Monday, December 16, 2013

ये जो भीड़ है

 ये जो भीड़ है -
 न जाने कहाँ से आती है और न जाने कहाँ को जाती है,
सुबह होने के साथ ही सड़कों,चौराहों पे नज़र आती है।

कुछ आदमी,कुछ औरत और कुछ बच्चों की शक्ल में,
कभी ढूँढ रही छाँव है तो कभी दौड़ रही है जलती धूप में।

दो,तीन,चार पहिया वाहनों पर,चढ़ के कहीं को जाती है,
और जल्दी पहुँचने की होड़ में,बस व्याकुलता फैलाती है।

इसकी बहुत सारी आँखों में,घूरता अनजानापन काबिज़ है,
हर कहीं नज़र आती है और ये शोरगुल भी बहुत मचाती है।

भीड़ के रुकते,चलते पैर और सफेद,काले बालों वाले मस्तक, 
कभी हाथों में कैंडिल,कभी बैनर,कभी सार्थक कभी निरर्थक।

ये खूब चीखती चिल्लाती है और अपना विरोध दर्ज कराती है,
कभी हक़ कह,कभी विरोध में,नारेबाजी कर मांगें मनवाती है।

ये झूठी ही हंसी हंसती है-जलसों,हास्य सम्मेलनों,पार्कों में,
होली,दीवाली और रावण के संहार जैसे कई अन्य त्योहारों में।

ये शांत नज़र आती है मंदिर,मस्जिद,चर्च और गुरुद्वारों में,
सिनेमा घरों के अंदर और कुछ नामी बाबाओं के दरबारों में।

ये रोती है दैवीय आपदाओं में,आंसूगैस और पुलिसिया मार पर,
किसी बड़े नेता,अभिनेता की शवयात्रा हो,या शमशान घाट पर।

ये पसीना पोंछती,भीगती,ठिठुरती,मौसमों को कोसती रहती है,
लेकिन घरों के दरवाजों से बाहर ही ये बखूबी फलती फूलती है।   

शायद ये अँधेरे से डरती है इसीलिए रात में वज़ूद खत्म करती है,
और जहां कहीं से भी आई थी,ये चुपचाप वहीं प्रस्थान करती है।
                                                         
                                                                     ( जयश्री वर्मा )

  
  



Monday, December 9, 2013

अंजाना एहसास

जब उस दिन गहरे नयनों की
मैं कुछ भाषा पहचान सकी
बस,तबसे इस जीवन दुःख की
मैं कुछ सार्थकता जान सकी । 

बरबस बरस पड़े नयन घन
उसके जाने के बाद आज -
उसकी आती छवि ने हंसकर
बांहें दीं बरबस गले डाल। 

मैं बही जा रही मौन विवश
भाव - सरिता में लक्ष्यहीन
रह कर सागर के हृदय बीच
मैं सुख सपनों की प्यासी मीन।

चाहूँ कितना,सब कुछ,कह डालूं
जड़ हुए उर,ओंठ,पलक और तन
खुद समझ न पाऊँ मैं क्या चाहूँ
बस तरस गया मेरा यह मन।
                 
                                         ( जयश्री वर्मा )


Saturday, November 30, 2013

गर हम न होंगे

मित्रों ! मेरी यह रचना आज के समाचार पत्र नवभारत टाइम्स ( नई दिल्ली / लखनऊ संस्करण )
के दिनॉंक - 4/5/14 , पृष्ठ संख्या -15 पर प्रकाशित हुई है। आप भी इसे पढ़ें।
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क्यों कोख से बुढ़ापे तक तुम यूँ हमारा वजूद मिटाते हो,
कभी हमले,कभी तेज़ाब,कभी शब्दों के नश्तर चुभाते हो।


हम ही हैं जो जन्म दे तुम्हें ममत्व से पोषित करते हैं,
धूल,धूप,आंधी,पानी और बुरी नज़रों से दूर रखते हैं।

हम अपने आँचल की छाँव में तुम्हें महफूज़ बनाते हैं,
तुम्हारा वजूद प्रेरित कर तुममें हौसलों को जगाते हैं।

हम ही हैं जो अहम् को तुम्हारे अंदर जीवित रखते हैं,
रिश्ते,सलीका,दुनिया भर की खुशियाँ तुममें भरते हैं।

माँ,बीबी,बहन,बेटी,बनकर घर को घर हम ही बनाते हैं,
हम हैं जो तुम्हें भाई,पिता,सनम के मायने समझाते हैं।

सोचो गर हम न होंगे तो तुम किससे दिल लगाओगे,
किस संग घर बसाओगे,किस संग सपने सजाओगे।

हम न होंगे गर दुनिया में तो,तुम किसके गीत गाओगे, 
किसपे गीत,गज़ल लिखोगे,किसके किस्से बनाओगे।

अरे ! बिन हमारे अपने जीवन का,वज़ूद तो बता के देखो,
हर गली,मोहल्ले,बाजारों से जरा रंगों को तो हटा के देखो।

अपनी ही ज़िन्दगी की भयावह वीरानियों से कांप जाओगे,
अरे हमें बचाओ,हमें सहेजो,तभी जीवन को जान पाओगे।

                                                                ( जयश्री वर्मा )
















Monday, November 18, 2013

बस तेरा

बगिया के अनगिन फूलों में,अनेकों हैं रंग भरे,
पर हाथ में जो फूल तेरे,बस वही फूल तेरा है।

हज़ारों असफलताओं में,एक जो सफलता है,
नाम जो अमर कर दे,बस वही सर्वस्व तेरा है ।

बहुत सी लालसाएं हों,बहुत सी जिजीविषाएं हों,
हाथ के घेरे में जो सम्हले,उतना जहान तेरा है।

अनगिनत सरगमों में,लहरियों की भरमार हो,
धड़कनों के करीब जो हो, बस वही गीत तेरा है।

दुनियां की भीड़ में,अनगिनत अनजाने चेहरे हैं,
जो सुख-दुःख में संग चले,बस वही मीत तेरा है।

धरा पर देशों के विस्तार कई,और सीमाएं अनंत है,
घरौंदा जो तेरा,बस वही ज़मीं तेरी है,आसमां तेरा है।
                                                                 
                                         ( जयश्री वर्मा ) 







Wednesday, November 6, 2013

ढलने तो दो

नज़रों से नज़रों को,मिलने तो दो,
दिल की कलियों को,खिलने तो दो ।

शामों को ख्यालों से,महकने तो दो,
रातों में ख्वाबों को,बहकने तो दो ।

इन हाथों को हाथों,संग जुड़ने तो दो,
इन क़दमों को एक राह,मुड़ने तो दो ।

सूरज की गर्मी को,पिघलने तो दो,
रात की ठंडक ज़रा,दहकने तो दो ।

अपने जीवन की नइया,खुलने तो दो,
जग की भूलभुलैया से,गुजरने तो दो ।

जमाने के बीच सवाल तो,उठेंगे जरूर,
इन अफसानों को,जवाबों में ढलने तो।
                                                                                                                
                             ( जयश्री वर्मा )

Thursday, October 24, 2013

गर क़ुबूल है

मित्रों ! मेरी यह रचना दिल्ली पत्र प्रकाशन प्र० लिमिटेड द्वारा प्रकाशित " गृहशोभा " पत्रिका में प्रकाशित हुई है।आप भी इसे पढ़ें -

गर क़ुबूल है 

लाख छुपाएं आप दिल के राज़,छुपा नहीं पाती हैं,
इश्क के उठे तूफानों को आप,दबा ही नहीं पाती हैं,
नज़रें इधर-उधर ढूंढती,मुझ पर ही ठहर जाती हैं,
आपकी निगाहें तो सिर्फ,मेरा अक्स ही दिखाती हैं। 

आपको एहसास नहीं है शायद,अपनी हालत का,
आपके दिल में तूफ़ान से,अरमान हैं जो दबे हुए,
कितनी ही शांत दिखें आप,मुखर हो ही जाते हैं,
आपकी जुबान बस,मेरे अफ़साने ही दोहराती है।

चैन न मिलेगा कभी,आपको अपनी शामों में,
यूँ रात भी जाएगी आपकी,आँखों ही आँखों में,
क्यों रातों को पलकें बंद,करने से आप डरती हैं?
जानता हूँ आपकी रातें,मेरे ख्वाब ही दिखाती हैं।

यूँ तो प्यार भी हर किसी के,नसीब में नहीं होता,
इस कदर टूटकर चाहने वाला भी,कहीं नहीं होता,
अगर क़ुबूल है आपको तो,इज़हार भी तो कीजिये,
ज़िन्दगी तो सफ़र है,इंतज़ार में भी गुज़र जाती है।

                                                   ( जयश्री वर्मा ) 




Tuesday, October 1, 2013

पर्यावरण व्यवहार

सबके है,मन को भाए,प्रकृति की ये,हरी-भरी कोमलता,
स्वच्छ हवा की भीनी खुशबू,और चिड़ियों की विह्वलता,
पुष्प लताओं और हरियाली से,किसका मन नहीं हर्षाता,
गर साफ़ स्वच्छ परिवेश दिखे तो,किसको नहीं सुहाता।

