ,
वर्तमान की जीवन सरिता संग,
बस तुम बहते ही चलते जाओ ।

                                                   ( जयश्री वर्मा )





Thursday, June 14, 2012

झंझावात

                                                      
अपने उलझे मन की गुत्थी सुलझाओ,
अब बस तुम इन पीड़ाओं से पार पाओ,
देखो तो सब कुछ नहीं है उलझा-उलझा,
इन उलझनों से तुम स्वयं को बचाओ।
मन की नकारात्मक सोच को तो छोड़ो,
सहजता की तरफ ये मन अपना मोड़ो,
उतार-चढ़ाव ही है इस जीवन का खेल,
जैसे धरती,पर्वत,नदी,सागर का मेल।

ये ज़िन्दगी सरल-सपाट नहीं होती है,
हर रात की एक उजली सुबह होती है,
इन झंझावातों से भी उबर ही जाओगे,
मान लोगे हार फिर कैसे जी पाओगे ?

इन विविधताओं से यूँ घबराते नहीं हैं,
बंद कमरे में दीवारों से टकराते नहीं हैं,
फिर से खुद को इक नई चाह से जोड़ो,
जीवन के प्रश्नों को नई राह पे मोड़ो।

फिर हर पेचीदा सवाल के हल भी मिलेंगे,
राहों में  तुम्हारे सफलता के फूल खिलेंगे,
पर पहले खुद से ही यूँ टकराना तो छोड़ो,
और जीवन को नित नए अर्थों से जोड़ो।

राहें खुलेंगी जब तो सब कुछ सरल बनेगा,
ये बीता बुरा वक्त तुम्हें फिर नहीं खलेगा,
लेकिन पहले खुद के मन को तो समझाओ,
अपनी निराशा की गुत्थी को तो सुलझाओ। 

                                                         (जयश्री  वर्मा )


Wednesday, April 25, 2012

बंदिश


                                                                
विवाह- 
जन्मों का बंधन,पर उसके कैसे हैं ये ढंग?
जीना था मुझको भी अपने सपनों के संग,
पंख क्यों काटे और क्यों छीन ली उड़ान,
मेरा भी हक था,क्यों छीना ये आसमान ।

ये धरती,ये अम्बर और झरनों की झर-झर,
ये चिड़ियों का चहकना ये हवा का बहकना,
ये पत्तों की सरसराहट ये मौसम की आहट,
फूलों का खिलना और दिन-रात का ढलना,
बच्चों की भाषा और उनके बढ़ने की आशा,

ये माँ-माँ पुकारना,ये बिखेरना,वो संवारना,
अपनों से मिलना,और रिश्तों को सिलना, 
ईश्वर ने साँसों से सबको बराबर नवाज़ा है,
तुम्हारा ही हक नहीं,ये उतना ही हमारा है,
फिर क्यों बंदिशें हैं? तब क्यों ये रंजिशें हैं?

क्यों प्रश्नों की कारा में,यूं छोड़ रहे हो मुझे,
जोड़ना था खुदसे,क्यों यूँ तोड़ रहे हो मुझे,
प्रश्नों के जाल में यूँ क्यों छोड़ रहे हो मुझे,
मुझको भी ये जीवन रस, घूँट-घूँट पीना है,  
मुझको भी तो तुम संग हर कदम जीना है। 
  
                                                                            (जयश्री वर्मा )

