Wednesday, April 24, 2013

संरक्षण संकल्प

ब्रम्हाण्ड शून्य में धरती माँ,तुमने मानव को जन्म दिया,
अपनी हरियाली के आँचल में,जनजीवन स्पंदित किया।


जल, फल, फूल से पोषित कर,पाला बड़े ही प्यार से,
जीविका दी,सहेजा स्वास्थ्य,औषधियों के भण्डार से।

नीला ग्रह है नाम तुम्हारा,जलराशि से परिपूर्ण हो तुम,
गर तुम न होतीं, हम न होते,इसी लिए धरणी हो तुम।

पर हम कितने स्वार्थी हैं माँ देखो,तुमको बंजर बना रहे,
न जल बचाया,न पर्यावरण सहेजा,खुद की मृत्यु बुला रहे।

वृक्ष काट,तुझे निर्वसन कर रहे,अपने खजाने जुटा रहे,
खुद के सुख साधन के लालच में,तुमको बंजर बना रहे।

गर तुम न होगी,स्पंदन न होगा,अस्तित्व न होगा हमारा,
जल,वृक्ष,पर्यावरण संरक्षित हो,अब यह संकल्प है सहारा।

माँ का ऋण चुकेगा तभी,जब हर मनुष्य एक वृक्ष लगाए,
धरती माँ के सूने आँचल में,फिर से हरियाली भर जाए।

हरियाली हो,नदियाँ बल खाएं,आक्सीजन की भरमार हो,
चिड़ियाँ चहकें,पर्यावरण सही हो,जीवन उल्लास अपार हो।

                                                                                                     ( जयश्री वर्मा )


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