हमने वृक्ष मिटा,कंक्रीट बिछाई,किया वातावरण प्रदूषित,
रसायनों का करके प्रयोग,किया हवा और पानी भी दूषित,
परिवेश संवारेंगे,संकल्प उठाएं,पर्यावरण करें न कलुषित,
ये जागरूकता भविष्य बचाएगी,और धरती होगी हर्षित।

मदद करें,पर्यावरण सँवारने में,मिलजुल सब हाथ बढ़ाए,
कुछ नियमों को मानें हम,और कुछ बातें संज्ञान में लाएं,
जो हुआ नुकसान हो चुका चलो,अब भी सचेत हो जाएं,
करके प्रयास पर्यावरण सुधार का,शिक्षित हम कहलाएं।

पॉलीथीन नकारें,कपड़े या जूट का थैला,प्रयोग में लाएं, 
पुराने वस्त्रों का करें दान,या पोंछा,डस्टर,कैरी बैग बनाएं,
फर्नीचर से ऊब जाएं तो,कुछ बदलाव कर,रीयूज में लाएं,
विचारों की रचनात्मकता से,फिर से,नया सरीखा बनाएं।

नॉन बायोडिग्रेडेबिल कबाड़,रिसाइकिल होने को दे दें,
घरेलू कचरा,नगर निगम के बने हुए,कचराघर में ही फेंकें,
रसोई में कम प्रयोग हों,प्लास्टिक की बोतल,कटोरी,प्लेटें,
पानी का करें सुनियोजित प्रयोग,इसे बस बर्बादी से रोकें।

गर हर मानव,इक वृक्ष लगाए,फिर,वायु प्रदूषित न होगी,
जल सहेज के इस्तेमाल करें,तो कमी इसकी भी न रहेगी,
हर बच्चा सीखे पर्यावरण सुरक्षा,महत्व प्रकृति का बताएं,
वृक्ष लगाना,व उन्हें बचाना,हरियाली का महत्व समझाएं।

टीवी,कम्प्यूटर,मोबाइल युग में,सुख-सुविधाएं तो बढ़ी हैं,
परंतु प्रयोग के साथ,घातक बीमारियां भी,परवान चढ़ी हैं,
इस ई-कचरे का सही रिसाइकिल हो या एक्सचेंज में जाए,
पुराने इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स,भूलसे भी,खुले में न फेंके जाएं।

नदियाँ जीवित,तो ही जीवन संभव है,ये हर कोई ही जाने,
इनकी स्वच्छता का संकल्प,हम सब आज ही मन में ठाने,
वृक्ष,कीट,पशु और पक्षी,सभी पर्यावरण के लिए अहम हैं,
सबके ही लिए,ये धरती है और,सबके ही लिए ये गगन है।

हमारे ही जागरूक प्रयास से,हमारा ये पर्यावरण संभलेगा,
अगर सहयोग करें,हम सब मिलकर,धरती का रूप संवरेगा,
इस जल,जंगल,जमीन की रक्षा,आखिर जिम्मेदारी है हमारी,
इसी सोच के संग हम कर ले,पर्यावरण संरक्षण की तैयारी।

वृक्ष लगाना,फ़र्ज़ समझ,इस धरती को,हरियाली से भरदें,
रुग्ण धरा को,स्वस्थ बना हम,नव पीढ़ियों के नाम कर दें,
पर्यावरण स्वच्छ होगा तभी,प्राणवायु भी स्वच्छ मिलेगी,
पोखर,तालाब नदियाँ रहें,तभी जीवन की सरगम चलेगी।

पंछियों का कलरव गूंजेगा,और जल,जंगल सम्पदा बढ़ेगी,
बीमारियाँ कम फैलेंगी,मानव स्वास्थ्य निधि,परवान चढ़ेगी,
गर अपने पर्यावरण के,रक्षक बन,हम,ज्ञान का परिचय देंगे,
आने वाली पीढ़ियों के संग में,हम खुद पे भी एहसान करेंगें।

                                                                (जयश्री वर्मा ) 





Wednesday, August 14, 2013

मेरा स्वतंत्र भारत

स्वतंत्र मेरे भारत देश की,स्वतंत्रता महान हो,
विश्व पटल पे मेरे देश की,ऊँचाइयाँ बखान हों ।


नई ऊंचाइयां गढ़ डालें,ऐसी बेटियाँ महान हों,
स्वप्न देख साकार करें,ऐसी बेटों की उड़ान हो ।

हरियाली धरती ओढ़े,कृषक कृषि से धनवान हो,
ख़ुशी से फले फूले परिवार,सभी का सम्मान हो ।

नदियाँ बल खाएं,छलकते सरोवरों से पहचान हों,
पशु,पक्षी,लताएँ,वृक्ष,वन सम्पदा की जान हों ।

हर कोई हो साक्षर समर्थ,जन-जन ज्ञानवान हो,
वीरों के बलिदान की,अमर कहानियाँ बयान हों ।

अनंत अंतरिक्ष की ऊंचाइयां चूमें,ऐसे हमारे यान हों,
देश में जन्मीं कल्पना चावला सी,बेटियाँ महान हों ।

रक्षा की अटूट रेशम डोरी का,वज़न जो उठा सके,
ऐसी मजबूत भाइयों की,कलाइयां बलवान हों ।

स्वतंत्र मेरे भारत देश की,स्वतंत्रता महान हो ,
मेरे अमर तिरंगे की,निराली आन-बान-शान हो ।

                                               ( जयश्री वर्मा )



 



Friday, June 28, 2013

अब रोक ले अपना क्रोध


हे माँ धरती !

अब रोक ले सभ्यता निगलती,गरजती,अपनी गंगा ये ,
और अब तू थाम ले,अपने फिसलते ऊँचे-ऊँचे पर्वत ये।

हमने अज्ञानता में आकर,जो कुछ हानि तुझे है पहुंचाई,
ये अविवेकी काम गलत था,ये बात समझ हमें न आई।

हमने विकास के नाम पे माता,स्व विनाश रचना कर डाली,
नदियाँ रोकीं और पर्वत फोड़े, तेरी छाती छलनी कर डाली।

मत दे सब जीवों को हे माँ ! यूँ तू असमय प्रहार काल का,
न छीन साँसें,सपने और अपने, न दे यूँ श्राप अकाल का।

माना हमने अविवेकी सोच से माँ !तेरे हरेभरे वृक्ष हैं काटे,
पर्यावरण खिलवाड़ कर हमने,तुझको दर्द ही दर्द हैं बांटे।

माना हम मानव दोषी हैं तेरे,फिर भी आखिर बच्चे हैं तेरे,
अब  क्रोध रोक ले माँ तू अपना, क्षमा दान हमें अब दे दे।

सुन ले रुदन,क्रंदन माँ सबका,अब रोक ले अपना क्रोध,
विकास की दौड़ में नहीं था,हमको इस विनाश का बोध।

माँ -हमको नहीं था-इस विनाश का बोध।

उत्तराखंड की आपदा पर, धरती माँ अब रहम कर !

                                                         
                                                                                                ( जयश्री वर्मा )



हे शिव-
रोक ले अपनी गरजती गंगा अब
और समेट ले बिखरी जटाएं सब 
सम्हाल इन बिखरते किनारों को
मत छीन अब मेरे जीवन सहारों को
न छीन यूं रिश्तों का प्यार दुलार
न कर अब और निष्ठुर व्यवहार
हे केदार !हे श्रृष्टि विचारक !अब रहम कर
क्रोधित होकर देव भूमि तू यूँ मरघट न कर
अब रोक दे अपना क्रोध-
विकास की दौड़ में हमें नहीं था विनाश का बोध।
हे शिव -हमें नहीं था विनाश का बोध।
                                                     

उत्तराखंड की आपदा पर !शिव से याचना !


                                                    ( जयश्री वर्मा )

Saturday, June 22, 2013

उफ्फ नेता जी

कहिये नेता जी आपका कैसा और क्या हाल है,
क्यों परेशांन से हैं और क्यों यूं  हाल बेहाल है,
क्यों कर डाले इतने घोटाले,कांड और हवाला,
अब झुलसा रही है आपको प्रश्नों की ज्वाला ।
खुद तो खाया ही और ,रिश्तेदारों को भी खिलाया,
नोटों ही नोटों से क्यों खुद का ऊंचा महल बनाया,
महल क्या अपने लिए तो खुद ही कब्र बना डाली,
थू -थू कर रहे वो भी जो घर की करते थे रखवाली।

क्यों कमाई आपने लाखों,करोड़ों,अरबों की संपत्ति,
अब कैसे बचोगे इससे,जो ऊपर टूटी घोर विपत्ति ?
अब जब कुर्सी गई है छिन,तो मन क्यों है खिन्न,
इस पल अपराधी से आप,बिलकुल नहीं हैं भिन्न।

खुद का सम्मान पाने का था,दम्भ क्यों इतना भारी,
रिश्तेदारों को आगे बढ़ाने की,ऐसी क्या थी लाचारी,
आपकी तनख्वाह से ही,आपका पूरा काम चल जाता,
रोटी ,कपडे की जरूरत पूरी हो मकान भी बन जाता।

