Friday, May 3, 2013

परिश्रमी सूरज

रात्रि माँ की गोद से उछला,प्यारा,सुबह का सूरज धीरे-धीरे,
आँखें मलता, अंगड़ाई संग,गुनगुनी मुस्कुराहट धीरे-धीरे।

चिड़ियों को उठाया,पशुओं को बताया,बच्चों को भी साथ जगाया,
नए विकल्प ,नयी कोशिशों और नयी तारीख का पाठ पढ़ाया।

मंदिर,मस्जिद,गिरजा,गुरुद्वारे में,श्रद्धा की इक ज्योति जलाई,
नए दिन के आगमन के साथ,नया उत्साह, नई उम्मीद जगाई।

दिन जब चढ़ा जुझारू बन कर,प्रचण्ड हुआ और आग बरसाई,
समुद्र की भाप बादलों में बदली और पहाड़ों की बर्फ पिघलाई।

अनाज सहेजा ,वस्त्र सुखाए,खेतों में कृषक के हल चलवाए,
हलचल फैलाकर धरती पर,कितने ही बिगड़े काम बनाए।

पेड़ों की पत्ती पर चमका,प्रकृति,फल,फूलों की छठा बढ़ाई,
कुछ जीवन दिए धरती को और कुछ की समाप्त कथा करवाई।

शाम को थक कर चूर हो गया,विश्राम को अब मजबूर हो गया,
निस्तेज बना थका-थका सा,चेहरा भी उसका म्लान हो गया।

रात्रि माँ ने आँचल फैलाया,मुस्कुरा कर अपने पास बुलाया,
फिर अपनी गोदी में ले उसको ,थपकी दे मीठी नींद सुलाया। 
                                                                       
                                                     ( जयश्री वर्मा )