Tuesday, April 17, 2012

आस

                                                                      
संकल्प लिया तो,
जलने दो मशाल,
मशाल से मशाल को जगाने दो,
मनोरथ पूर्ण होने पर,
जब बुझाना पड़े तो,
छोड़ देना एक चिंगारी,
सुलगते हुए,
ताकि -
आह्वान किया था कभी,
इसका एहसास तो रहे,
और दुबारा उठ खड़े होने की,
आस तो रहे।
ऐ माली,
जब चुनने के लिए आओ,
डाली के फूलों को तो -
तो कहीं किसी डाल पर,
छोड़ देना एक फूल,
खिला हुआ,
ताकि -
बाँझ नहीं है पेड़,
उमंगों से हरा-भरा,
झूमता था कभी,
इसका एहसास तो रहे,
और दुबारा खिलने की,
आस तो रहे।
हे ईश्वर !
जब यह जीवन करना हो,
समाप्त तुम्हें मेरा,
तो छोड़ देना एक सांस,
मेरे अंदर,
ताकि -
मेरे जीवित रहने की,
मेरे इंतज़ार करने की,
प्यास तो रहे, 
जो भागता आ रहा है,
सिर्फ एक नज़र देखने को,
गिले-शिकवों को,
दूर कर सकने की,
आस तो रहे।
                                 
                                     ( जयश्री वर्मा ) 

Monday, April 16, 2012

जीवन सत्य

                                                                         
पतझर नहीं तो बोल रे मानुस,
बसंत का है क्या मोल ?
फिर जीवन ठूठ सा क्यों कहता ?
जीवन पुष्प सा तू बोल।
दुःख न हो तो बोल रे मानुस,
सुख का है क्या मोल,
फिर जीवन अश्क सा क्यों कहता ?
जीवन आस सा तू बोल।

दर्द न हो तो बोल रे मानुस,
हंसी का है क्या मोल,
फिर जीवन श्राप सा क्यों कहता ?
जीवन छंद सा तू बोल।

जरा नहीं तो बोल रे मानुस,
यौवन का है क्या मोल,
फिर जीवन बोझ सा क्यों कहता ?
यह जीवन उमंग सा तू बोल।

मृत्यु नहीं तो बोल रे मानुस,
जन्म का है क्या मोल,
फिर जीवन क्षणभंगुर क्यों कहता,
जीवन अमरत्व  सा तू बोल ।  
                                                           ( जयश्री वर्मा ) 

Sunday, April 15, 2012

सन्देश

मित्रों ! मेरी यह रचना मासिक पत्र " मृगपाल " ( सितम्बर 1995 अंक ) जो कि झाँसी से प्रकाशित है में प्रकाशित हुई है , आप भी इस रचना को पढ़ें !                                                                


चिंताएं जिससे डरती थीं,
मुस्कानें जिस पर मरतीं थीं,
अपना प्यारा भोला-भला वो,
बचपन कितना प्यारा था।

दादी की कहानी राजा- रानी,
परियों की नगरी में रहते थे,
अपनी दुनिया के शेर बने,
हम नहीं किसी की सहते थे।

तब नहीं थी कोई छूत-छात,
तब नहीं थी कोई जात-पात,
तब नहीं था कोई धर्म-वर्म,
तब नहीं था कोई प्रान्त-व्रांत।

बड़े हुए तो सब छिन गया,
वह अपनापन, वह प्रेम प्यार,
चार धर्म की बात तो छोड़ो,
हर धर्म में ही कई जात-पात।

एक ही धरती पर पैदा हो,
धरती के टुकड़ों को लड़ते हैं,
धरती माँ के लाल आज,
आपस में कटते मरते हैं।

भारत माँ के हम चार पुत्र,
हिन्दू ,मुस्लिम,सिख,ईसाई,
माँ को कितना दुःख होता होगा,
लड़ पड़ते जब भाई-भाई।

हम एक छत के चार खंभ,
जब बंट कर अलग हो जायेंगे,
गिर पड़ेगी टूटकर घर की छत,
तब क्या हासिल कर पायेंगे।

जागो-चेतो ऐ माँ के बेटों,
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा,
जो हुई हानि वो भूल जाओ,
छोड़ो आपसी लड़ाई झगड़ा।

तुम नहीं समझ रहे दुश्मन को,
वो बहुत चतुर है बहुत सबल,
अगर अभी नहीं संभले तुम तो,
फिर नहीं निकलेगा कोई हल।

