Wednesday, April 4, 2012

चुनौती

मित्रों ! मेरी यह रचना पूर्वोत्तर रेलवे की पत्रिका " रेल - रश्मि "में अप्रैल 1987 में प्रकाशित हुई , उस समय पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक श्री योगेन्द्र बिहारी लाल माथुर थे। आप भी रचना को पढ़ें।                                                                      

तुम मुझे समाप्त नहीं कर सकोगे काल,
मैं तुम्हें अमर बन कर दिखलाऊंगा,
और तुम ?
तुम हाथ मलते रह जाओगे।
मैं बहार नहीं,
कि तुम मुझे खिज़ा में बदल दो,
मै बहारों का वो गीत हूँ,
जो हर वर्ष गाया जायेगा -
पीढ़ी दर पीढ़ी द्वारा,
और पीढ़ियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं।
मैं नदी की कल-कल नहीं,
कि तुम मुझे शांत कर दोगे -सुखाकर,
मैं वर्षा की रिमझिम हूँ,
हर आने वाले मौसम का संगीत हूँ,
जो रोके रुक नहीं सकता।
मैं पत्थर की ऋचा नहीं,
कि तुम मुझे मिटा दोगे खण्ड - खण्ड करके,     
मैं पर्वतों की अडिगता हूँ,
और अडिगता स्वयं समर्थ है।
मैं देवता नहीं,
कि जिसे अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए,
भिन्न- भिन्न धर्मों में,
भिन्न - भिन्न नामों से जन्म लेना पड़ता है,
मैं मानव हूँ काल,
मैं वो मानव हूँ,
जिसके अंतर में-
भावनाओं से ओत -प्रोत हृदय है,
और भावनाएं सिर्फ जन्म लेती हैं ,
मिटती नहीं।
तुम मुझसे हार जाओगे काल,
तुम मुझे समाप्त नहीं कर सकोगे ।

                                                              ( जयश्री वर्मा )   

2 comments:

  1. Awesome poet!!! you are great my friend...

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  2. Dhanyavaad aapka Ashok ji , is kavita par itne sundar vichaar vyakt karne ke liye !

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