Wednesday, December 5, 2018

बंधना पड़ता है

जैसे कि हर राह कहीं पे जाके ठहरती है ,
जहाँ कहीं भी उसको पूर्ण विराम मिले ,
चाहे हो विकट लालसा जीवन जीने की ,
पर आखिर में कभी तो मरना पड़ता है ।

हर दिल ही सच्चा प्रेम ढूंढता रहता है ,
जहाँ पे उसको अन्तर्मन का मर्म मिले ,
चाहे हो लाख चाहत स्वच्छंद प्रेम की ,
आखिर में कहीं पे तो बंधना पड़ता है ।

ये चंचल नदियाँ यूँ बलखाती,लहरातीं ,
पूरी धरती बाहों में समेटे उन्मुक्त बहें ,
चाहे लाख ललक हो निर्बाध भ्रमण की ,
पर आखिर सागर में मिलना पड़ता है ।

भले कहीं भी विचरें ये सारे मुक्त मेघ ,
मन में इक स्वाति बूँद का अहम् लिए ,
पर ये भटकन जब कभी भी बोझ बने ,
तब आखिर में तो बरसना ही पड़ता है ।

दिल में मृगमरीचिका सा ख्वाब लिए ,
तुम यूँ यहाँ-वहाँ जो बहकते फिरते हो ,
अब आ जाओ के सहारा बन जाऊं मैं ,
तुम्हारे प्रश्नों का सार-सम्पूर्ण लिए ।

                                      - जयश्री वर्मा

1 comment:

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