Monday, May 13, 2013

बस थोड़ा सा

चाय के प्याले में चाहिए थोड़ी सा शक्कर,
बहुत सीधे रास्तों में बस थोड़ा सा चक्कर।

दाल की कटोरी में बस हो थोड़ा सा नमक,
कपड़ों को चाहिए बस थोड़ी सी ही दमक।

हरी-भरी सी डाली में थोड़ा सा फूलों का रंग,
बहुत सारे प्यार बीच बस थोड़ी सी हो जंग।

पति को चाहिए पत्नी की थोड़ी मीठी मुस्कान,
पत्नी को चाहिए थोड़ा सा मान और सम्मान।

शिष्य को चाहिए ज्ञानवान का थोड़ा सा ज्ञान,
योगी को बस चाहिए थोड़ा एकांत और ध्यान।

सभ्य,शांत,चित्त बीच हो बस थोड़ी सी शरारत।
पर्यटन के बीच हो थोड़ी चुहलबाजी की हरारत।


चहुँ ऒर कोलाहल बीच चाहिए थोड़ी सी शांति,
विश्वास ही विश्वास के बीच थोड़ी सी ही भ्रान्ति।

जेठ की लपट में बस थोड़ी सी छाँव और ठंडा पानी,
सर्दियों में थोड़ी धूप संग कुछ चटपटी सी कहानी।

जन्म के समय हो थोड़ा सा माँ के आँचल का दूध,
मृत्यु के समय पे झाड़ दें थोड़ी कड़वाहट की धूल।

लालसाओं को पूरा करने को हो पास थोड़ा सा पैसा,
घर हो इक अपना,थोड़ा छोटा ही सही,ऐसा या वैसा।

रूठे हुओं को चाहिए केवल बस थोड़ा सा मनाना ,
बिगड़ो को चाहिए बस थोड़ा सा बचने को बहाना।

क्रोध में धारण रहे सदा थोड़ा सा आपा और विवेक,
जीवन में कर जाएँ औरों के लिए काम थोड़े से नेक।

देश को अपने चाहिए बस थोड़ा एकता और प्यार,
सभी धर्मों को चाहिए थोड़ा अपनापन और सौहार्द।

किसी भी सामान की तौल में मिले थोड़ा सा ज्यादा,
किसी भी मोल-भाव में हो थोड़ा सा पैसों का फायदा।

प्रिय की बाँकी चितवन में बस धार हो थोड़ी सी और,
जीवन में खिलते रंगों पे फिर कीजिये जरा सा गौर।

इस वक्त जो आपका ध्यान था मेरे लफ़्ज़ों की ओर,
कविता के बाद हो जाए थोड़ा सा तालियों का शोर।

                                                 ( जयश्री वर्मा )