अनाप-शनाप खाने से,आपकी तोंद भी न इतनी बढ़ती,
और जनता भी भूख से त्रस्त हो,दो रोटी को न लड़ती,
देश के नोटों को भरते आपको बिलकुल लाज न आई,
जनता और जेल की आपको बिलकुल याद न आई।

देश से आपने कुछ वादे किये थे,शपथ ग्रहण के समय,
फिर क्यों देश का पैसा दाबा,दांव लगाए समय-असमय,
जनता के सवाल-जवाबों से, अब आप नहीं बच पाएंगे,
ये अपमान,कलंक अब आपके जीवन संग ही जायेंगे।

अच्छा होता देश का पैसा आप,देश विकास में लगाते,
कुर्सी बचती,गरीबी हटती,और सम्मान भी खूब कमाते,
जनप्रतिनिधि बनकर आए थे,धन कुबेर कैसे बन गए,
देवदूत का रोल मिला था,तो फिर दानव कैसे बन गए।

                                                     ( जयश्री वर्मा )









Thursday, June 6, 2013

क्रिकेट और सट्टा

अरे ओ सट्टेबाजों ये तुमने क्या किया घोटाला,
पूरा का पूरा क्रिकेट मैच ही पैसों से खरीद डाला,
बीसीसीई के सारे अधिकारी तकते ही रह गए,
और खिलाड़ी हम दर्शकों को ठगते ही रह गए।

हमें क्या पता था की बैट,बॉल और विकेट की तरह,
ये छोटे-बड़े महान क्रिकेट खिलाड़ी भी बिकाऊ हैं,
जो क्रिकेट मैच जोर शोर से चल रहा है यहाँ -वहाँ,
सारा का सारा टाइम-पास बस धोखा और दिखाऊ है।

ये न सोचा कि भारतीयों की धड़कन बसती है क्रिकेट में,
दोस्तों की दिन-रात की बातें हैं बस बॉल और विकेट में,
हम खाना-पीना भूलकर क्रिकेट को देते हैं प्राथमिकता,
चाहे कोई जरूरी काम हो चाहे कैसी भी हो आवश्यकता।

अगर बोर्ड एग्जाम में क्रिकेट मैच लिखने को आता है,
तो बेटा पढ़ाई छोड़छाड़ टीवी के सामने ही डट जाता है,
पापा,मैच जब पूरा देखूँगा तभी तो निबन्ध लिख पाऊंगा,
फिक्सिंग के पॉइंट्स बताओ तभी तो नंबर पूरे लाऊँगा।

खिलाड़ियों की फोटो काट-काट हम किताबों में रखते हैं,
उनके बड़े-बड़े पोस्टर हमारे घर की दीवारों पर सजते हैं,
पैसा कमाने का जो शार्ट-कट खिलाड़ियों ने निकाला है,
उस शार्ट-कट ने उनका खेल-जीवन ही शार्ट कर डाला है।

                                                                                            ( जयश्री वर्मा )

 





 















 

Monday, June 3, 2013

क्यों भला

जिस तरह से चले गए हो तुम,ऐसे भी कोई जाता है भला ?
सावन के बीच भी कोई,क्या वीराने के गीत गाता है भला ?

अभी बस एक ही साल तो हुआ था,मुझे तुमसे यूँ जुड़े हुए,
पूरे दिखा भी नहीं पाई,कुछ दिल के पन्ने रह गए मुड़े हुए।

रूठ कर गए हो वहाँ जहाँ से मैं तुम्हें,बुलाकर मना भी न सकूं,
घायल यादों को समेट-समेट , तुम्हारी तस्वीर बना न सकूं।

कि-कंगन,चूड़ी,बिछिया,टीका, अब सब हराम हैं मेरे लिए,
अब जब तुम ही नहीं तो, मैं श्रृंगार करूँ भी तो किसके लिए।

मेरे पास माँ पुकारने वाली,तुम्हारी कोई निशानी भी तो नहीं,
कि जिसे तुम्हारा नाम ले,गले से चिपटा लूं,रोलूं कभी -कभी।

अभी तो मैं-न रूठ,न झगड़,न कोई हठ, कर पाई थी तुमसे,
क्यों किस्मत ही रूठ गई,न जाने कब क्या भूल हुई मुझसे।

देखो न अकेलेपन में यूँ ही,कितनी स्वार्थी हुई जा रही हूँ मैं,
अपना ही दुःख सोच-सोच बस, अपनी ही कहे जा रही हूँ मैं।

जानती हूँ अचेतन होते -होते भी,तुमने मेरा नाम पुकारा होगा,
बेबस निगाहों को तुम्हारी,भीड़ में मेरे दिखने का सहारा होगा।

                                                                  ( जयश्री वर्मा )






Thursday, May 30, 2013

चाय की प्याली

चाय की प्याली,बड़ी निराली,इसकी महिमा किसने है टाली,
पियें-पिलायें,मित्र बनाएं,संग पड़ोसी हों या प्यारी घरवाली।
कई बड़े-बड़े इसमें उलझे हैं,और कई बड़े-बड़े मसले सुलझे हैं,
हर घर का है यह प्रिय पेय,जो पियें इसे बस वही समझे हैं । 

इंसान गरम हो तो ठंडा करती,गर हो म्लान पड़ा तो गर्म,
ये अजीब सा जादू करती,कुछ-कुछ समझो इसका मर्म।
काम बनाना चाय पिलाओ,काम बन गया चाय पिलाओ,
गर रिश्ता पक्का करना हो,किसी शाम चाय पर बुलाओ।

सर पीड़ा तो चाय पिलाओ गर हो मन भारी तो चाय पिलाओ,
हर समस्या चुटकी में सुलझे, बस थोड़ी स्ट्रांग चाय बनाओ।
नींद भगानी तो चाय पियो,गर थकान मिटानी हो चाय पियो,
खालिस देशी सस्ता ये पेय,खूब पियो और जुग-जुग जियो।

चाय और समोसा पूरक करके,कुछ सांठ-गांठ से काम चलाओ,
प्रभाव गहन बैठाना हो तो,मुस्की संग प्याली का हाथ बढ़ाओ।
फिर मुस्कुराहट का जादू देखो,और चढ़ता चाय का जादू देखो,
गर आज नहीं तो कल जानेंगे और बातों का लोहा मानेंगे।

दुःख में चाय,सुख में चाय,तुम समझो इसका ये गहरा सार,
अगर रोज-रोज संग चाय पियो तो, बढ़ता धीरे-धीरे प्यार।
मित्रों संग निंदा रस में डूबो,शिकवे तब्दील हों बन जाए हर्ष,
चाय प्याली संग विचार-विमर्श,रूठने और मनाने का स्पर्श।

बड़ी-बड़ी मीटिंग हों तो चाय, और कितनी बड़ी सेटिंग तो चाय,
राजनीति की कूटनीतिक चाय,या आम जन की माहमूली चाय।
तुलसी,इलायची,अदरक के संग देखो,आयुर्वेद के नुस्खे भरे हैं,
ताजादम यह कर देती है,क्यों की इसमें एन्टीआक्सीडेंट भरे हैं। 
                                                               
                                                                                      ( जयश्री वर्मा )


 


Monday, May 27, 2013

आपका ख़याल

मित्रों ! मेरी यह रचना दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन प्रा लिमिटेड,नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित " मुक्ता " अगस्त 2013 के अंक में प्रकाशित कि गई है , आप भी इसे पढ़ें।

आपकी बातों में कुछ न कुछ तो ख़ास है,
बड़ी ही मधुर हैं,लगें दिल के बहुत पास हैं।


कुछ -कुछ मीठा सा लगे आप के सवालों में,
जी चाहे चंपा बन गुंथ जाऊं आपके बालों में।

आपकी जो आँखें हैं,न जाने क्या बोलती हैं,
आपके दिल के भावों के भेद कई खोलती हैं।

आपके होंठ जैसे बातों के रस भरे पिटारे हों,
सुनना चाहूँगा,सब बातें,सवाल कितने सारे हों।

आपके लहराते आँचल में खुशबूएं हज़ार हैं,
ख्यालों  में लिपटी जैसे बसंत की बयार है।

दिन चला जाता है पर रात नहीं जाती है,
आपकी याद मन का द्वार खटखटाती है ।

इस कदर रच बस गयीं हैं आप जीवन में,
देखूं जो दर्पण कभी,तो आप नज़र आती हैं।

झिझकता हूँ पर,दिल में मेरे इक ख़याल है ,
गर मैं संग चलूँ,तो आपको कोई ऐतराज है ?

