Friday, February 8, 2013

इंतज़ार और सपने

               

माँ!
इंतज़ार ही, तुम्हारी किस्मत क्यों है ?
कभी पापा का इंतज़ार,
कभी स्कूल से हमारे लौटने का इंतज़ार,
क्यों मेरी एक झलक के लिए,
बैचेन रहती हो ?
मैं तुम्हारे आँचल की गुड़िया थी छोटी सी,
तुमने हर पल मुझे पाला रीझ-रीझ,
छोटी थी तब,
मेरे बड़े होने के सपने,
बड़ी हुई तब -
पराया बनाने के सपने,
पराया कर दिया तब,
मेरे सुखी होने के सपने,
अब जब मैं सुखी हूँ तब,
रक्षाबंधन पर,
मेरे मायके आने के सपने,
माँ तुम्हारा जीवन तो जैसे,
इंतज़ार और सपनों का पर्याय हो गया।
सारे सपने बस हमारे के लिए ?
कभी मेरे सुख के लिए सपने,
कभी भैया की पढ़ाई और नौकरी के सपने,
कभी पापा के प्रमोशन और स्वास्थ्य के सपने,
तुम्हें कभी तृप्त,कभी शांत नहीं देखा माँ,
तुम्हारी बढ़ रही झुर्रियों और,
घट रही आँखों की रौशनी के बाद भी,
इतना प्रेम,इतनी ममता,इतनी पूजा,
सिर्फ हमारे लिए ?
अब समझ रही हूँ सार,
माँ और माँ के सपनों का संसार,
अब,जब -
मैं भी बन चुकी हूँ माँ,
मेरी निगाह भी लगी रहती है,
घर की चौखट पर,
मैं भी रास्ता देखती रहती हूँ सबका,
मेरा जीवन भी बन गया है,
पर्याय -
इंतज़ार और सपनों का।

                                        ( जयश्री वर्मा )