Monday, March 3, 2014

अब आ जाओ

तुम आओ कि तुम बिन ,
मेरे सभी गाँव वीराने हैं।


सूनी हो गईं गलियां सारी ,
अँखियाँ सूने पनघट सी हैं ,
सूनी गगरी सा मन मेरा ,
मन भाव सभी अब हारे हैं।

तुम आओ कि तुम बिन ,
मेरे सभी गाँव वीराने हैं।

मूक हो गई हंसी अब मेरी ,
सहमे होंठों के बोल सभी ,
खुशियां रूठ चुकीं  मुझसे ,
गम के सब ओर खजाने हैं,

तुम आओ कि तुम बिन ,
मेरे सभी गाँव वीराने हैं।

स्वप्न हुआ बसंत का खिलना ,
पतझड़ का सा साम्राज्य हुआ ,
ये मन-तरु सूख चूका है मेरा ,
अब फिर से पुष्प खिलाने हैं ,

तुम आओ कि तुम बिन ,
मेरे सभी गाँव वीराने हैं।

हरी भरी थी डाल कभी यह ,
पंछी भी अक्सर आ जाते थे ,
गाये थे बुलबुल ने जो गीत ,
वो ही गीत मुझे दोहराने हैं ,

तुम आओ कि तुम बिन ,
मेरे सभी गाँव वीराने हैं।

मैं अभिशप्त दुःखी सीता सी ,
तुम कभी तो मिलने आओगे ,
जो भूल गए हो मनमीत मेरे ,
वो ही किस्से तुम्हें सुनाने हैं ,

अब आ जाओ कि तुम बिन ,
मेरे सभी गाँव वीराने हैं।

                                       ( जयश्री वर्मा )