Wednesday, May 15, 2013

भला लगता है



सावन की हरियाली बीच,
और फूलों भरी क्यारी बीच,
मतवाले भ्रमरों की गुन-गुन संग,
प्यारा सा प्यार का इज़हार भला लगता है।

घनघोर घटाओं बीच,
रिमझिम फुहारों संग जब,
भीग रहा तन और भीग रहा मन हो,
बूंदों की टप-टप का मधुर गान भला लगता है।

लम्बी डगर और हाथों में हाथ हो,
बिन बोले कुछ बस निःशब्द बात हो,
सपनों के पालने में झूल रहे जब दोनों हों,
तब ये धरती,ये आसमान,ये संसार भला लगता है।

भविष्य के सपने हो,
ख्वाब पलकों में अपने हों,
आपसी प्यार और विश्वास का साथ हो
तब अपने पे हो चला वो,गुमान भला लगता है।

                                                                                  ( जयश्री वर्मा )

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