                                                                  ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, May 22, 2013

सपने अपने

चलो इक गीत गुनगुनाएं-
मधुर-सुरीले सुर छंदों से इसे सजाएं,
प्रेम ही प्रेम आलोड़ित हो जिससे,
ऐसा इक जादुई सुर संगीत जगाएं।

चलो इक रात जगाएं-
दूर करें चांदनी से हिंसा के अंधियारे,
और टांक दें दिपदिप-टिमटिम करते,
अपनत्व भरे तारे अनगिन बहुत सारे।

चलो अब धरा सजाएं-
हरियाली ही हरियाली इसपर उगायें,
फूलों को महकाएं,झूमते वृक्ष,फूल,फल,
पक्षी,तितली,और काले भंवरे बहकाएं।

चलो इक आकाश बनाएं-
ऊँची पर्वत चोटी,पीछे से सूरज दमकाएं,
या- इन्द्रधनुष हो रंगरंगीला,सात रंग का और,
कई रूप वाले मेघों संग,चंचल बिजली चमकाएं।

चलो इक घर बसायें-
सुकून की दीवारें हों,और हों प्यार के पल्ले,
छत हो मजबूत अपने इरादों-वादों की,और-
खिड़की पर हों मीठे स्वप्नों के रुनझुन छल्ले।

                                                                              ( जयश्री वर्मा )

Monday, May 20, 2013

रिश्तों का खेल

जन्म के साथ ही ये रिश्ते जन्मे,
और मात-पिता के सपने चमके,
नामकरण कर पहचान इक बनाई,
और किताबों की शिक्षा पूर्ण कराई।

थोडा बढ़ा जब तरुणाई आई,
विचारों में तब हरियाली छाई,
चहुऒर धड़कते दिल ही दिखते,
बनते नए दोस्त और बिछड़ते ।

जवानी में अर्थोपार्जन का संघर्ष,
फिर इक नई पहचान बनने का हर्ष,
जीवन साथी संग घर जब बसाया,
तब सुख-सपनों संग उसे सजाया।

अगली पीढ़ी की किलकारी के संग,
और पिछली पीढ़ी के छूटने का ढंग,
बूढ़े -पुराने,बारी-बारी विदा हो गए,
काल के गर्त में,जाने कहाँ खो गए।

अनुभवों संग साक्षात्कार जब हो चला,
समय के साथ मैं भी जब वृद्ध हो चला,
बच्चों की जवानी देख सब दुःख भूला,
सच है जीवन उतार-चढ़ाव का झूला।

एक दिन तब ऐसा मेरे संग भी आया,
काल ने जब मुझको भी पास बुलाया,
जग छूटा,अपने और सपने सब छूटे,
नेत्रों में वेदना और विदा के आँसू फूटे।

बस सारे रिश्ते-नाते तोड़ चल दिया,
यूँ सबको बिलखता छोड़ चल दिया,
मेरे निष्प्राण शरीर को पूजा-सजाया,
फिर सबने मिल शमशान पहुँचाया।

                                                ( जयश्री वर्मा )




Wednesday, May 15, 2013

भला लगता है



सावन की हरियाली बीच,
और फूलों भरी क्यारी बीच,
मतवाले भ्रमरों की गुन-गुन संग,
प्यारा सा प्यार का इज़हार भला लगता है।

घनघोर घटाओं बीच,
रिमझिम फुहारों संग जब,
भीग रहा तन और भीग रहा मन हो,
बूंदों की टप-टप का मधुर गान भला लगता है।

लम्बी डगर और हाथों में हाथ हो,
बिन बोले कुछ बस निःशब्द बात हो,
सपनों के पालने में झूल रहे जब दोनों हों,
तब ये धरती,ये आसमान,ये संसार भला लगता है।

भविष्य के सपने हो,
ख्वाब पलकों में अपने हों,
आपसी प्यार और विश्वास का साथ हो
तब अपने पे हो चला वो,गुमान भला लगता है।

                                                                                  ( जयश्री वर्मा )

Monday, May 13, 2013

बस थोड़ा सा

चाय के प्याले में चाहिए थोड़ी सा शक्कर,
बहुत सीधे रास्तों में बस थोड़ा सा चक्कर।

दाल की कटोरी में बस हो थोड़ा सा नमक,
कपड़ों को चाहिए बस थोड़ी सी ही दमक।

हरी-भरी सी डाली में थोड़ा सा फूलों का रंग,
बहुत सारे प्यार बीच बस थोड़ी सी हो जंग।

पति को चाहिए पत्नी की थोड़ी मीठी मुस्कान,
पत्नी को चाहिए थोड़ा सा मान और सम्मान।

शिष्य को चाहिए ज्ञानवान का थोड़ा सा ज्ञान,
योगी को बस चाहिए थोड़ा एकांत और ध्यान।

सभ्य,शांत,चित्त बीच हो बस थोड़ी सी शरारत।
पर्यटन के बीच हो थोड़ी चुहलबाजी की हरारत।


चहुँ ऒर कोलाहल बीच चाहिए थोड़ी सी शांति,
विश्वास ही विश्वास के बीच थोड़ी सी ही भ्रान्ति।

जेठ की लपट में बस थोड़ी सी छाँव और ठंडा पानी,
सर्दियों में थोड़ी धूप संग कुछ चटपटी सी कहानी।

जन्म के समय हो थोड़ा सा माँ के आँचल का दूध,
मृत्यु के समय पे झाड़ दें थोड़ी कड़वाहट की धूल।

लालसाओं को पूरा करने को हो पास थोड़ा सा पैसा,
घर हो इक अपना,थोड़ा छोटा ही सही,ऐसा या वैसा।

रूठे हुओं को चाहिए केवल बस थोड़ा सा मनाना ,
बिगड़ो को चाहिए बस थोड़ा सा बचने को बहाना।

क्रोध में धारण रहे सदा थोड़ा सा आपा और विवेक,
जीवन में कर जाएँ औरों के लिए काम थोड़े से नेक।

देश को अपने चाहिए बस थोड़ा एकता और प्यार,
सभी धर्मों को चाहिए थोड़ा अपनापन और सौहार्द।

किसी भी सामान की तौल में मिले थोड़ा सा ज्यादा,
किसी भी मोल-भाव में हो थोड़ा सा पैसों का फायदा।

प्रिय की बाँकी चितवन में बस धार हो थोड़ी सी और,
जीवन में खिलते रंगों पे फिर कीजिये जरा सा गौर।

इस वक्त जो आपका ध्यान था मेरे लफ़्ज़ों की ओर,
कविता के बाद हो जाए थोड़ा सा तालियों का शोर।

                                                 ( जयश्री वर्मा )





Wednesday, May 8, 2013

कितने ही सरबजीत

ऐसे कितने ही सरबजीत,कई विदेशी जेलों में फंसे हैं,
आँखों में झाइयाँ,शरीर है ढांचा,पर बेड़ियों में कसे हैं।

ये गालियों और लातों की रोटी से,मन का पेट भरते हैं ,
कल की आशाएं संजो ये,रोज तिल-तिल के मरते हैं।

ये तो रात-रात भर दर्द,दहशत भरी,नींद जागा करते हैं ,
और दिन-दिन भर जान-रहम की,भीख माँगा करते हैं।

हर त्यौहार सपनों में ही ये,अपनों के संग-साथ जीते हैं ,
उनकेघर भी होली,क्रिसमस,बैसाखी,ईद कहाँ मनते हैं।

यहाँ भी इंतज़ार में,उनके अपनों की आँख बिछी रहती है,
पत्नियाँ भी आस में,करवाचौथ कर मांग भरा करती हैं।

कितने बच्चों को अपने पिता की स्मृति ही नहीं कुछ भी,
दया या तिरस्कार नियति है,यही उनका जीवन सत्य भी।


बस वो सुनी स्मृतियों और फोटो संग यूँ ही पल जाते हैं ,
हालात के संग वे सब,खुद-ब-खुद बस यूँ ही ढल जाते हैं।

ये बच्चे मन की उम्मीदों को,मन में ही खत्म कर लेते हैं,
नहीं है पिता का साया,जान के कोई सवाल नहीं करते हैं।

ऐसे कितने ही सरबजीत,न जाने,कितने देशों में फंसते हैं,
जो शरीर के साथ हैं,पर दिल उनके अपने देशों में बसते हैं।

                                                                      ( जयश्री वर्मा ) 


 

Monday, May 6, 2013

सवाल


दोस्तों !मेरी यह कविता " सवाल " इस बार की " सरिता " मैगज़ीन में ( पृष्ठ संख्या -115 ) पर प्रकाशित हुई है!आप लोग भी पढ़ें ! धन्यवाद !


क्यों तुम्हारी आँखों में आज, तूफ़ान उमड़ आया है ?        
क्या किसी ने फिर,यादों के झरोखे पे खटखटाया है ?  

जो फूल दिया था उसने,खिला -खिला,महका -महका,
क्या वाही सूखा हुआ,किसी किताब में निकल आया है ?

जो तराना,उसने सुनाया था,कभी किसी पेड़ के नीचे,
क्या वही आज पास से गुज़रते,किसी ने गुनगुनाया है?

जो डोर बाँधी थी,कसमों की,वादों की,साथ में उस डाल पर,
क्या उसी डाल का कोई पत्ता,उड़ कर इधर चला आया है ?

जो कहे, अनकहे, सवाल और जवाब थे कई पूछे गए,
क्या ज़माने की निगाहों से,मन तुम्हारा कसमसाया है ?

क्यों मुरझाया हुआ है चेहरा,आज तुम्हारा इस कदर ?
क्या ख़्वाबों में मुस्कुराता, वही चेहरा उतर आया है ?

