Monday, April 2, 2012

याद पन्छी

                                                            

इस पार से उस पार ,
उस पार से इस पार को ,
मंथर गति से ,
आती जाती नौकाओं की तरह ,
मिनट ,घंटे ,दिन ,सप्ताह ,
महीने और फिर साल ,
आते और जाते रहेंगे ,
लकिन हमारा पुराना ,
साथ -साथ बीता हुआ कल,
मधुर कल ,
पुनः लौट कर नहीं आएगा ,
ऐसे ही जैसे -
आज का दिन ,
हम एक दूसरे के पास हैं ,
हम चाहते हैं -
कल न आए ,
जो हमें एक दूसरे से अलग कर दे ,
हम चाहते हैं -
ये पल यहीं थम जाए ,
वक्त आगे न बढ़ पाए ,
ये लम्हा ठहर जाए ,
पर असंभव !
समय को कौन रोक पाया ,
रेत कौन भींच पाया,
लकिन एक चीज़ संभव है ,
मेरे वश में है ,
तुम्हारा याद पंछी,
जो सदा मेरे  पास रहेगा ,
तुम्हारे साथ का अहसास रहेगा
जिसे मैंने,
अपने मन पिंजरे में ,
कैद कर लिया है |
                                                     (जयश्री वर्मा)