तुम नहीं सिख, तुम नहीं हिन्दू ,
न मुस्लिम और न ईसाई हो,
तुम सब हो एक आँचल के लाल,
तुम एक ही घर के भाई हो ।

न कश्मीर,न असम और,
न खालिस्तान हमारा है,
यह हिंदुस्तान हमारा है,
यह भारत देश हमारा है।

युगों-युगों,लहरा-लहरा कर,
गाए यह गीत तिरंगा प्यारा,
"सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दुस्तान हमारा,
हम बुलबुले हैं इसकी,ये गुलसितां हमारा "।

                                                                       ( जयश्री वर्मा )
   
  
       

Saturday, April 14, 2012

बसंत ख़ुमार

                                                                  
हवा में खुशबुएँ हैं,
बसंत की आहट है,
फूलों पर रंग बिखरे,
भवरों की चाहत है,
तितलियाँ संवर रहीं, 
अंग रंग भर रहीं,
फूलों में छुपतीं-निकलतीं,
अठखेलियाँ कर रहीं,
खिलखिलाहट बगियों की,
चहचहाहट चिड़ियों की,
अजीब सी सरसराहट है ,
फूलों और कलियों की,
ऐसे में सब जोड़ों के,
खिले-खिले चेहरे हैं,
मन में उमंग लहर,
नयन भाव गहरे हैं,
बिन बोले ये कहते हैं,
बिन कहे सुनते हैं,
उठते हैं , झुकते हैं,
अफसाने गढ़ते है,
जन्मों के,सदियों के,
अटूट वादे ये करते हैं,
अजीब सा ख़ुमार है,
ये अलबेला प्यार है,
हवा में खुशबुएँ हैं,
बहका सारा संसार है।
दोष नहीं किसी का,
बसंत की बयार में,
ये बसंत का ख़ुमार है।
                                 
                                         ( जयश्री वर्मा )

        

Friday, April 13, 2012

पावन जल धार

                                                              
स्वच्छ, धवल,कंचन नील अंचल सी,
कल-कल,छल-छल नित हलचल सी,
इक नदी बह रही शांति से,चंचल सी,
सदा से रही जो जीव का संबल सी।
यह जग जननी है अनजानी सी,
और मृत्यु भी सत्य है पानी सी,
यह विश्वस्त सखी पहचानी सी,
हर मानव जीवन की कहानी सी ।

इसकी हर लहर दीप्त है तारा सी,
जीव के उत्थान पतन की कारा सी,
ये कभी तो बही अमृत की धारा सी,
और कभी ये उफन पड़ी अंगारा सी ।

तू कहीं पे कहलाई पावनी गंगा सी,
कहीं पे मचल पड़ी अलकनंदा सी,
ओ पावन स्वर्ग लोक की बाला सी,
है शत-शत प्रणाम जग माला सी।

                                                                        ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, April 11, 2012

प्रिय की बतियाँ

मित्रों ! मेरी यह रचना मासिक पत्र " मृगपाल " सितम्बर 1995 अंक में जो कि झाँसी से प्रकाशित है में प्रकाशित हुई।  आप भी इस रचना को पढ़ें।


हर वर्ष बदलते मौसम सी,
कई रूप रंग कई वर्णों सी,
चंचल चंदा की किरणों सी,
पुष्पों पे रंग बलिहारी सी,
                    
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

सावन की रिमझिम बूंदों सी,
पावन  गंगा की लहरों सी,
बसंत की पीत छटा जैसी,
हरियाली सी मनहारी सी,
                     
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

आह में अश्क सरीखी सी,
गान की झनक फुलझरी सी,
स्वप्नों में स्वप्न परी जैसी,
रंगों की प्रेम फुहारी सी,
                      
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

गोरी बहियों के कंगन सी,
बहके प्रेम की अनबन सी,
पावों में रुनझुन पायल सी,
कभी इठलाती बंजारन  सी,
                      