न पूछो ,न टोको,न कहो कुछ भी, न कोई अब सवाल करो,
कि बड़ी मुश्किल से मैंने,इस मन को थपका के सुलाया है।

                                       ( जयश्री वर्मा )

Friday, May 3, 2013

परिश्रमी सूरज

रात्रि माँ की गोद से उछला,प्यारा,सुबह का सूरज धीरे-धीरे,
आँखें मलता, अंगड़ाई संग,गुनगुनी मुस्कुराहट धीरे-धीरे।

चिड़ियों को उठाया,पशुओं को बताया,बच्चों को भी साथ जगाया,
नए विकल्प ,नयी कोशिशों और नयी तारीख का पाठ पढ़ाया।

मंदिर,मस्जिद,गिरजा,गुरुद्वारे में,श्रद्धा की इक ज्योति जलाई,
नए दिन के आगमन के साथ,नया उत्साह, नई उम्मीद जगाई।

दिन जब चढ़ा जुझारू बन कर,प्रचण्ड हुआ और आग बरसाई,
समुद्र की भाप बादलों में बदली और पहाड़ों की बर्फ पिघलाई।

अनाज सहेजा ,वस्त्र सुखाए,खेतों में कृषक के हल चलवाए,
हलचल फैलाकर धरती पर,कितने ही बिगड़े काम बनाए।

पेड़ों की पत्ती पर चमका,प्रकृति,फल,फूलों की छठा बढ़ाई,
कुछ जीवन दिए धरती को और कुछ की समाप्त कथा करवाई।

शाम को थक कर चूर हो गया,विश्राम को अब मजबूर हो गया,
निस्तेज बना थका-थका सा,चेहरा भी उसका म्लान हो गया।

रात्रि माँ ने आँचल फैलाया,मुस्कुरा कर अपने पास बुलाया,
फिर अपनी गोदी में ले उसको ,थपकी दे मीठी नींद सुलाया। 
                                                                       
                                                     ( जयश्री वर्मा )
                                                                                                                                     

Wednesday, May 1, 2013

जागृति

पाकिस्तान क्यों आतंक फैलाये?क्यों चीनी सेना भड़के ?
क्यों नहीं हम रणनीति बनाते,दिखाते क्यों नहीं लड़के ?
वो कई किलोमीटर आगे आकर के,हमको हुंकार दिखाते ,
हम उनका सामान खरीद कर,क्यों उनको सर हैं चढ़ाते ?


सस्ते में हर चीज़ मिल रही,है चीनी सामानों की भरमार,
जकड़ डाला सारे बाज़ार को,मूक है पब्लिक और सरकार,
जब चीनी सामान है सस्ता,तो हम क्यों नहीं बना सकते?
क्यों आश्रित हैं विदेशी के,क्यों भरोसा खुद पे नहीं रखते ?

चाहे पाकिस्तान का हमला हो,या फिर हो ड्रेगन की ज्वाला,
अहिंसा से न काम चलेगा,अन्यथा पीना होगा विष प्याला,
हम क्यों फंसे पड़े हैं इस कदर कर - कांड, घोटाला, हवाला,
देश तभी सुरक्षित होगा,जब हर इंसान बने देश रखवाला।

समझ कब हमको आएगी ?पौरुष जागृति कब जागेगी ?
अपना-अपना स्वार्थ त्याग,एकता-चेतना कब छाएगी ?
पड़ोसी दुश्मनों की बुरी नज़र,कब हमें समझ में आएगी ?
कब सोचेंगे?कब चेतेंगे?क्या जब भारत माँ लुट जायेगी ?

ऐ बापू के देश के वीरों कब तक विकृति बरदाश्त करोगे,
कब तक अहिंसा पुजारी बन कर,कुटिल निगाह सहोगे,
जवाब दो अत्याचारियों का,अहिंसा का मार्ग अब छोड़ो,
कलंकित न हो वीरता,जवाबी ज्वाला का मुख अब मोड़ो।
                                               
                                                                                          ( जयश्री वर्मा )




Tuesday, April 30, 2013

वर्षा की आस

 मित्रों मेरी यह रचना " वर्षा की आस " आज के समाचार पत्र अमर उजाला ( दिनाँक - 4 /7 /2014, दिन- शुक्रवार ) की पत्रिका  " रूपायन " में पृष्ठ संख्या - 10 पर प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़ें -


गरज - गरज कर मेघा बरसे,
तब क्यों प्यासी धरती तरसे,
कुछ नदियों की शान बढ़ेगी,
कुछ नालों की साख चढ़ेगी,

जब खेत तृप्त हों कोंपल उगलें,
हम हरियाली आँखों में भर लें,
फिर धरा इठलाएगी कुछ ऐसे,
नवेली,हरी ओढ़नी ओढ़े हो जैसे,

रंग-बिरंगे फिर फूल खिलेंगे,
फूलों के बदले में फल मिलेंगे,
ख़ुशी-त्योहारों की धूम रहेगी,
मन खुशियों की धार बहेगी,

लक्ष्मी छना-छन घर में आएगी,
मुनिया पढ़ने को स्कूल जाएगी,
क,ख,ग,घ,पढ़-लिखकर के तब,
अफसर,मास्टरनी बन जाएगी,

कंगन,ओढ़नी घरवाली को दूंगा,
और सबके कपड़े सिलवाऊंगा,
मेघा तुम जल भर-भरकर लाओ,
प्यासी धरती की प्यास बुझाओ,

टिप-टिप,टप-टप,छप-छप,छपाक,
बन्ना,कजरी,दादरा,सोहर के राग,
खिलते-इठलाते बगिया और बाग,
बाजरा,मक्का और सरसों का साग,

मेड़ पे दौड़ें,मुन्ना-मुन्नी यूँ खेलें,
बापू मुझको,अपनी गॊद में ले ले,
गुन-गुन करती तब घरवाली जाए,
इन खेतों में जब हरियाली छाए।

                                         ( जयश्री वर्मा )






Saturday, April 27, 2013

तुमसे

तुम आये तो जैसे कि-
ठहरे पानी में,कंकड़ फेंका हो किसी ने,
कि जैसे मन बगिया,खिल उठी हो महकी सी,
कि जैसे फूल खिले हों,रंग-बिरंगे भावों भरे,
कि जैसे खुशबूएं,समां गईं हों साँसों में,
कि जैसे चटकी हो,कली कोई प्रेम भरी अल्हड़,
कि जैसे रौशनियों का इन्द्रधनुष,चमका हो आँखों में,
कि जैसे जेठ के बाद,पहली बरसात हो भीनी-भीनी,
कि जैसे सपनों के पंख लिए,तितलियाँ उड़ती हों यहाँ-वहां,
कि जैसे बहकी-बहकी नदियाँ,छलकी फिर रहीं हों कहीं,
कि जैसे साएं-साएं हवा,कोई सरगम गा रही हो कानों में,
मैं जीवन सा-ठहरा,बहका,महकों की तरंगों में खोया,
फिर क्या हुआ अचानक ? क्यों हुआ ऐसा ?
तुम्हारे जाने से-सिर्फ़ केवल तुम्हारे जाने से,
सब कुछ वही है,लेकिन कुछ नहीं है भाता,
न फूल,न भंवरे,न इन्द्रधनुष,न रौशनी,न गीत,न संगीत,
कि जैसे सब समेट ले गए हो,तुम अपने साथ,
कि जैसे तूफ़ान के बाद का वीराना,पसरा हो हर कहीं,
कि जैसे उजड़ा-उजड़ा,सूना-सूना सा हो गया हो तन-मन,
कि जैसे बेजान मैं और शमशान हो गया हो मेरा जीवन। 
                                                          
                                                                                                    ( जयश्री वर्मा )



Wednesday, April 24, 2013

संरक्षण संकल्प

ब्रम्हाण्ड शून्य में धरती माँ,तुमने मानव को जन्म दिया,
अपनी हरियाली के आँचल में,जनजीवन स्पंदित किया।


जल, फल, फूल से पोषित कर,पाला बड़े ही प्यार से,
जीविका दी,सहेजा स्वास्थ्य,औषधियों के भण्डार से।

नीला ग्रह है नाम तुम्हारा,जलराशि से परिपूर्ण हो तुम,
गर तुम न होतीं, हम न होते,इसी लिए धरणी हो तुम।

पर हम कितने स्वार्थी हैं माँ देखो,तुमको बंजर बना रहे,
न जल बचाया,न पर्यावरण सहेजा,खुद की मृत्यु बुला रहे।

वृक्ष काट,तुझे निर्वसन कर रहे,अपने खजाने जुटा रहे,
खुद के सुख साधन के लालच में,तुमको बंजर बना रहे।

गर तुम न होगी,स्पंदन न होगा,अस्तित्व न होगा हमारा,
जल,वृक्ष,पर्यावरण संरक्षित हो,अब यह संकल्प है सहारा।

माँ का ऋण चुकेगा तभी,जब हर मनुष्य एक वृक्ष लगाए,
धरती माँ के सूने आँचल में,फिर से हरियाली भर जाए।

हरियाली हो,नदियाँ बल खाएं,आक्सीजन की भरमार हो,
चिड़ियाँ चहकें,पर्यावरण सही हो,जीवन उल्लास अपार हो।

                                                                                                     ( जयश्री वर्मा )


Monday, April 22, 2013

मेरा सच्चा मित्र


मेरे आँगन की गोदी में इक,रहता वृक्ष निराला है,
मैंने ये हरा-भरा सा वृक्ष,बड़े ही यत्नों से पाला है,
यह मेरा जीवन सत्य बना है,मैं इसका हूँ हमदम,
ये मेरे सुख-दुःख का है दृष्टा,हर पल और हरदम।

