Wednesday, May 8, 2013

कितने ही सरबजीत

ऐसे कितने ही सरबजीत,कई विदेशी जेलों में फंसे हैं,
आँखों में झाइयाँ,शरीर है ढांचा,पर बेड़ियों में कसे हैं।

ये गालियों और लातों की रोटी से,मन का पेट भरते हैं ,
कल की आशाएं संजो ये,रोज तिल-तिल के मरते हैं।

ये तो रात-रात भर दर्द,दहशत भरी,नींद जागा करते हैं ,
और दिन-दिन भर जान-रहम की,भीख माँगा करते हैं।

हर त्यौहार सपनों में ही ये,अपनों के संग-साथ जीते हैं ,
उनकेघर भी होली,क्रिसमस,बैसाखी,ईद कहाँ मनते हैं।

यहाँ भी इंतज़ार में,उनके अपनों की आँख बिछी रहती है,
पत्नियाँ भी आस में,करवाचौथ कर मांग भरा करती हैं।

कितने बच्चों को अपने पिता की स्मृति ही नहीं कुछ भी,
दया या तिरस्कार नियति है,यही उनका जीवन सत्य भी।


बस वो सुनी स्मृतियों और फोटो संग यूँ ही पल जाते हैं ,
हालात के संग वे सब,खुद-ब-खुद बस यूँ ही ढल जाते हैं।

ये बच्चे मन की उम्मीदों को,मन में ही खत्म कर लेते हैं,
नहीं है पिता का साया,जान के कोई सवाल नहीं करते हैं।

ऐसे कितने ही सरबजीत,न जाने,कितने देशों में फंसते हैं,
जो शरीर के साथ हैं,पर दिल उनके अपने देशों में बसते हैं।

                                                                      ( जयश्री वर्मा )