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

माथे पे सोहित बिंदिया सी,
नासिका की सुंदर नथिया सी,
कामिनी के तीखे कटाक्ष जैसी,
मनभावनी अँखियाँ कजरारी सी,
                   
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

कुछ खट्टी सी,कुछ मीठी सी,
कुछ तीखी सी,कुछ प्यारी सी,
कुछ गुनगुन सी,कुछ रुनझुन सी,
कुछ हलकी सी,कुछ भारी सी,
                 
मेरे प्रिय की बतियाँ री सखि,
हैं बहुत मधुर - मतवारी सी।

                                      ( जयश्री वर्मा ) 



 

Tuesday, April 10, 2012

चार पहर

                                                                       
सुबह के सूरज ने,
किरणों की बाहें फैलाईं,
और कहा- उठ 
नए दिन, नए जीवन का, 
अध्याय प्रारंभ कर, 
मैंने आंखें खोलीं,
नए उत्साह और किलकारियों के साथ,
इस अजीबोगरीब दुनिया का 
सब कुछ जान लेने को उत्सुक,
मैं उठा,नेत्रों में जिज्ञासा,
और हृदय में उत्साह  लिए,
इतने में दोपहर आई और बोली,
यौवन राहस्य जानना चाहते हो ?
यह कह उसने,छलकता हुआ -
मादकता का प्याला बढ़ाया,
मैंने पिया और बहकता चला गया,
अपनी ही रौ मैं बहता चला गया,
तभी संध्या ने ताना मारा-
सारे दिन भटके,
क्या हासिल किया ?
मैंने पाया-
मेरे तो हाथ खाली थे,
चेहरे पर भटकन की झुर्रियां,
शिथिल शरीर के साथ,
अन्यमनस्क सा सोचता रहा,
काश मैं भी किसी के लिए जिया होता,
आज कोई तो होता जो कहता-
मैं तेरा हूँ , तू मेरा है,
कितनी नीरव और एकाकी है,
यह वीरानी संध्या,
मैंने चाहा - सचेत करना,
आने वाली पीढ़ी को -
की जिओ पर सिर्फ अपने लिए ही नहीं-
औरों के लिए भी सीखो-त्याग,
औरों  के लिए भी सीखो-जीना,
मगर-
उम्र धोखा दे गई,
रात्रि आई ,बोली-
चल मेरे साथ,
तेरा अध्याय समाप्त हुआ ।
                                                     
                                       ( जयश्री वर्मा )   


Sunday, April 8, 2012

सहजता

                                                                        
इस अहम् की उलझी सी गांठें तो खोलो,
आखिर अब तुम दो बोल तो मीठे बोलो,
बात मानो,सारी कड़वाहट धुल जायेगी,
निज भावों में अपनेपन के शब्द तो घोलो।

जीवन तो बस कुछ ही दिनों का मेला है,
मिलते-बिछड़ते हुए रिश्तों का रेला है,
क्रोध,सुख,आस,अपनत्व,पीड़ा,अहसास ,
इच्छाओं की कभी न बुझने वाली प्यास।

जग में जो आया,कुछ खोया- कुछ पाया,
है जन्मा गर कोई, मृत्यु कौन रोक पाया ?
पर देखा जाए सत्य, तो यही तो संसार है,
जन्म से पूर्व और मृत्यु बाद का क्या सार है ?

यहीं पे बने रिश्ते और यहीं मिला प्यार है,
यहीं परिजनों संग बांटा जीवन का भार है,
गर नहीं होते ये सब तो तुम कैसे जी पाते ?
दिन-दिन रोते और रातों-रातों छटपटाते।

बात मान लो मेरी,वरना तुम टूट जाओगे,
चुप्पी तो तोड़ो,अन्यथा कठोर कहलाओगे, 
मुस्कुराहट से अपनी,दिल के घाव धो लो,
निज भावों में अपनेपन के शब्द तो घोलो ।

