Tuesday, November 15, 2016

प्रिय तुमको क्या कहूँ ?

भृकुटी तनी धनुष सी,चितवन यों जस तीर की धार,
हार न मानें,घायल करें तंज़ करते से ये शब्द प्रहार,
हृदय में खंजर सी उतरे,ये तीखी सी मादक मुसकान,
तलवार सा घायल करें,डिगा दे ये हौसलों की मचान,
जिसपर बरस पड़ें ले ये सब,समझो उसका बंटाधार,
प्रिय सच कहूं तुम तो हो,पूरा का पूरा ही शस्त्रागार!

चन्द्रमा सा मुखमंडल कहूँ,या सूरज लाली से कपोल,
तारों सी चमचम चमकती तुम्हारी चुनरी ये अनमोल,
मेरे मंगल,राहु-केतु,शनि सब तुम ही तो प्रिय साधो,
तुम मेरी देवी हो,भले ही पुकारो,मुझे मिटटी का माधो,
मेरे सुबह-साँझ की झाड़-फूंक का,तुम ही कर्मकांड हो,
मेरे घर के गृह-नक्षत्र का,प्रिय तुम पूरा ब्रह्माण्ड हो!

कमल सरीखे नयन,गुलाब पंखुड़ी से,ये नाज़ुक होंठ,
घुँघराली केश वल्लरी,मोगरा सजा,कुशलता से गोंठ,
हठपूर्वक मंगाया जो मुझसे,वो नवलखा गले में साजे,
मेरे अँगना में तुम्हारी पायल,रुन-झुन,रुन-झुन बाजे,
पावों की लाली ऐसी,ज्यों फूलों की सुर्खी ही रचा डाली,
तुम्हें क्या कहूँ प्रिय तुम तो हो,पूरी ही बगिया निराली!

धन्य हुआ हूँ पाकर तुमको,ये अहसास कराया मुझको,
तुम्हारा हुक्म पत्थर की लकीर,पूरा करना हम सबको,
तुमने तो इशारों पे उंगली के,है मुझे सारी उम्र नचाया,
फिर भी समाज में तुम संग रहके,सभ्य मैं हूँ कहलाया,
तारीफ़ सुन अपनी न थको तुम,ये है लीला अपरम्पार,
फिर भी प्रिये अति प्रिय हो मुझे,तुमसे मेरा घर-संसार!

                                                                                                ( जयश्री वर्मा )


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