Monday, June 3, 2013

क्यों भला

जिस तरह से चले गए हो तुम,ऐसे भी कोई जाता है भला ?
सावन के बीच भी कोई,क्या वीराने के गीत गाता है भला ?

अभी बस एक ही साल तो हुआ था,मुझे तुमसे यूँ जुड़े हुए,
पूरे दिखा भी नहीं पाई,कुछ दिल के पन्ने रह गए मुड़े हुए।

रूठ कर गए हो वहाँ जहाँ से मैं तुम्हें,बुलाकर मना भी न सकूं,
घायल यादों को समेट-समेट , तुम्हारी तस्वीर बना न सकूं।

कि-कंगन,चूड़ी,बिछिया,टीका, अब सब हराम हैं मेरे लिए,
अब जब तुम ही नहीं तो, मैं श्रृंगार करूँ भी तो किसके लिए।

मेरे पास माँ पुकारने वाली,तुम्हारी कोई निशानी भी तो नहीं,
कि जिसे तुम्हारा नाम ले,गले से चिपटा लूं,रोलूं कभी -कभी।

अभी तो मैं-न रूठ,न झगड़,न कोई हठ, कर पाई थी तुमसे,
क्यों किस्मत ही रूठ गई,न जाने कब क्या भूल हुई मुझसे।

देखो न अकेलेपन में यूँ ही,कितनी स्वार्थी हुई जा रही हूँ मैं,
अपना ही दुःख सोच-सोच बस, अपनी ही कहे जा रही हूँ मैं।

जानती हूँ अचेतन होते -होते भी,तुमने मेरा नाम पुकारा होगा,
बेबस निगाहों को तुम्हारी,भीड़ में मेरे दिखने का सहारा होगा।

                                                                  ( जयश्री वर्मा )






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