Sunday, June 17, 2012

कह दीजिये

मित्रों ! मेरी यह रचना दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन प्रा० लिमिटेड द्वारा प्रकाशित पत्रिका " मुक्ता " में प्रकाशित हुई है ! आप भी इसे पढ़ें -

 कह दीजिये

जो होंठों तक गर बात आई,तो कह दीजिये,
जो दिल अपना सा लगे उसमें,रह लीजिए।

न आएगा यूँ ये सन्देश बार-बार प्यार का,
यौवन की उमंग और ये मौसम बहार का,
गर खिल रहा हो फूल जीवन की डाल पर,
तो झूमने,महकने और,बहकने उसे दीजिए।

इन्तजार नहीं करता कोई किसी का उम्र भर,
रस में भीगे हुए पल,छिन,दिन ये शामो-सहर,
समेट लो ये सब आंचल में न बिखरने दो इसे,
गर हो अपनेपन का आभास तो ठहर लीजिये।

नज़र उठ जाती है,और ठहर जाती है किसी पर,
कि ये कुछ और नहीं है संकेत है कुछ कहता सा,
इन दौड़ते-भागते हुए,जीवन के सवालों के लिए,
स्वछंदता को किसी बंधन में,बंध जाने दीजिए।

जो होंठों तक गर कोई बात आई,तो कह दीजिये,
जो दिल कोई अपना सा लगे उसमें रह लीजिए।

                                                                                      ( जयश्री वर्मा )


Thursday, June 14, 2012

झंझावात

                                                      
अपने उलझे मन की गुत्थी सुलझाओ,
अब बस तुम इन पीड़ाओं से पार पाओ,
देखो तो सब कुछ नहीं है उलझा-उलझा,
इन उलझनों से तुम स्वयं को बचाओ।
मन की नकारात्मक सोच को तो छोड़ो,
सहजता की तरफ ये मन अपना मोड़ो,
उतार-चढ़ाव ही है इस जीवन का खेल,
जैसे धरती,पर्वत,नदी,सागर का मेल।

ये ज़िन्दगी सरल-सपाट नहीं होती है,
हर रात की एक उजली सुबह होती है,
इन झंझावातों से भी उबर ही जाओगे,
मान लोगे हार फिर कैसे जी पाओगे ?

इन विविधताओं से यूँ घबराते नहीं हैं,
बंद कमरे में दीवारों से टकराते नहीं हैं,
फिर से खुद को इक नई चाह से जोड़ो,
जीवन के प्रश्नों को नई राह पे मोड़ो।

फिर हर पेचीदा सवाल के हल भी मिलेंगे,
राहों में  तुम्हारे सफलता के फूल खिलेंगे,
पर पहले खुद से ही यूँ टकराना तो छोड़ो,
और जीवन को नित नए अर्थों से जोड़ो।

राहें खुलेंगी जब तो सब कुछ सरल बनेगा,
ये बीता बुरा वक्त तुम्हें फिर नहीं खलेगा,
लेकिन पहले खुद के मन को तो समझाओ,
अपनी निराशा की गुत्थी को तो सुलझाओ। 

                                                         (जयश्री  वर्मा )