जब कभी मैं थक जाता हूँ,इसकी शरण आ जाता हूँ,
जीवन के जटिल सवालों के,सारे उत्तर पा जाता हूँ,
यह खुली शाखाएं बढ़ा मुझे,अपनी बाहों में बुलाता है,
मधुर हवा और शीतल छाँव में,थपकी दे के सुलता है।

यह आशा है,यह आश्रय है,यह जीवन है कई परिंदों का,
नव घरोंदों,पक्षी-कलरव और नित नए मधुर छंदों का,
मुन्नी,सुहैल,जॉन,परमिंदर,इस पर आकर झूला झूलें,
इतना ऊँचा-इतना ऊँचा कि जैसे आसमान अब छूलें।

मैंने अपने हांथों से जब रोपा,तब यह नन्हा पौधा था,
नित पाला,नित सींचा,ये दोस्ती का अटूट सौदा था,
आज युवा हो और बलिष्ठ हो,यह मेरा बना सहारा है,
प्राणवायु,फलफूल सौंपकर,जैसे उतारता कर्ज़ हमारा है।

तीक्ष्ण धूप,भीषण वर्षा से यह मुझको,देता खूब सुरक्षा है,
दुःख में सुख में,मैं इससे जा लिपटा,मेरा मित्र यह सच्चा है,
आप भी संकल्प उठा अपने हाथ एक वृक्ष अवश्य लगाएं,
इक वृक्ष लगा,हरियाली बढ़ा इस धरती का कर्ज़ चुकाएं।

                                                                                              ( जयश्री वर्मा )


Thursday, April 18, 2013

जीत और हार


जीतो तो ऐसे-
कि जिसमें,
पसीना बहा हो तुम्हारा,
कि तुमने जो देखा था कभी,
वो सपना सच हुआ हो तुम्हारा,
कि जिसमें दंभ न हो तनिक भी,
कि किसी का नुक्सान न छुपा हो,
कि किसी से कुछ छीना न हो तुमने,
कि किसी की आह न दबी हो जिसमें,
बस मेहनत परिलक्षित हुई हो तुम्हारी,
लोग स्वतः ही कह उठें कि-वाह क्या जीत है,
सच्चाई से जीतना ही तो जीत की सच्ची रीत है,


 और-
गर हारो तो ऐसे-
कि जीतने वाले को-
कांटे की टक्कर दी हो तुमने,
जीतने वाले को प्रतिद्वंदिता का,
इक एहसास और ख़ुशी का आभास हो,
और जिसमें कतई हारने की ग्लानि न हो,
कि जिसमें टूट कर न तुम बिखरो अंदर ही अंदर,
दुबारा जूझने की इक हिम्मत सतत बानी रहे मन में,
सदा सम्मान रखो अपने आप का और जीतने वाले का भी,
लोग स्वतः ही चहक उठें कि-वाह जीत से बढ़कर तो ये हार है,

यह कालचक्र है-
हार के बाद जीत,
जीत के बाद हार आती ही है,
जिंदगी बार-बार मौके दोहराती है,
जिंदगी क्या है-इक खेल ही तो है मित्रों,
सुख-दुःख के ही दो पहलू का रूप है मित्रों,
बस खेल की भावना से ही खेलना है जी तोड़ ,
धोखे से भी ढीला न पड़े,यह प्रतिद्वंदता का जोड़,
दिन-रात के आने-जाने के जैसा है,जीत-हार का साथ,
दृढ़ हो खेलो,विश्वास से खेलो,बाकी सब ऊपर वाले के हाथ।
                                         
                                                           ( जयश्री वर्मा )
                                     


 

Monday, April 15, 2013

अनमोल हंसी


खूबसूरती बढ़ाती है ये,जीवन जीना सिखाती है हंसी,
हंसिये,हंसाइये,क्योंकि जीवन सरल,बनाती है हंसी,
ईश्वर ने केवल मानव को ही,बक्शी है यह नियामत,
नियमों में न बांधो,खूब लुटाओ,बांटो,फैलाओ हंसी।

यह अच्छा वर्कआउट है,मानव शरीर के खिंचाव का,
यह सुधारेगी रक्तसंचार,और बचाव है रक्तदाब का,
ये श्वसन की बीमारियों को,आपसे दूर करेगी जनाब,
ये याददाश्त बढ़ाएगी,डिमेंशिया का है अचूक जवाब।

यह मिलनसार भी बनाएगी,दुखद रिश्ते भी मिटाएगी,
और ये मूड दुरुस्त रखकर,डिप्रेशन को दूर भगाएगी,
ये हंसी है संक्रामक,इसे लोगों के बीच खूब फैलाइये,
चुटकुले पढ़िए,सुनिए,सुनाइये और खूब मुस्कुराइये।

पर इस हंसी मज़ाक के बीच,समझदारी न छूटे कभी,
मज़ाक न बने किसी का,और कोई दिल न टूटे कभी,
कभी किसी का मज़ाक उड़ा,गैर-जिम्मेदाराना न हंसे,
किसी के दर्द,परिस्थिति पर,बेवजह ही न फिकरे कसें।

यह तो इक अचूक नुस्खा है,दुश्वारियों से पार पाने का,
जीवन को स्वस्थ बनाने का,और डाक्टर से बचाने का,
इसलिए ख़ुदा के दिए,इस वरदान को जरा पहचानिए,
अपनी मन बगिया में,हंसी के फूलों का महत्व जानिये।

गर जेबों में पैसे हों तो,दुनिया की हर चीज़ ही हमारी है,
पर चेहरे पे,मुस्कान न हो तो,ये कमी तो सिर्फ हमारी  है,
ये तो वो चीज़ है,जो कि मुफ्त में ही,पाई और बांटी जाए,
ये तो इक सर्वश्रेष्ठ गुण है,गर जो आप,इसे पहचान पाएं।

वैसे तो कई विपत्तियों को आप मुस्कुरा के टाल सकते हैं,
गर जो भूल कोई हो जाए तो मुस्कुरा के सुधार सकते हैं,
झुंझलाने के व्यवहार से तो राई का पहाड़ बन ही जाएगा,
इक बार तो उलझे जज़्बात,सुलझा के देखिये मुस्कानों से।

ज़रा अहम् को नज़रअंदाज कर,रूठे हुओं को मनाइये,
और बुझते हुए रिश्तों पे,मुस्कराहट का मल्हम लगाइये, 
हंसो-हँसाओ कि आज ये धरती और आसमाँ,तुम्हारा है,
खूब हंसो-मुस्कुराओ,कि ये स्वस्थ जीवन का,सहारा है।

                                                                                ( जयश्री वर्मा )







  

Monday, April 8, 2013

बेबसी


वक्त के हाथों नचाये गए,हम बेबस से कारिंदे,
मन के बोझिल गाँवों बीच,उड़ते यादों के परिंदे,
तुम्हारी छवि की कुछ,अस्पष्ट सी फुसफुसाहट,
और प्रेमपगी बातों की,सुनाई देती चहचहाहट।

खींच ले गयी बाँध के मुझको मीठी सी यादों की डोर,
अपने गाँव की मिट्टी की,भीनी-भीनी खुशबू की ओर,
जहाँ मेड़ किनारे बैठे,हाथों में हाथ लिए मैं और तुम,
जहाँ हमने सपनों के बीज बोए,योजनाओं में रहे गुम।

कि कल को पल्लवित-पुष्पित होगा,हमारा ये प्यार,
कि कल खुशियों से भरा होगा,हमारा भी घर-संसार,
न जाने इस जीवन की,भाग-दौड़ में कहाँ और कब,
बिछड़े वो सपने,वादे,प्यार,इज़हार,जीत व हार सब।

तुम न जाने कैसी होगी,और मैं हूँ दूर शहर में यहाँ,
क्या करती और क्या कुछ सोचती रहती होगी वहाँ?
क्या पल-पल मेरी आहट का, इंतज़ार होगा तुम्हें?
क्या आज भी वो,कहा सुना सब याद होगा तुम्हें?