अपने मन के अहम् की उलझन तो खोलो,
के हठ छोड़ो और दो बोल तो मीठे बोलो,
बात मानो ये सारी कड़वाहट धुल जायेगी,
निज भावों में अपनेपन के शब्द तो घोलो।

                                   
                                              - जयश्री वर्मा   
                                                      

Saturday, April 7, 2012

कर्तव्यबोध

तुम विराट सत्ता के स्वामी,
मैं जल की क्षीण रेख सा हूँ,
तुम शिला सरीखे आ जाओ,
मुझको तो राह बनानी है।


आज कैद मुठ्ठी का अंकुर हूँ,
तुम कितना गहरा गाड़ोगे,
कल धरा फोड़ मुस्काऊंगा,
मुझको तो राह बनानी है।


तम साम्राज्य के शासक तुम,
गहन अन्धकार बन छा जाओ,
मैं दीपक की लौ बन जाऊँगा,
मुझको तो राह बनानी है।



छोटों को क्या कुचलोगे तुम ,
तूफानों से कब उखड़ा है कुश,
झुककर के बच जाऊँगा मैं,
मुझको तो राह बनानी है।


तुम सामंत वर्ग तुम पूज्य वर्ग,
तुम जकड़े समाज के बंधन में,
डर होगा तुम्हें प्रतिष्ठा का,
मुझको तो राह बनानी है।
                              
                                      जयश्री वर्मा 

Friday, April 6, 2012

क्षणिकाएँ

                                                          
                                                                     धर्म 


 


ईश्वर की कल्पना,
बंद आँखों का सपना,
मन की दुर्बलता,
आत्मविश्वाश का हनन,
और,
स्वतंत्रता का अपरहरण,
करता है- धर्म । 
                        (जयश्री वर्मा )

                                                                    





   
 अफसर 


खाने- पीने  से लेकर -
नोटों से खरीदी जा सकने वाली,
हर चीज़ को,
हज़म कर सकने,
की क्षमता वाला,
अच्छे हाजमे का व्यक्ति ।
                                (जयश्री वर्मा )
                              

Thursday, April 5, 2012

प्रेम रहस्य

                                                                 

तुम संग ओ सांवरे,
नयन मिले बावरे,
 
झुके उठे , उठे झुके,
लजाते से रुके - रुके,

अंखियों के अंखियों से-
कई प्रश्न हुए, हल हुए,

न जाने क्या बात हुई,
और खुल गए भेद कई ।
                       

                   (जयश्री वर्मा)

Wednesday, April 4, 2012

चुनौती

मित्रों ! मेरी यह रचना पूर्वोत्तर रेलवे की पत्रिका " रेल - रश्मि "में अप्रैल 1987 में प्रकाशित हुई , उस समय पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक श्री योगेन्द्र बिहारी लाल माथुर थे। आप भी रचना को पढ़ें।                                                                      

तुम मुझे समाप्त नहीं कर सकोगे काल,
मैं तुम्हें अमर बन कर दिखलाऊंगा,
और तुम ?
तुम हाथ मलते रह जाओगे।
मैं बहार नहीं,
कि तुम मुझे खिज़ा में बदल दो,
मै बहारों का वो गीत हूँ,
जो हर वर्ष गाया जायेगा -
पीढ़ी दर पीढ़ी द्वारा,
और पीढ़ियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं।
मैं नदी की कल-कल नहीं,
कि तुम मुझे शांत कर दोगे -सुखाकर,
मैं वर्षा की रिमझिम हूँ,
हर आने वाले मौसम का संगीत हूँ,
जो रोके रुक नहीं सकता।
मैं पत्थर की ऋचा नहीं,
कि तुम मुझे मिटा दोगे खण्ड - खण्ड करके,     
मैं पर्वतों की अडिगता हूँ,
और अडिगता स्वयं समर्थ है।
मैं देवता नहीं,
कि जिसे अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए,
भिन्न- भिन्न धर्मों में,
भिन्न - भिन्न नामों से जन्म लेना पड़ता है,
मैं मानव हूँ काल,
मैं वो मानव हूँ,
जिसके अंतर में-
भावनाओं से ओत -प्रोत हृदय है,
और भावनाएं सिर्फ जन्म लेती हैं ,
मिटती नहीं।
तुम मुझसे हार जाओगे काल,
तुम मुझे समाप्त नहीं कर सकोगे ।

