Monday, July 14, 2014

जानती हूँ

तुम नहीं समझोगे,दिल की इस लगन को मेरी ,
रह-रह तुम पर रीझना,और मन अगन को मेरी,
जब याद में सुलगना ही,सार्थक सा लगने लगे ,
हर पल कोई इच्छा जगे,बुझे और फिर से जगे।

प्रिय यूँ लगे जैसे कि,मैं बन गई हूँ सूरजमुखी ,
तुम सूरज सरीखे,जिसे निहार होती हूँ मैं सुखी ,
इक अजीब से,अव्यक्त अहसास संग जीती हूँ ,
तुम्हें देख तुम्हारी छवि को,मैं बूँद-बूँद पीती हूँ।

प्रिय जैसे कि मैं हो गई हूँ,इक बेचैन नदिया सी ,
तुम सागर सरीखे और,मैं मिलने को अधीर सी ,
भागती,दौड़ती,मचलती,छलकती सी मैं आती हूँ ,
तुम संग एकाकार हो,जीवन ये सम्पूर्ण पाती हूँ।

प्रिय जैसे तुम बन गए हो,चाँद इस आसमां के ,
तुम्हें चकोर बन निहारना,जैसे सुख सारे जहां के ,
हर रात के इंतज़ार में मैं,पल-छिन यूँ बिताती हूँ ,
तुम्हारी एक झलक की चाह में,पलकें बिछाती हूँ।

प्रिय जैसे कि तुम,स्वाति बूँद बन गए हो मेरे लिए ,
मन भाव सीपों में इंतज़ार,बस इंतज़ार है तेरे लिए ,
जानती हूँ तुम संग सार्थक होगा,जीवन-जनम मेरा ,
जानती हूँ,तुम संग सम्पूर्ण होगा,मेरा जीवन बसेरा।

                                                                                          ( जयश्री वर्मा )







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