मैं तो यहाँ जैसे खो सा ही गया हूँ,भीड़-भरे शहर में,
बस दो वक्त की रोटी की,आपाधापी और घुटन में,
सोचता ही रह गया कि,अब मैं भी इतना कमाऊंगा,
कि तुम्हें वहां से लाकर,अपनी नई दुनिया बसाऊंगा।

दिल में तमन्ना और आँखों में,बस सपने ही रह गए,
वक्त की कठपुतली बन,हम सब अकेले ही सह गए,
न जुटा पाया कभी,तुम्हें अपने साथ लाने के लायक,
न कमा पाया यहाँ,अपनी दुनिया बसाने के लायक।

और अब जब बीत गए हैं,हमारे जीवन के इतने साल,
उम्र थक चली है,सफेद हो चले हैं ये मेरे सिर के बाल,
दिन बीत जाता है,साँझ ढलने पे फिर वही इक ख्याल,
पूछती हो तुम,कब ले जाओगे? बस इक यही सवाल।

मन में छटपटाहट है,कि और नहीं,बस अब लौट चलूँ,
उन्ही यादों के परिंदों की,उड़ानों के साथ,तुम्हारे पास,
तुम संग रोक लूं,इन जीवित बचे हुए,सपनों की सांस,
है मन में तो बस एक नज़र तुम्हें देख पाने की प्यास।


                                                         ( जयश्री वर्मा )

Friday, April 5, 2013

गौरैया री


गौरैया तुम हर फागुन में,न जाने कहाँ से आती हो ?
मेरे घर की भीत-सुराख़ में,अपना नीड़ बनाती हो,
तिनका-तिनका यहाँ-वहाँ से,ढूँढ- ढूँढकर लाती हो,
भविष्य के सपनों में खोई,घरौंदा खूब सजाती हो।

मैंने देखा,तुमने देखा,इक रिश्ता गढ़कर प्यार जताती,
पानी-पीती,दाना-चुगती,फुदक-फुदककर नाच दिखाती,
डरती नहीं हो मुझसे अब तुम,पास मेरे घूमा करती हो,
चीं-चीं करती अपनी भाषा में,तुम बातें बहुत बनाती हो।

पत्तों के झुरमुट से तुम झांक-झांक कर, छुप-छुपकर,
लुकाछिपी मित्रों संग मिलकर,तुम खूब मजे लगाती हो,
नन्हे-नन्हे अंडे सेकर,अपने भावी नन्हों के इंतज़ार में,
धैर्य परीक्षा दिखा-दिखाकर,जिम्मेदारी खूब निभाती हो।

आज तुम्हारे घर में जन्मे,बच्चे नन्हे-नन्हे,प्यारे से,
तुम बस उनकी सेवा में लगकर मन ही मन हर्षाती हो,
दाना-दुनका और कीट-पतंगे चोंच में भर-भर लाती हो,
बच्चों के लालन-पालन में तुम,भोर हुए जुट जाती हो।

सेवा करती नौनिहालों की,जब तक समर्थ न बन जाएँ,
फिर खूब जतन से,खूब लगन से,उड़ना उन्हें सिखाती हो,
बारी-बारी सब उड़ जाते,तब बैठी शान्त ताका करती हो,
मैं भी माँ हूँ,समझ रही हूँ,गौरैया री!तेरे इस सूनेपन को।

क्या-कुछ कहना चाहती हो मुझसे,समझ नहीं मैं पाती हूँ,
फिर कुछ सोच-समझ कर तुम,अपने पथ उड़ जाती हो,
इक रिश्ता तुझसे बना अबूझा,ओ पंछी!तेरे-मेरे प्यार से,
अगले बरस तुम फिर से आ जाना,रहूंगी मैं इंतज़ार में।

                                                                                        ( जयश्री वर्मा )





Saturday, March 30, 2013

साँसों की डोर


साँसों की डोर पर इस जीवन के खेल,
उजियारे सुख अंधियारे दुखों का मेल।

न आना मर्ज़ी से और,न ही जाना मर्ज़ी से,
जीवन इक नाटक और पात्रों की खुदगर्ज़ी है।

माँ के आँचल का पालना,पित्र-छाया का संग,
भाई,बहन,सखा से,रूठने और मनाने का रंग।

यौवन की दहलीज़ पर,नए रंगों की पहचान,
आसमान छूने सरीखी,नए सपनों की उड़ान।

हांथों में बांधना वो,अपना सारा घर-संसार,
नए जीवनों का जन्म,सब सहेजने का सार।

फिर बिछड़ते बुजुर्गों के छूटने का असीम दर्द,
दुःख-सुख का भान,सांसारिक कर्मों का मर्म।

ये कैसा खेल है और ये है कैसी अजब कहानी,
ये कैसा आया मैं और है ये मेरी कैसी रवानी।

साँसों की डोर पर ये अजब  जीवन के खेल,
उजियारे सुख और अंधियारे दुखों का मेल।

                                                      ( जयश्री वर्मा )

Thursday, March 28, 2013

होली


इस होली पर्व के इंतज़ार में,
इस फागुनी सी हुई बयार में,
नव युवाओं के दिल भाव डोलें,
रह-रह के मन के राज़ खोलें।
जलती होलिका की आग में,
आपसी पुराने राग-द्वेष छोड़ें,
बिखरे से रिश्तों के तार जोड़ें,
सहृदय बन मीठे बोल बोलें।

हर छोटे,बड़े मित्रों का संग,
दहीबड़ा,पापड़,गुझिया,भंग,
आओ अबीर से मुट्ठी भर लें,
चलो टोली को संग कर लें।

पर इस पर्व में हुडदंग न हो,
प्यार,सम्मान बीच जंग न हो,
कालिख,कीचड़,पेंट की जगह,
बस आर्गेनिक अबीर,रंग हों।


रिश्तों की मर्यादा की आस,
तृप्त हो हर सम्मान की प्यास,
गाँव,शहर,वृन्दावन का रास,
ये होली सबके लिए है ख़ास।

बिखरे प्रकृति के हजार रंग,
सरसों,डहेलिया,गुलाब संग,
फागुन ऋतु के ये अजब ढंग,
होली में बसे हर मन उमंग।

                                              ( जयश्री वर्मा )






Saturday, March 23, 2013

न जाने कहाँ

तुम चले गए वहाँ, न जानूं मैं, कैसा,कौन सा सफर,
न जाने कैसी वो दुनिया,कैसे उसके शाम और सहर ?
बस कह दिया-चलता हूँ,कहा सुना सब माफ़ करना,
मैं हाथ पसारे ही रह गया,न कुछ कहना न सुनना। 


छूट गया मैं पीछे ही,तुम्हारी बहुत सी,यादों के सहारे,
रूठना-मनाना,वो अपनी बात रखना,वो बहाने सारे,
वो रंगों भरे दिन और वो अँधेरी,बहुत अपनों सी रातें,
तुम्हारे मेरे बीच,कही-अनकही,अनगिनत सी बातें।

पता नहीं क्यों ऐसा होता है,जब कभी किसी के लिए-
साँसें बेकल हों और मन कहे अब किसके लिए जियें,
कि छटपटाता हूँ मैं,अब तुम्हें कहीं से भी ढूंढ लाने को,
पर जानता हूँ कि,लोग जाते हैं वहां,कभी न आने को।

सत्य है जो भी आया यहाँ,वो इक न इक दिन जाता है,
इसीलिए तो शायद मनुष्य का,उस ईश्वर से नाता है,
कि अब भी सावन आएगा और बगिया भी महकेगी,
बेला और रात रानी भी तो अपने शबाब पे बहकेगी।

कि मेरी वीरान हो चुकी जिंदगी की कहानी भी चलेगी,
हर साल के मौसम में तुम्हारी रिक्तता के साथ ढलेगी,
इस शरीर के लिखे हुए,जीवन कर्म,तो करने ही होंगे,
बिन तुम्हारे,सूनी ही सही,रातों में ख्वाब भरने ही होंगे।
                                                                                            
                                                                                              ( जयश्री वर्मा )

Monday, March 18, 2013

रूमानी हो जाइये



होली के कई रंगों में,रंगों के छंद घोल,
छंदों संग बहक कर,होली गीत गाइए,
छोटा-बड़ा छोड़,अपनत्व बीज रोपकर,
हंसिये-हंसाइये,थोड़े रूमानी हो जाइये।


सुबह-सुबह उठ कर,रंग गुलाल भर कर,
साले घर जाइये,थोड़ा बेईमानी हो जाइये,
बिना किसी झिझक के,सलहज बुलाइये,
गाल गुलाल मल कर,पक्का रंग चढ़ाइए।


गर ससुराल पहुचें तो,जहाँ कहीं छुपी हों,
सालियों को ढूँढ-ढूँढ के,आँगन में लाइए,
पत्नी का डर छोड़,लाल-पीले तेवर भूल,
रंग खूब लगाइये,ससुराल में छा जाइये।


लस्सी में भंग घोल,भंग संग डोल-डोल,
फगुआ की तान पर,थिरक-थिरक गाइये,
गुझिया की मिठास में,राग द्वेष भूलकर,
बस खाइए-खिलाइये,मेहमानी हो जाइये।



मर्यादाओं का रहे ख्याल और रिश्तों का हो मान,
बच्चों का हो स्नेह और बुजुर्गों का रहे सम्मान,
रिश्ते नए बनाइये और साथ पुराने भी निभाइए,
दिल रहें साफ़,रंग हों हाथ और होली मनाइये।                                         

                                                                        ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, March 13, 2013

बापू मुझे आने दो


हंसने दो हँसाने दो,नए गीत सार्थक बनाने दो,
सृष्टि की देन हूँ मैं,मुझे जीवन गुनगुनाने दो,
नन्ही सी निर्दोष हूँ,पापा-मम्मी तो बुलाने दो,
बेटी को सहेजो,अपनी पहचान तो बन जाने दो,
बापू मुझे आने दो।

पापा कह बोलूंगी,मम्मी आँचल संग खेलूंगी,
उंगली पकड़ तुम्हारी मैं ठुमक-ठुमक डोलूँगी,
मुझको मत रोको,अरे मुझको भी तो जीने दो,
इस जीवन संगीत में,सुर बनके घुल जाने दो,
बापू मुझे आने दो।