                                                              ( जयश्री वर्मा )   

Tuesday, April 3, 2012

बचपन

बचपन 

जिससे कि चिंताएं डरती हैं,
मुस्कानें जिसपर मरती हैं,
सभी जिसको अपने प्यारे,
सुख सपने हैं जिसके न्यारे,
हठ के आगे दुनिया झुकती,
चिंता तो दो कोस दूर रूकती,
और क्रोध सदा हारा जिससे,
मीठी बातें और मीठे किस्से,
वन पुष्प सदृश्य खिला-खिला,
मन जिसको साफ़ पवित्र मिला,
बाधाएं न रोक सकीं जिसको,
स्वच्छंद हवा का इक झोंका है,
सबका बचपन,प्यारा होता है,
ये सबसे न्यारा होता होता है।
                           
              ( जयश्री वर्मा )

Monday, April 2, 2012

याद पन्छी

इस पार से उस पार ,
उस पार से इस पार को ,
मंथर गति से ,
आती जाती नौकाओं की तरह ,
मिनट ,घंटे ,दिन ,सप्ताह ,
महीने और फिर साल ,
आते और जाते रहेंगे ,
लकिन हमारा पुराना ,
साथ -साथ बीता हुआ कल,
मधुर कल ,
पुनः लौट कर नहीं आएगा ,
ऐसे ही जैसे -
आज का दिन ,
हम एक दूसरे के पास हैं ,
हम चाहते हैं -
कल न आए ,
जो हमें एक दूसरे से अलग कर दे ,
हम चाहते हैं -
ये पल यहीं थम जाए ,
वक्त आगे न बढ़ पाए ,
ये लम्हा ठहर जाए ,
पर असंभव !
समय को कौन रोक पाया ,
रेत कौन भींच पाया,
लकिन एक चीज़ संभव है ,
मेरे वश में है ,
तुम्हारा याद पंछी,
जो सदा मेरे  पास रहेगा ,
तुम्हारे साथ का अहसास रहेगा
जिसे मैंने,
अपने मन पिंजरे में ,
कैद कर लिया है |
                                                     (जयश्री वर्मा)                                                   

Sunday, April 1, 2012

संगीत सुनाती जाती-नदी

                                                                                                                                                        
पर्वत विशाल श्रृंखलाओं से अविरल ,
ऊबड़-खाबड़ राहों में मचल-मचल ,
अगणित असहज रास्ते सुलझाती ,
लचीले विचार ले ठहरती बलखाती ,
कितने ही चीन्हे-अनचीन्हे मोड़ों को ,
कितनी ही घाटियों,कठोर से रोड़ों को ,
अपने नाम बनाती और बहती जाती  - नदी। 


रणचण्डी बन,चट्टानों से टकराती ,
हर लहर जीत का इतिहास बनाती ,
इस उहापोह के संग वीरानों के रंग ,
क़दमों तले,लिखती जीवन की जंग ,
अपनी ही धुन में,मगन हो ढलकती ,
नव जीवन,नव उत्साह सी छलकती ,
कल-कल मधुर संगीत सुनाती जाती - नदी।


नव जीवन रचती सभ्यताएं है गढ़ती ,
ये भूत भविष्य वर्तमान के संग बढ़ती ,
जल,थल,हर जीव-जगत स्पंदन देती ,
मानव-मुक्त आत्माओं को तर्पण देती ,
कुछ उलझा नहीं इसका जीवन है सादा ,
किया था सागर से मिलने का जो वादा ,
उसे निभाने को ही निरंतर बहती जाती - नदी। 
                                                             
                                               ( जयश्री वर्मा )