बच्चों संग मैं भी तो स्कूल पढ़ने जाऊँगी,
बड़ी होकर तुम्हारा मैं सम्मान ही बढ़ाऊँगी,
टीचर,पायलट या नेता बन के दिखाऊँगी,
डाक्टर,इंजीनिअर या फिर सेना में जाने दो,
बापू मुझे आने दो।


न रहूंगी मैं तो,राखी त्यौहार का क्या होगा ?
बेटी न होगी तो, बहन शब्द भी कैसे होगा ?
तुम्हारे आँगन की चिड़िया बन गुनगुनाने दो,
रंग -बिरंगे कपड़ों में, मुझे सपने सजाने दो,
बापू मुझे आने दो।

बेटी न होगी तो सोचो,देहरी बारात कैसे आएगी ?
कन्यादान और हल्दी की तो रस्म ही टूट जायेगी,
गर बेटी न हुई तो,घर में कभी बहू भी न आएगी,
दादी-नानी के नाम का मतलब तो आगे बढ़ाने दो,
बापू मुझे आने दो।

बेटी बन जनमूँगी संग रौनक भी तो लाऊंगी,
मीठी-मीठी बातों से तुम्हारी थकान मिटाऊँगी,
कन्या भ्रूण हत्या,ये अपराध खुदसे न होने दो,
अपनी ही रचना को,स्वयं से ही खो न जाने दो,
बापू मुझे आने दो।

                                                     ( जयश्री वर्मा )



Monday, March 4, 2013

पुनर्जन्म

पत्ता-कांपा,टूटा,बिछड़ा,गिरा,उड़ चला कहीं डाल से दूर,
बोला-नियति में साथ अपना इतना ही,मैं हूँ अब मजबूर,
जा रहा हूँ वहां,जहाँ मुझे खुद भी नहीं मंजिल का पता,
न दिशा,न दशा,कुछ भी तो नहीं,तुमको सकता मैं बता।













क्या पता किसी पांव तले आकर,चरमरा के बिखर जाऊं,
क्या पता किसी जलधार के साथ,कहीं बहता चला जाऊं,
क्या पता किसी वनचर की क्षुधा,मिटाने के काम मैं आऊं,
क्या पता किसी पंछी के,नीड़ के लिए,सहेज लिया जाऊं।

क्या पता कि मिट्टी में मिल के मैं अपना वजूद ही मिटा दूँ,
क्या पता कि किसी नन्हे से जीव को मैं बहने से बचा लूँ,
क्या पता कि किसी दावानल में झुलस के भस्म हो जाऊं,
क्या पता किसी कवि के पन्ने की जिन्दा नज़्म बन जाऊँ।

नहीं-नहीं,मेरी याद में न उदास होना,न आंसू बहाना तुम,
मैं पुनर्जन्म को मानता हूँ,बस सच्चे दिल से बुलाना तुम,
कि मेरे इस तरह से जाने को मेरा इक सफ़र ही समझना, 
मेरी याद में,न बेकल होना,न रोना,न मन करना अनमना।

चारों तरफ जब सावन की रिमझिम फुहारें नेह बरसाएंगी,
और धरती पुराना त्याग अपने कलेवर को रंगीन बनाएगी,
कि यकीन मानो जब बहार आएगी फ़िज़ा में फैलेगा सुरूर,
तुम्हारी ही डाल पे कोपल बन के मैं खिलखिलाऊंगा जरूर।
     
                                                     ( जयश्री वर्मा )

Thursday, February 14, 2013

तू और मैं



तू और मैं,
क्या हैंऔर कौन हैं ?
कब से हैं ? कब तक हैं ?
प्रश्न से उत्तर तक या,
उत्तर के प्रश्न तक ?

आसमान से धरती,और ,
धरती के कण- कण में,
निर्जीव में या स्पंदन में,
सब में हैं और हर में हैं।

प्रश्न है कैसे ?
उत्तर है ऐसे -

तू सागर,मैं लहरें,
तू सूरज,मैं किरणें,
तू बादल,मैं पानी,
यही सृष्टि की कहानी।

तू पर्वत,मैं सरिता,
तू अंतर,मैं कविता,
तू लेख,मैं पाती,
तू दीपक,मैं बाती।

तू शिल्पी,मैं कल्पना,
तू रंग,मैं अल्पना,
तू जीवन,मैं हलचल,
हम संग-संग हर पल।

तू राग,मैं तान,
तू शब्द,मैं गान,
तू लता,मैं फूल,
तू जीवन,मैं भूल।

तू पारखी,मैं कंचन,
तू आँख,मैं अंजन,
तू हाथ,मैं कंगन,
तू रिश्ता,मैं बंधन।

तू बादल,मैं दामिनी,
तू काम,मैं कामिनी,
तू जीवन,मैं धड़कन,
तू अंजुली,मैं अर्पण।

तू नेत्र,मैं दृष्टि,
तू मनु,मैं सृष्टि,
तू भ्रमर,मैं शतदल,
तू प्रश्न और मैं हल।

                             ( जयश्री वर्मा )                     

Tuesday, February 12, 2013

कुछ-कुछ

       

 खुशी 

पतझर के बीच छाई,
बसंत सी -
हँसी,
फिसल गई,
मुट्ठी से,
रेत सी -
खुशी ।

सम्बन्ध

स्नेह के धागे में,
अविश्वास का-
बंध,
टूट गया खिंचने से,
प्यारा -
सम्बन्ध।

इंतज़ार 

हर सहर कहे,
वह -
आज आएगा,
हर शाम कहे,
वह -
बेवफा निकला।

                        ( जयश्री वर्मा )



Friday, February 8, 2013

इंतज़ार और सपने

               

माँ!
इंतज़ार ही, तुम्हारी किस्मत क्यों है ?
कभी पापा का इंतज़ार,
कभी स्कूल से हमारे लौटने का इंतज़ार,
क्यों मेरी एक झलक के लिए,
बैचेन रहती हो ?
मैं तुम्हारे आँचल की गुड़िया थी छोटी सी,
तुमने हर पल मुझे पाला रीझ-रीझ,
छोटी थी तब,
मेरे बड़े होने के सपने,
बड़ी हुई तब -
पराया बनाने के सपने,
पराया कर दिया तब,
मेरे सुखी होने के सपने,
अब जब मैं सुखी हूँ तब,
रक्षाबंधन पर,
मेरे मायके आने के सपने,
माँ तुम्हारा जीवन तो जैसे,
इंतज़ार और सपनों का पर्याय हो गया।
सारे सपने बस हमारे के लिए ?
कभी मेरे सुख के लिए सपने,
कभी भैया की पढ़ाई और नौकरी के सपने,
कभी पापा के प्रमोशन और स्वास्थ्य के सपने,
तुम्हें कभी तृप्त,कभी शांत नहीं देखा माँ,
तुम्हारी बढ़ रही झुर्रियों और,
घट रही आँखों की रौशनी के बाद भी,
इतना प्रेम,इतनी ममता,इतनी पूजा,
सिर्फ हमारे लिए ?
अब समझ रही हूँ सार,
माँ और माँ के सपनों का संसार,
अब,जब -
मैं भी बन चुकी हूँ माँ,
मेरी निगाह भी लगी रहती है,
घर की चौखट पर,
मैं भी रास्ता देखती रहती हूँ सबका,
मेरा जीवन भी बन गया है,
पर्याय -
इंतज़ार और सपनों का।

                                        ( जयश्री वर्मा )





Tuesday, February 5, 2013

रंग भरे सपने


मित्रों मेरी यह रचना " रंग भरे सपने " समाचार पत्र " अमर उजाला " की " रूपायन "में आज प्रकाशित हुई है, आप भी इसे पढ़ें !

तितली के पंखों सरीखे,रंग भरे सपने हों ,
नहीं किसी गैर के,बस सिर्फ मेरे अपने हों।

मेरे सपनों की नैया की पतवार मेरे हाथ हो,
मन चाहे कहीं चलूँ,इस पार या उस पार को,
कोई न रोके और अब कोई भी न टोके मुझे,
मेरी सोच की लहरों से भरा सागर अथाह हो।

कब कहाँ रुकोगे ?अब कहाँ को जाते हो ?
कोई भी न बूझे मुझसे,कोई न सवाल हो ,
बाँहों को फैलाकर,अंजुली भर-भर ले लूं,
बूँद-बूँद पीलूं मैं ऐसी खुशियाँ अपार हों।

मेरी ही दुनिया हो और मेरा ही सागर हो,
इन्द्रधनुष के रंगों से भरी मेरी गागर हो,
पंछी बन उड़ चलूँ मैं,यहाँ-वहां जहाँ-तहाँ,
मेरे संसार में प्यार की,गलियां हज़ार हों।

शब्दों को बांध-बांध,मैं प्रेम गीत बुन डालूं,
जोड़-जोड़ रिश्तों को,आपस में सिल डालूं,
इंसानी दुनिया में,जहाँ मानवी ही नाते हों,
नफ़रत की फसल न हो,सौहार्द की बातें हों।

तितली के पंखों सरीखे,रंग भरे सपने हों,
नहीं किसी गैर के,बस सिर्फ मेरे अपने हों।

                                                         (जयश्री वर्मा )